पश्चिम बंगाल
एक घंटा पहले
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तृणमूल कांग्रेस (टीएमसी) के विधायक दल के नेतृत्व को लेकर चल रहे टकराव में शनिवार को एक नया मोड़ आ गया। पूर्व मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के कालीघाट स्थित आवास पर हुई पार्टी विधायकों की दो बैठकों से जुड़े कथित दस्तावेज सोशल मीडिया पर सामने आ गए। इसके तुरंत बाद नेता प्रतिपक्ष रिताब्रता बनर्जी ने इन दस्तावेजों की सच्चाई पर सवालिया निशान लगा दिया। बताया जा रहा है कि ये दस्तावेज छह मई और 19 मई को हुई बैठकों से संबंधित हैं।
वर्ष 2026 के पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में तृणमूल की हार के बाद सदन में विपक्षी नेतृत्व पर पकड़ बनाने की होड़ और तीखी हो गई है, और इन्हीं दस्तावेजों ने इस लड़ाई को और गहरा कर दिया है।
छह मई की बैठक में 67 विधायक शामिल
दस्तावेजों के मुताबिक, छह मई को 30बी हरीश चटर्जी स्ट्रीट स्थित ममता बनर्जी के आवास पर हुई बैठक में 67 विधायक मौजूद रहे। रिकॉर्ड में विधायकों के हस्ताक्षर, उनके निर्वाचन क्षेत्रों के नाम और तारीख दर्ज हैं। ज्यादातर विधायकों ने बांग्ला या अंग्रेजी में दस्तखत किए, जबकि कुछ नाम बड़े अक्षरों यानी ब्लॉक लेटर्स में लिखे गए।
दस्तावेजों के अनुसार, जिन विधायकों के नाम बड़े अक्षरों में दर्ज हैं, उनमें सुभाशीष दास, चंद्रनाथ सिन्हा, दिनेन रॉय और बहारुल इस्लाम के नाम शामिल हैं। इस बैठक को विपक्ष के नेता, उपनेता और मुख्य सचेतक के चुनाव के लिए बुलाई गई बैठक बताया गया है।
रिकॉर्ड के अनुसार, छह मई की इस बैठक की अध्यक्षता कोलकाता के पूर्व महापौर फिरहाद हकीम ने की थी और विधायक दल के नेता के चुनाव का प्रस्ताव उपस्थित सदस्यों ने सर्वसम्मति से मंजूर किया। दस्तावेजों में यह दावा भी किया गया है कि जो विधायक बैठक में नहीं पहुंच सके, उन्होंने भी अपना समर्थन जताया था।
हस्ताक्षरों पर सीआईडी की जांच
वहीं, 19 मई की बैठक से जुड़े एक अन्य दस्तावेज में 59 तृणमूल विधायकों के हस्ताक्षर होने का दावा किया गया है। ये दस्तावेज ऐसे समय में सामने आए हैं, जब ममता बनर्जी खेमे और बागी गुट के बीच विधायक दल के नेतृत्व की वैधता को लेकर तीखी जंग चल रही है। यह विवाद विधानसभा से लेकर जांच एजेंसियों तक पहुंच चुका है। हालांकि इन दस्तावेजों की प्रामाणिकता की स्वतंत्र रूप से पुष्टि नहीं हो सकी है।
जाली हस्ताक्षर का आरोप
पूरे विवाद का केंद्र यह आरोप है कि नेता प्रतिपक्ष के नाम पर विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए दस्तावेजों में कुछ विधायकों के जाली हस्ताक्षर थे। विधायक रिताब्रता बनर्जी और संदीपन साहा ने पहले विधानसभा अधिकारियों से शिकायत करते हुए जालसाजी का आरोप लगाया था। इसके बाद राज्य सरकार ने मामले की जांच अपराध जांच विभाग (सीआईडी) को सौंप दी।
जांच के तहत सीआईडी कई विधायकों की लिखावट के नमूने भी जुटा चुकी है, ताकि हस्ताक्षरों की असलियत का पता लगाया जा सके।
रिताब्रता बनर्जी का बयान
दस्तावेजों पर प्रतिक्रिया देते हुए रिताब्रता बनर्जी ने कहा कि मामला जांच के अधीन है, इसलिए वह इस पर विस्तार से कुछ नहीं कहना चाहते। उन्होंने कहा, “लिखावट के विशेषज्ञ इन दस्तावेजों की जांच कर सकते हैं। उन तारीखों पर मौजूद रहे विधायकों की टावर लोकेशन भी सत्यापित की जा सकती है। हस्ताक्षर जालसाजी के आरोपों की चल रही जांच को अब और सामग्री मिल जाएगी।”
तीसरे पन्ने पर सवाल
बागी नेता रिताब्रता बनर्जी ने यह सवाल भी खड़ा किया कि आखिर ये दस्तावेज उपस्थिति पंजी हैं या फिर विपक्ष के नेता के चुनाव से जुड़े नामांकन पत्र। उन्होंने कहा, “अगर ये सचमुच नामांकन दस्तावेज थे, तो क्या यही दस्तावेज विधानसभा अध्यक्ष को सौंपे गए थे? पहले दो पन्नों और तीसरे पन्ने का रंग आपस में मेल नहीं खाता। इसके अलावा तीसरे पन्ने पर कोई हस्ताक्षर भी नहीं है।”
नाम न छापने की शर्त पर एक बागी तृणमूल विधायक ने दावा किया कि 19 मई की बैठक में विधायकों से दो अलग-अलग जगह हस्ताक्षर लिए गए थे। उन्होंने कहा, “एक हस्ताक्षर उपस्थिति दर्ज करने के लिए था। इसके अलावा, नेता प्रतिपक्ष के चुनाव से जुड़ी प्रक्रिया के तहत छह मई की बैठक में भी हस्ताक्षर लिए गए थे।”
तृणमूल में गहराती फूट
यह ताजा विवाद विधानसभा चुनाव में हार के बाद तृणमूल के भीतर पैदा हुई दरार को और चौड़ा कर रहा है, जहां दोनों गुट एक-दूसरे की वैधता को चुनौती दे रहे हैं। विधानसभा अध्यक्ष द्वारा रिताब्रता बनर्जी को विपक्ष का नेता मान्यता देने के फैसले को ममता बनर्जी खेमा पहले ही कानूनी और राजनीतिक रूप से चुनौती दे चुका है, जबकि जाली हस्ताक्षरों के आरोपों ने इस मामले में एक और जांच का रास्ता खोल दिया है।
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