जीवनशैली
एक घंटा पहले
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विचारों
आधुनिकता और पुरानी जीवनशैली का अंतर
आज के दौर में दुनिया बहुत तेजी से आगे बढ़ रही है। इस रफ्तार ने न केवल हमारे रहन-सहन को बदल दिया है, बल्कि खान-पान की आदतों में भी बड़ा बदलाव आया है। आधुनिक सुविधाओं ने जीवन को आसान तो बना दिया है, लेकिन कई बार ये आराम हमारे स्वास्थ्य के लिए नई चुनौतियां और बीमारियां भी साथ लेकर आते हैं। मशीनीकरण के इस युग में लोग शहरों की ओर पलायन तो कर गए हैं, लेकिन मन आज भी अपने गांव और जड़ों से जुड़ा हुआ है। ग्रामीण जीवनशैली में आज भी शुद्धता और देशी नुस्खों का जो मेल मिलता है, वह शहरों की चमक-धमक में नदारद है। आज हम आपको एक ऐसे ही पुराने नुस्खे के बारे में बताने जा रहे हैं, जो न केवल मेहमाननवाजी का हिस्सा था, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी बहुत महत्वपूर्ण माना जाता था।
नालंदा की प्रतिमा देवी की यादें
नालंदा जिले के चंडी थाना क्षेत्र की रहने वाली 70 वर्षीय प्रतिमा देवी अपने बचपन के दिनों को आज भी जीवंत याद करती हैं। वह बताती हैं कि उनके दादा-दादी और माता-पिता के समय का रहन-सहन आज की पीढ़ी की कल्पना से बिल्कुल अलग था। उस दौर में आधुनिकता की दौड़ नहीं थी। पीने के पानी के लिए लोग कुओं पर आश्रित थे और यात्रा करने के लिए बैलगाड़ी, टमटम या पैदल चलना ही एकमात्र विकल्प हुआ करता था। उस समय रास्ते में होटल या ढाबों की भरमार नहीं थी कि जब जी चाहा रुक कर कुछ भी खा लिया। उस युग में जीवन की गति धीमी थी, लेकिन वह ठहराव स्वास्थ्य के लिए बहुत लाभदायक था।
50 साल पहले स्वागत का खास अंदाज
प्रतिमा देवी याद करती हैं कि जब 50 साल पूर्व गर्मियों के मौसम में कोई अतिथि बाहर से घर आता था, तो सीधे ठंडा पानी या शरबत नहीं दिया जाता था। उनके दादाजी मेहमानों का स्वागत करने से पहले उन्हें 4 दाने काली मिर्च के देते थे। अतिथि को काली मिर्च खिलाने के बाद उन्हें थोड़ी देर आराम करने के लिए कहा जाता था और उसके कुछ समय बाद ही उन्हें पानी या शरबत पिलाया जाता था। इस परंपरा के पीछे एक बहुत ही वैज्ञानिक कारण छिपा हुआ था।
लू और पेट की समस्याओं से बचाव का उपाय
काली मिर्च के सेवन के पीछे का मुख्य उद्देश्य मेहमानों को चिलचिलाती गर्मी और लू के दुष्प्रभावों से बचाना था। प्रतिमा देवी बताती हैं कि बाहर से आने वाले व्यक्ति को गर्मी के कारण लू लगने का डर रहता था। ऐसे में काली मिर्च का सेवन शरीर के तापमान को संतुलित करने और पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में मदद करता था। इससे गर्मी के सीजन में होने वाली बदहजमी, पेट की बीमारियों और लू जैसी समस्याओं से बचाव हो जाता था। यह परंपरा न केवल उनके दादाजी ने शुरू की थी, बल्कि उन्होंने भी इसे आगे बढ़ाया और कई लोगों को मेहमानों के स्वागत के इस सही तरीके के बारे में जागरूक किया, ताकि उनका स्वास्थ्य भी बेहतर बना रहे।
बदल गया है मेहमाननवाजी का तरीका
प्रतिमा देवी अफसोस जताते हुए कहती हैं कि आज सब कुछ बदल चुका है। अब किसी के घर जाने पर स्वागत का जरिया कोल्ड ड्रिंक, कॉफी और चाय बन गए हैं। पहले का समय ऐसा नहीं था। उस दौर में बाहर से आने वाले मेहमानों को नाश्ते के रूप में भूंजा खिलाया जाता था। मिठास के लिए मिठाई की दुकानें कम होती थीं, इसलिए अक्सर जलेबी लाकर परोसी जाती थी। हालांकि, अब हर कार्य करने का तौर-तरीका बदल गया है। आज सब कुछ अलग हो गया है और इंसानों के स्वागत करने के तरीके में भी वही आधुनिकता की झलक मिलती है, जो शायद अब पहले जैसी आत्मीयता और स्वास्थ्य सुरक्षा प्रदान नहीं करती है। समय के साथ जो बदलाव आए हैं, उसने हमारे देशी और स्वास्थ्यवर्धक तरीकों को पीछे छोड़ दिया है, जो किसी भी ग्रामीण संस्कृति का अभिन्न हिस्सा हुआ करते थे।
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