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एक घंटा पहले
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कद्दू की सब्जी तो लगभग हर घर में पकती है, लेकिन क्या आपने कभी कद्दू की बेलों और पत्तियों का साग चखा है? उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में इस देसी साग को बड़े चाव से खाया जाता है। स्वाद और पोषण से भरा यह व्यंजन यहां की स्थानीय खानपान संस्कृति में गहराई से रचा-बसा है। इसकी नरम पत्तियों और डंठलों को तोड़कर साग तैयार किया जाता है।
बागेश्वर की सुनीता टम्टा बताती हैं कि उत्तराखंड के ग्रामीण क्षेत्रों में आज भी कई पारंपरिक व्यंजन लोगों की थाली का अहम हिस्सा बने हुए हैं। इन्हीं में से एक है कद्दू की कोमल बेल और पत्तियों से बनने वाला यह साग। उनका कहना है कि यह देसी साग न सिर्फ स्थानीय खानपान की पहचान है, बल्कि सेहत के लिहाज से भी बेहद लाभकारी माना जाता है।
घर के आंगन से खेत तक आसानी से उपलब्ध
ग्रामीण इलाकों में कद्दू की बेल घरों के आसपास या खेतों में आसानी से उगा ली जाती है। इसकी कोमल पत्तियों और डंठलों को तोड़कर साग बनाया जाता है। सुनीता टम्टा के अनुसार कद्दू का साग तैयार करना बेहद आसान है।
बनाने का तरीका
साग बनाने के लिए सबसे पहले बेल के नरम हिस्सों और पत्तियों को अच्छी तरह साफ कर बारीक काटा जाता है। इसके बाद सरसों के तेल में जीरा, लहसुन और हरी मिर्च का तड़का लगाया जाता है। कई लोग स्वाद बढ़ाने के लिए इसमें आलू और बैंगन भी मिला देते हैं।
धीमी आंच पर पकाना क्यों जरूरी
सुनीता बताती हैं कि इस साग को बिना अतिरिक्त पानी डाले धीमी आंच पर पकाया जाता है, जिससे इसका प्राकृतिक स्वाद और पौष्टिकता बरकरार रहती है। कद्दू की कोमल बेल और पत्तियां कई जरूरी पोषक तत्वों का बेहतरीन स्रोत हैं। इनमें फाइबर, आयरन, कैल्शियम, विटामिन ए और विटामिन सी भरपूर मात्रा में पाए जाते हैं।
पाचन और खून की कमी में मददगार
फाइबर की अधिकता के कारण यह साग पाचन तंत्र को मजबूत बनाने में मदद करता है और पेट से जुड़ी समस्याओं को कम करने में सहायक होता है। वहीं इसमें मौजूद आयरन शरीर में रक्त की कमी को दूर करने में सहायता करता है।
आंखों, हड्डियों और दांतों के लिए वरदान
विटामिन ए आंखों की रोशनी और दृष्टि को बेहतर बनाए रखने में मददगार है, जबकि विटामिन सी शरीर की रोग प्रतिरोधक क्षमता को मजबूत करता है। इसके अलावा कैल्शियम की मौजूदगी हड्डियों और दांतों को मजबूत बनाने में अहम भूमिका निभाती है।
परंपरा को सहेजती नई पीढ़ी
पहाड़ों में बुजुर्गों से लेकर युवा पीढ़ी तक इस साग को पसंद करती है। सुनीता बताती हैं कि आधुनिक खानपान के बढ़ते असर के बावजूद कद्दू की बेल का साग आज भी कई घरों में नियमित रूप से बनाया जाता है। प्राकृतिक रूप से उपलब्ध यह साग स्वाद, सेहत और परंपरा का अनूठा संगम है। उत्तराखंड की समृद्ध खाद्य संस्कृति में इसकी खास पहचान बनी हुई है और आने वाली पीढ़ियों तक इस परंपरा को सहेजकर रखा जा रहा है।
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