1971 युद्ध के वीर पुलिस अधिकारी की विरासत आगे बढ़ा रहे बेटे, RPS अधिकारी चैन सिंह महेचा बने न्याय की मिसाल राजस्थान 3 महीने पहले 50
राष्ट्रपति पुलिस मेडल से सम्मानित स्वर्गीय जालम सिंह महेचा के बेटे और राजस्थान पुलिस सेवा के वरिष्ठ अधिकारी चैन सिंह महेचा पिता की सिखाई ईमानदारी, न्याय और राष्ट्र सेवा की राह पर चल रहे हैं। उन्हें आगामी 15 अगस्त को पुलिस पदक से सम्मानित किया जाएगा।

कहा जाता है कि विरासत का मतलब केवल धन-संपत्ति या जमीन-जायदाद नहीं होता। सबसे बहुमूल्य विरासत तो वह होती है जिसमें संस्कार, ईमानदारी और राष्ट्र की सेवा का जज्बा शामिल हो। राजस्थान पुलिस सेवा (RPS) के वरिष्ठ अधिकारी चैन सिंह महेचा आज इसी अनमोल विरासत के जीवंत उदाहरण हैं। ग्रामीण परिवेश से उठकर सफलता की ऊंचाइयों तक पहुंचे चैन सिंह जिस भी थाने या सर्किल में पहुंचते हैं, वहां न्याय की मिसाल कायम हो जाती है।

उनकी इस कामयाबी और न्यायप्रियता की नींव में हैं उनके पिता झालम सिंह महेचा, जो राजस्थान पुलिस सेवा में उपअधीक्षक रहे और जिन्हें महामहिम राष्ट्रपति ने ‘प्रेसिडेंट पुलिस मेडल’ से सम्मानित किया था। 1971 के भारत-पाक युद्ध में अदम्य साहस दिखाने वाले इसी पिता की सीख ने बेटे का जीवन बदल दिया, और आज भी लोग चैन सिंह महेचा में उनके पिता की छवि देखते हैं।

पिता की सीख को बनाया जीवन का ध्येय

बाली में अतिरिक्त पुलिस अधीक्षक के पद पर सेवाएं दे रहे चैन सिंह महेचा बताते हैं कि उनके पिता जालम सिंह महेचा, जो पुलिस सेवा में उपअधीक्षक रहे, एक ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते थे। उन्होंने पुलिस सेवा को सामाजिक सेवा में ढालकर राष्ट्र सेवा का काम किया और हर मोर्चे पर अनुकरणीय कार्य किया, जिसके चलते भारत के राष्ट्रपति ने उन्हें राष्ट्रपति पुलिस मेडल से सम्मानित किया।

चैन सिंह कहते हैं कि उनके पिता ने मारवाड़ में आने वाले अनेक युवाओं और ग्रामीण क्षेत्र के लोगों के लिए मिसाल कायम की तथा बहुत से लोगों को रोजगार दिलाया। उनका व्यक्तित्व सभी के लिए प्रेरणा रहा। उन्हीं की प्रेरणा से चैन सिंह पुलिस विभाग में आए। उनके सामने हमेशा यही सीख रही कि पिता ने जो नाम कमाया, उनके पदचिह्नों पर चलकर उनकी सेवाओं को आगे बढ़ाया जाए।

हर साल आयोजित करते हैं रक्तदान शिविर

चैन सिंह महेचा के अनुसार पिता की प्रेरणा से ही वे हर साल बड़े स्तर पर रक्तदान शिविर का आयोजन करते हैं, ताकि थैलेसीमिया से पीड़ित बच्चों और ट्रॉमा इमरजेंसी में काम आने वाले रक्त की कमी पूरी हो सके। वे कहते हैं कि रक्तदान से बड़ा कोई दान नहीं है।

उनका कहना है कि रक्तदान करने के दो से तीन महीने में व्यक्ति का खून फिर से बन जाता है, जिससे कोई नुकसान नहीं होता और किसी का जीवन बचाने से बड़ा कोई काम नहीं है। इस साल भी हर बार की तरह यह रक्तदान शिविर होटल सिद्धार्थ इंटरनेशनल में आयोजित किया जा रहा है।

15 अगस्त को मिलेगा पुलिस पदक

चैन सिंह बताते हैं कि स्वर्गीय जालम सिंह हमेशा न्याय के लिए पहचाने जाते थे, इसलिए उनके मन में यही भाव रहा कि पिता की उसी न्याय प्रणाली को आगे बढ़ाते हुए अच्छा कार्य करें, और उन्होंने इसके लिए प्रयास भी किया।

यही कारण है कि उन्हें 15 अगस्त को पुलिस पदक से सम्मानित किया जाएगा। चैन सिंह इसका श्रेय पिता की सीख और प्रेरणा को देते हैं। वे कहते हैं कि पुलिस सेवा के साथ-साथ समाज सेवा को अपने जीवन में अपनाना भी पिता की ही देन है।

1965 और 71 के युद्ध में जालम सिंह का योगदान

चैन सिंह ने बताया कि बचपन में उन्होंने 1971 के युद्ध में पुलिस और सेना को मिलकर सीमा पर लड़ते और तैयारियों पर जाते देखा। उन्होंने पाकिस्तान के हवाई हमले को भी बहुत नजदीक से देखा, क्योंकि उस समय उनके पिता की पोस्टिंग बाड़मेर में थी और उनका गृहनगर भी बाड़मेर ही है।

वे बताते हैं कि बचपन में उन्होंने देखा कि एयरफोर्स के पायलट भी पुलिस लाइन में रुकते थे, क्योंकि उन्हें एयर स्टेशन से दूर रखा जाता था ताकि किसी एयरपोर्ट के नष्ट होने पर सभी पायलट एक साथ नुकसान में न आएं। उन्होंने इन पायलटों को रात-रात भर तैयारी करते देखा, जो सुबह पाकिस्तान पर हमला करते थे, जबकि पुलिस के ड्राइवर सेना की गाड़ियां चलाते थे।

चैन सिंह के मुताबिक बाड़मेर के कई पुलिस अधिकारी भी युद्ध में गए। पाकिस्तान के भीतर जब भारतीय सेना ने विजय प्राप्त की, तो उसमें सेना के साथ-साथ राजस्थान पुलिस भी शामिल थी और उनके पिता की अहम भूमिका रही, जो उनके लिए गर्व की बात है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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