बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
इंजीनियरिंग की डिग्री हाथ में आते ही ज्यादातर युवा बड़े शहरों की ओर नौकरी की तलाश में निकल पड़ते हैं। लेकिन बिहार के आरा के रहने वाले युवा इंजीनियर प्रशांत ने इससे बिल्कुल अलग रास्ता चुना। उन्होंने किसी कंपनी में नौकरी करने के बजाय ऐसा काम शुरू किया, जिसे आज पूरे बिहार में एक नए पेशे के रूप में पहचान मिल रही है।
'वेल्थ टू वंडर' का अनोखा विचार
प्रशांत का मकसद है “वेल्थ टू वंडर”, यानी जिन चीजों को बेकार और कबाड़ मानकर फेंक दिया जाता है, उन्हें कलात्मक और उपयोगी रूप देकर नई पहचान देना। वे समाज और सार्वजनिक जगहों पर बिखरे लोहे के कबाड़ को इकट्ठा करते हैं और उससे आकर्षक संरचनाएं तथा कलाकृतियां गढ़ते हैं।
उनके इस काम की चर्चा अब सिर्फ आरा तक सीमित नहीं रही, बल्कि यह बिहार के कई जिलों तक पहुंच चुकी है। हाल यह है कि अलग-अलग जिलों के जिलाधिकारी खुद उनसे संपर्क कर अपने शहरों के सौंदर्यीकरण की जिम्मेदारी उन्हें सौंप रहे हैं।
कई जिलों में दिख रहा है उनका हुनर
आरा में उन्होंने वीर कुंवर सिंह की प्रतिमा के आसपास आकर्षक संरचनाएं बनाई हैं। वहीं गया में बोधि वृक्ष और मुजफ्फरपुर में विशाल लीची की कलाकृति को कबाड़ लोहे से तैयार कर उन्होंने लोगों का ध्यान अपनी ओर खींचा है।
प्रशांत किशोर का गांवनुमा आश्रम
फिलहाल प्रशांत का सबसे चर्चित प्रोजेक्ट पटना के बिहटा में स्थित जनसुराज के संरक्षक प्रशांत किशोर का आश्रम है। उनके नेतृत्व में इस आश्रम को पूरी तरह पारंपरिक गांव का रूप दिया जा रहा है। यहां आधुनिक कंक्रीट और सीमेंट की जगह बांस, बल्ला, फूस और मिट्टी जैसी पारंपरिक सामग्री का इस्तेमाल किया जा रहा है।
आश्रम में कमरा, हॉल, बैठक कक्ष और दूसरी संरचनाएं इस तरह तैयार की जा रही हैं कि यहां आने वाले लोगों को बिहार के पुराने गांवों की संस्कृति और जीवनशैली का असली अनुभव मिल सके।
सांस्कृतिक विरासत बचाने की पहल
प्रशांत का मानना है कि आधुनिकता की होड़ में गांवों की पहचान और पारंपरिक वास्तुकला धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है। ऐसे में उनका प्रयास सिर्फ निर्माण कार्य भर नहीं है, बल्कि बिहार की सांस्कृतिक विरासत को संजोने की एक कोशिश भी है। यही वजह है कि उनका काम प्रशासनिक अधिकारियों से लेकर सामाजिक संगठनों तक की पहली पसंद बनता जा रहा है।
कबाड़ से रोजगार भी
प्रशांत बताते हैं कि जब वे पहली बार अपने इस अनोखे प्रोजेक्ट को लेकर किसी जिलाधिकारी के पास पहुंचते हैं, तो उन्हें खासी सकारात्मक प्रतिक्रिया मिलती है। अधिकारियों का कहना होता है कि कोई तो है जो कचरे के प्रति संवेदनशील है और जिसने कबाड़ को ही अपना पेशा बना लिया है। उनके मुताबिक, कोई कबाड़ से कला रच रहा है, शहरों को सजा-संवार रहा है और सबसे बड़ी बात यह कि कबाड़ के जरिए रोजगार भी पैदा कर रहा है।
प्रशांत कहते हैं कि उनकी टीम की शुरुआत से ही सोच रही है कि बिहार को एक ऐसा मॉडल दिया जाए जो सामाजिक सरोकारों से जुड़ा हो, बड़े पैमाने पर रोजगार पैदा करे और समाज की मदद भी करे। उनका मानना है कि उनका प्रोजेक्ट इन सभी कसौटियों पर खरा उतरता है।
युवाओं के लिए मिसाल
अलग-अलग जिलों के अधिकारियों और आम लोगों से मिल रहा सकारात्मक रिस्पॉन्स यह साबित कर रहा है कि उनके काम का नतीजा बेहतर तरीके से सामने आ रहा है। यही कारण है कि बिहार के कई जिलों में उनके प्रोजेक्ट की मांग लगातार बढ़ रही है और नई-नई जिम्मेदारियां उन्हें सौंपी जा रही हैं।
कभी इंजीनियरिंग की पढ़ाई करने और विदेश में काम कर चुके यह युवा आज बिहार में नए रोजगार और नए पेशे की मिसाल बन चुका है। कबाड़ से कलाकृतियां और पारंपरिक संसाधनों से आधुनिक जरूरतों के मुताबिक संरचनाएं बनाकर प्रशांत न केवल अपनी अलग पहचान गढ़ रहे हैं, बल्कि राज्य के युवाओं को यह संदेश भी दे रहे हैं कि नवाचार और रचनात्मक सोच के दम पर अपने राज्य में रहकर भी सफलता की नई कहानी लिखी जा सकती है।
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