गांव के सरकारी स्कूल से कृषि वैज्ञानिक बनने तक का सफर: एक शिक्षक की सलाह ने बदली डॉ अलख राम गौर की किस्मत छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 3
बालोद जिले के चिखली गांव के रहने वाले डॉ अलख राम गौर ने सरकारी स्कूल से अपनी शिक्षा शुरू की और एक शिक्षक के मार्गदर्शन में कृषि विज्ञान को अपना करियर बनाया। आज वे एक सफल कृषि वैज्ञानिक के रूप में किसानों को आधुनिक और टिकाऊ खेती के लिए प्रेरित कर रहे हैं।

सफलता की एक प्रेरणादायक कहानी

जीवन में कब, कौन सी बात आपको एक नई दिशा दिखा दे, यह कहना कठिन है। बालोद जिले के कृषि विज्ञान केंद्र में पदस्थ विषय वस्तु विशेषज्ञ डॉ अलख राम गौर की यात्रा इस बात का जीता-जागता प्रमाण है। एक ग्रामीण सरकारी स्कूल से निकलकर कृषि वैज्ञानिक बनने तक का उनका सफर बेहद संघर्षपूर्ण और प्रेरणादायक रहा है। डॉ गौर ने अपनी सफलता का पूरा श्रेय अपने एक शिक्षक को दिया है, जिनकी सलाह ने उनके भविष्य की रूपरेखा तैयार कर दी।

शिक्षक के शब्द बने जीवन का लक्ष्य

डॉ अलख राम गौर मूल रूप से बालोद जिले के दल्लीराजहरा क्षेत्र के चिखली गांव के निवासी हैं। उनकी प्रारंभिक शिक्षा गांव के ही सरकारी स्कूल में संपन्न हुई। जब वे 11वीं कक्षा के विद्यार्थी थे, तब उनके एक शिक्षक ने कक्षा में कृषि के क्षेत्र में मौजूद भविष्य की संभावनाओं और करियर के अवसरों के बारे में विस्तार से चर्चा की थी। यह चर्चा डॉ गौर के मन-मस्तिष्क पर गहरा प्रभाव छोड़ गई। उसी समय उन्होंने 11वीं में कृषि विषय का चयन करने का संकल्प ले लिया और ठान लिया कि वे इसी क्षेत्र में अपना भविष्य बनाएंगे।

शिक्षा के दौरान आई चुनौतियां

12वीं कक्षा उत्तीर्ण करने के बाद डॉ गौर ने कृषि महाविद्यालय में प्रवेश पाने के उद्देश्य से परीक्षा दी। उस समय उनका चयन मध्य प्रदेश के सतना जिले स्थित एक कॉलेज में हुआ था, लेकिन पारिवारिक कारणों और कॉलेज की अधिक दूरी के चलते उनके परिजनों ने उन्हें वहां जाने की अनुमति नहीं दी। अपना शैक्षणिक वर्ष खराब न हो, इस सोच के साथ उन्होंने ITI (कोपा) में दाखिला ले लिया। हालांकि, मन में हमेशा उस शिक्षक की कही हुई बातें गूंजती रहती थीं कि कृषि क्षेत्र में ही असली उज्ज्वल भविष्य है। अंततः, उन्होंने ITI की पढ़ाई बीच में ही छोड़कर पूरी निष्ठा के साथ कृषि प्रवेश परीक्षा यानी PAT की तैयारी में जुटने का निर्णय लिया।

पहली काउंसलिंग में मिली असफलता

उस दौर में छत्तीसगढ़ के रायपुर, जगदलपुर, बिलासपुर और अंबिकापुर के सरकारी कृषि महाविद्यालयों में कुल मिलाकर लगभग 160 सीटें ही उपलब्ध हुआ करती थीं। पहली काउंसलिंग की प्रक्रिया के दौरान डॉ गौर का चयन नहीं हो सका, जिससे वे थोड़े निराश जरूर हुए लेकिन उन्होंने हिम्मत नहीं हारी। उन्होंने अपनी तैयारी जारी रखी और दूसरी काउंसलिंग में आखिरकार उन्हें जगदलपुर स्थित कृषि महाविद्यालय में प्रवेश मिल गया। वहां से उन्होंने बीएससी एग्रीकल्चर की डिग्री प्राप्त की और उसके बाद मृदा विज्ञान एवं कृषि रसायन में एमएससी की पढ़ाई पूरी की।

ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी से कृषि वैज्ञानिक तक

उच्च शिक्षा प्राप्त करने के बाद, डॉ गौर का चयन कृषि विभाग में ग्रामीण कृषि विस्तार अधिकारी के पद पर हो गया। उन्होंने इस भूमिका में करीब तीन से चार वर्षों तक अपनी सेवाएं दीं। इसी समय के दौरान, इंदिरा गांधी कृषि विश्वविद्यालय रायपुर में विषय वस्तु विशेषज्ञ (मृदा विज्ञान) के पदों पर भर्तियां निकाली गईं। इन सीमित पदों पर प्रतिस्पर्धा कड़ी थी, लेकिन अपने शानदार शैक्षणिक रिकॉर्ड और प्रदर्शन के दम पर डॉ गौर ने सफलता हासिल की और नियुक्त हो गए। वर्ष 2012 में उनकी पहली पदस्थापना कृषि विज्ञान केंद्र, जशपुर में हुई थी। वहां लगभग 8 वर्षों तक किसानों के साथ जमीन पर रहकर काम करने के बाद, उनका स्थानांतरण कृषि विज्ञान केंद्र, बालोद में हुआ। वर्तमान में वे यहीं अपनी सेवाएं दे रहे हैं। नौकरी के साथ-साथ उन्होंने अपने अध्ययन को भी जारी रखा और तीन वर्षों तक पीएचडी की पढ़ाई पूरी की।

पारिवारिक पृष्ठभूमि और खेती का लगाव

डॉ गौर अपने पारिवारिक जीवन के बारे में बताते हैं कि उनके पिता किराना व्यवसाय चलाते थे, लेकिन साथ ही वे खेती-किसानी से भी जुड़े हुए थे। बचपन से ही कृषि के वातावरण में पले-बढ़े होने के कारण, मिट्टी और फसलों के प्रति उनका लगाव स्वाभाविक रूप से मजबूत होता गया। यही वजह रही कि जब उन्होंने वैज्ञानिक बनने का सपना देखा, तो उसमें कृषि ही उनके लिए सबसे स्वाभाविक विकल्प बना।

मिट्टी की उर्वरता बचाने के लिए विशेष सलाह

एक मृदा वैज्ञानिक के तौर पर डॉ अलख राम गौर किसानों को रासायनिक उर्वरकों के अंधाधुंध इस्तेमाल को लेकर हमेशा सचेत करते रहते हैं। उनका स्पष्ट मानना है कि लंबे समय तक केवल रसायनों पर निर्भर रहना मिट्टी के स्वास्थ्य और उर्वरता के लिए घातक हो सकता है। वे किसानों को यह सलाह देते हैं कि डीएपी, सिंगल सुपर फॉस्फेट या पोटाश जैसे उर्वरकों का उपयोग करते समय उन्हें केंचुआ खाद या कंपोस्ट खाद के साथ मिलाना चाहिए। डॉ गौर के अनुसार, इस तरीके से मिट्टी की जैविक सक्रियता बनी रहती है, पोषक तत्वों का संतुलन बेहतर होता है और अंततः फसल उत्पादन टिकाऊ तरीके से बढ़ता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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