₹100 प्रति किलो बिकने वाली देसी खेक्सी की खेती से मालामाल हो रहे किसान, जानें नर और मादा पौधे का बड़ा राज छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 5
छत्तीसगढ़ के जंगलों में पाई जाने वाली देसी खेक्सी अब किसानों की आय का एक बड़ा जरिया बन गई है। बिलासपुर के एक प्रगतिशील किसान ने इस फसल के बारे में फैली भ्रांतियों को दूर करते हुए इसके बीज से खेती करने का सफल तरीका साझा किया है।

खेती से बढ़ रही है किसानों की आमदनी

छत्तीसगढ़ के वनों में प्राकृतिक रूप से उगने वाली देसी खेक्सी आज के समय में किसानों के लिए कमाई का एक शानदार अवसर साबित हो रही है। बिलासपुर जिले के मल्हार क्षेत्र में रहने वाले जैविक किसान यदुनंदन प्रसाद वर्मा ने इस फसल की व्यावसायिक खेती को लेकर लोगों के बीच फैली कई भ्रांतियों को पूरी तरह समाप्त कर दिया है। आमतौर पर जंगलों, पहाड़ों और खेतों की मेड़ों पर मिलने वाली यह वनस्पति अब बागवानी का रूप ले चुकी है। यदुनंदन प्रसाद वर्मा अपने जैविक फार्म में बिना किसी रासायनिक खाद या हानिकारक कीटनाशकों का उपयोग किए पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक पद्धति से इसकी खेती कर रहे हैं। इस अनोखे और प्राकृतिक तरीके को अपनाने के कारण उन्हें अपने खेत में देसी खेक्सी की बेहद शानदार पैदावार मिल रही है, जो बाजार में आकर्षण का केंद्र बनी हुई है।

कंद या बीज: खेती की सही तकनीक क्या है

देसी खेक्सी की खेती को लेकर लोगों के बीच कई तरह की गलतफहमियां बनी हुई हैं। सबसे बड़ी भ्रांति यह है कि इस फसल को केवल कंद के माध्यम से ही उगाया जा सकता है। हालांकि, किसान यदुनंदन प्रसाद वर्मा ने अपने अनुभव से इस धारणा को गलत साबित किया है। उनका कहना है कि अच्छी तरह से पके हुए फल से प्राप्त बीजों के माध्यम से भी इसके स्वस्थ पौधे तैयार किए जा सकते हैं। सोशल मीडिया और अन्य प्लेटफॉर्म्स पर इन दिनों खेक्सी के कंद की मांग बहुत अधिक देखी जाती है, जिससे लोगों को यह भ्रम हो गया है कि इसके बिना खेती असंभव है। हकीकत यह है कि जब आप पके हुए फल से बीज निकालते हैं और उन्हें सही तरीके से मिट्टी में लगाते हैं, तो एक छोटा पौधा अंकुरित होता है। यह बेल धीरे-धीरे विकसित होकर फल देना शुरू कर देती है, जो खेती को आसान बनाता है।

नर और मादा पौधों का रहस्य और फलन प्रक्रिया

खेक्सी की खेती में सबसे महत्वपूर्ण पहलू नर और मादा पौधों का संतुलन है। समाज में एक आम धारणा है कि यदि इसे घर के आंगन में लगाया जाए, तो सीधी रोशनी पड़ने के कारण इसमें फल नहीं लगते या पौधा पीला पड़कर सूख जाता है। यदुनंदन प्रसाद वर्मा के अनुसार, इसकी असली वजह प्रकाश नहीं, बल्कि नर और मादा पौधों का एक साथ नहीं होना है। खेक्सी एक ऐसी फसल है जिसमें नर और मादा दोनों अलग-अलग पौधों पर होते हैं। जब तक नर पौधे का पराग मादा पौधे के फूल तक नहीं पहुंचता, तब तक मादा पौधे में फल नहीं लगते। इसलिए, बागवानी करते समय यह सुनिश्चित करना अनिवार्य है कि दोनों पौधों को आसपास लगाया जाए, ताकि परागण की प्रक्रिया सुचारू रूप से चल सके।

