भोजशाला में पहली बार अष्टधातु की वाग्देवी प्रतिमा के समक्ष महाआरती, प्रशासन ने हटवाकर ज्योति मंदिर में रखवाई मध्य प्रदेश एक घंटा पहले 2
धार की भोजशाला में शनिवार को पहली बार अष्टधातु से बनी वाग्देवी प्रतिमा के सामने विशेष पूजन और महाआरती हुई, जिसके बाद प्रशासन ने इसे एएसआई संरक्षित स्मारक का हवाला देते हुए मोतीबाग स्थित ज्योति मंदिर में सुरक्षित रखवा दिया।

धार की ऐतिहासिक भोजशाला एक बार फिर धार्मिक और ऐतिहासिक चर्चाओं के केंद्र में आ गई है। शनिवार को यहां पहली बार अष्टधातु से निर्मित वाग्देवी की प्रतिमा स्थापित कर विशेष पूजन और महाआरती की गई। इससे पहले तक भोजशाला में पूजा-अर्चना के लिए एक्रेलिक शीट से बनी प्रतिमा का प्रयोग होता आया था, लेकिन इस बार श्रद्धालुओं ने अष्टधातु की प्रतिमा के समक्ष विधिवत पूजन किया।

महाआरती के दौरान बड़ी संख्या में श्रद्धालु मौजूद रहे और पूरे परिसर में धार्मिक माहौल देखने को मिला। आयोजन की जानकारी प्रशासन तक पहुंचने पर अधिकारियों ने मामले का संज्ञान लिया। चूंकि भोजशाला भारतीय पुरातत्व सर्वेक्षण (एएसआई) के संरक्षण में आने वाला स्मारक है, इसलिए प्रतिमा को वहां स्थायी रूप से रखने की अनुमति नहीं दी गई और बाद में उसे मोतीबाग चौक स्थित ज्योति मंदिर में सुरक्षित रखवा दिया गया।

इस घटनाक्रम ने भोजशाला से जुड़ी ऐतिहासिक और धार्मिक बहस को फिर से चर्चा में ला दिया है। हिंदू समाज भोजशाला को मां वाग्देवी का प्राचीन मंदिर मानता है, जबकि यह स्थल लंबे समय से कानूनी और ऐतिहासिक विमर्श का विषय भी रहा है।

पहली बार अष्टधातु की प्रतिमा के सामने पूजा

भोजशाला में वर्षों से वाग्देवी के प्रतीक स्वरूप एक्रेलिक प्रतिमा के सामने पूजा होती रही है। शनिवार को पहली बार अष्टधातु से बनी प्रतिमा को लाकर उसके समक्ष विशेष पूजन, मंत्रोच्चार और महाआरती की गई। श्रद्धालुओं ने इसे अपने लिए एक ऐतिहासिक अवसर बताया और कहा कि अष्टधातु की प्रतिमा के समक्ष पहली बार पूजा होना उनके लिए विशेष महत्व रखता है।

प्रशासन ने क्यों लिया यह फैसला

भोजशाला एएसआई के संरक्षण में आने वाला स्मारक है। नियमों के अनुसार किसी संरक्षित स्मारक परिसर में नई प्रतिमा या स्थायी धार्मिक संरचना स्थापित करने पर विशेष प्रावधान लागू होते हैं। प्रशासन ने इन्हीं नियमों का हवाला देते हुए प्रतिमा को परिसर से हटाकर ज्योति मंदिर में सुरक्षित रखवा दिया। अधिकारियों का कहना है कि यह कार्रवाई केवल एएसआई के नियमों और संरक्षित स्मारकों से संबंधित प्रावधानों के तहत की गई है।

हाईकोर्ट के आदेशों के तहत होती है पूजा

भोजशाला में मौजूदा पूजा व्यवस्था न्यायालय और प्रशासनिक निर्देशों के अनुरूप संचालित होती है। निर्धारित समय और नियमों के अनुसार ही श्रद्धालु यहां पूजा-अर्चना करते हैं। इसी व्यवस्था के अंतर्गत अब तक एक्रेलिक प्रतिमा का उपयोग किया जा रहा था।

लंदन में है मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा

भोजशाला से जुड़ी सबसे महत्वपूर्ण ऐतिहासिक कड़ी मां वाग्देवी की मूल प्रतिमा है। इतिहासकारों के अनुसार वर्ष 1902 में इसे भारत से इंग्लैंड ले जाया गया था और वर्तमान में यह लंदन के ब्रिटिश म्यूजियम में संरक्षित है। इस प्रतिमा को वापस भारत लाने की मांग वर्षों से उठती रही है।

राजा भोज की सांस्कृतिक विरासत का प्रतीक

भोजशाला का नाम परमार शासक राजा भोज से जुड़ा माना जाता है। उनके शासनकाल में यह स्थान शिक्षा, साहित्य और संस्कृत अध्ययन का प्रमुख केंद्र था। यही वजह है कि भोजशाला को मालवा की सांस्कृतिक पहचान का अहम हिस्सा माना जाता है।

धार्मिक आस्था और पुरातात्विक नियम

विशेषज्ञों का मानना है कि भोजशाला जैसे स्थलों पर धार्मिक भावनाओं और पुरातात्विक संरक्षण, दोनों का महत्व है। प्रशासनिक निर्णय भी इसी संतुलन को ध्यान में रखकर लिए जाते हैं ताकि ऐतिहासिक धरोहर सुरक्षित बनी रहे। ऐसे में यह पूरा घटनाक्रम धार्मिक आस्था, ऐतिहासिक विरासत और प्रशासनिक नियमों के बीच संतुलन की एक नई चर्चा को जन्म देता है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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