पौधों की पहचान कैसे करें

जो किसान देसी खेक्सी की खेती करना चाहते हैं, उनके लिए नर और मादा पौधों की पहचान करना बहुत जरूरी है। यदुनंदन वर्मा ने इसकी पहचान के लिए एक बहुत सरल तरीका बताया है। उन्होंने समझाया कि नर पौधे में केवल फूल ही खिलते हैं और उनमें फल बनने की क्षमता नहीं होती। वहीं, मादा पौधे की पहचान यह है कि फूल के ठीक नीचे एक छोटी सी खेक्सी जैसी संरचना दिखाई देती है, जो धीरे-धीरे विकसित होकर फल में तब्दील हो जाती है। खेती को सफल बनाने के लिए खेत में दोनों तरह के पौधों का मिश्रण होना अत्यंत आवश्यक है ताकि पैदावार सुनिश्चित हो सके।

हाइब्रिड से अधिक है बाजार मूल्य

देसी खेक्सी की मांग बाजार में लगातार बनी रहती है, जिसका बड़ा कारण इसकी जैविक गुणवत्ता है। किसान यदुनंदन के मुताबिक, देसी खेक्सी का बाजार भाव सामान्य तौर पर ₹100 प्रति किलो के आसपास बना रहता है। इसके विपरीत, बाजार में मिलने वाली हाइब्रिड खेक्सी की कीमत आमतौर पर ₹40 से ₹50 प्रति किलो के बीच ही रहती है। इस प्रकार, देसी खेक्सी का भाव हाइब्रिड किस्मों की तुलना में लगभग दोगुना तक मिल जाता है। अधिक लाभप्रद होने के कारण यह फसल उन किसानों के लिए एक वरदान की तरह है जो कम लागत में अच्छी कमाई करना चाहते हैं।

सेहत के लिए एक वरदान

देसी खेक्सी न केवल स्वाद में बेहतरीन है, बल्कि स्वास्थ्य की दृष्टि से भी इसे अत्यधिक गुणकारी माना जाता है। इसमें कई महत्वपूर्ण पोषक तत्वों का खजाना छिपा है। यदुनंदन वर्मा बताते हैं कि इसमें प्रचुर मात्रा में एंटीऑक्सीडेंट, खनिज और लवण पाए जाते हैं। इसके साथ ही यह विटामिन ए और विटामिन बी का भी एक बड़ा स्रोत है। जब इस फसल को पूरी तरह प्राकृतिक और जैविक तरीके से उगाया जाता है, तो इसकी गुणवत्ता और पोषण मूल्य कहीं अधिक बढ़ जाते हैं, जो इसे स्वास्थ्य के प्रति जागरूक ग्राहकों की पहली पसंद बनाते हैं।

कम देखभाल और बंपर पैदावार

इस फसल की एक सबसे बड़ी खूबी यह है कि इसमें मेहनत और देखभाल की बहुत कम जरूरत होती है। यदुनंदन प्रसाद वर्मा का कहना है कि प्राकृतिक तरीके से लगाने के बाद यह फसल खुद को ढाल लेती है। किसान को बस समय-समय पर खेतों में खरपतवार नियंत्रण का ध्यान रखना पड़ता है। उन्होंने बताया कि उनके अपने खेत में भी खेक्सी के पौधे खरपतवारों के बीच प्राकृतिक वातावरण में पनप रहे हैं और आश्चर्यजनक रूप से उनमें बहुत अच्छे फल लग रहे हैं, जिससे साफ है कि इसे बहुत अधिक लाड़-प्यार की जरूरत नहीं है।

कैसे शुरू करें खेती

किसान यदुनंदन प्रसाद वर्मा ने अपनी खेती की शुरुआत के बारे में बताते हुए कहा कि उन्होंने इसके बीज बिलासपुर के सनीचरी बाजार में स्थित विजय सीड्स से प्राप्त किए थे। उन बीजों से तैयार पौधों ने आज उनके खेत में बंपर उत्पादन देना शुरू कर दिया है। वे अब अन्य किसानों को भी ये बीज उपलब्ध करा रहे हैं ताकि वे भी इस लाभकारी खेती से जुड़ सकें। यदि आपके पास खेत नहीं है, तो भी घबराने की बात नहीं है। इसे आप अपने घर के आंगन या फिर किसी बड़े गमले में भी आसानी से उगा सकते हैं। बस आपको नर और मादा पौधों के सही अनुपात को समझना होगा और उन्हें एक साथ लगाना होगा। ऐसा करने से आप अपने परिवार के लिए साल भर ताजी और रसायन मुक्त देसी खेक्सी घर पर ही प्राप्त कर सकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप