भारत
5 दिन पहले
21
विचारों
तृणमूल कांग्रेस में टूट बंगाल विधानसभा और लोकसभा दोनों जगह हुई, मगर दोनों जगह इसका तरीका बिल्कुल अलग रहा। लोकसभा में पार्टी के 20 बागी सांसदों ने एक अनजान दल में विलय कर लिया, जबकि बंगाल विधानसभा में अलग हुए 58 विधायकों ने नया गुट बनाकर खुद के असली पार्टी होने का दावा ठोक दिया। सवाल यही है कि लोकसभा के बागी सांसदों ने अपना अलग गुट क्यों नहीं बनाया।
अब यह बात सबको पता है कि तृणमूल कांग्रेस के 20 सांसदों ने बगावत करके त्रिपुरा की एक अनजान पार्टी नेशनलिस्ट सिटीजेन्स पार्टी ऑफ इंडिया में विलय कर लिया है। हैरानी की बात यह रही कि इन बागियों ने न तो अपना नया गुट बनाया और न ही खुद के असली टीएमसी होने जैसा कोई दावा किया, जैसा देश में शिव सेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी के मामले में हो चुका है। शुरुआत में इन सांसदों ने संकेत दिए थे कि वे लोकसभा में अलग गुट बनाएंगे, असली टीएमसी होने का दावा करेंगे और पार्टी के चुनाव चिन्ह पर भी कब्जा जमाएंगे। लेकिन जब वे नेशनलिस्ट सिटीजेन्स पार्टी ऑफ इंडिया के साथ चले गए तो हर कोई चौंक गया।
शुरुआत में बागी कह रहे थे, अलग गुट बनाएंगे
पश्चिम बंगाल में तृणमूल कांग्रेस के भीतर जब बगावत की सुगबुगाहट शुरू हुई, तब मीडिया और राजनीतिक गलियारों में यही चर्चा थी कि बागी सांसद एक नया गुट बनाएंगे और ममता बनर्जी के खिलाफ जाकर “असली टीएमसी” होने का दावा करेंगे। इसके पीछे कुछ ठोस राजनीतिक आधार भी थे, लेकिन बाद में कानूनी हकीकत और बदली हुई रणनीति के चलते उन्हें अपना इरादा बदलना पड़ा।
देश में जब दलबदल की बड़ी घटनाएं हुईं, जैसे महाराष्ट्र में एकनाथ शिंदे या अजीत पवार का मामला, तब बागी गुटों को चुनाव आयोग से असली पार्टी का नाम और चुनाव चिन्ह मिल गया था। टीएमसी के बागी सांसदों को भी शुरुआत में लगा कि वे दिल्ली में बैठी सरकार और कानूनी जानकारों की मदद से यही फॉर्मूला बंगाल में दोहरा सकते हैं। वे चाहते थे कि ममता बनर्जी को राजनीतिक रूप से अलग-थलग कर पूरी पार्टी पर ही कब्जा कर लिया जाए।
तब मिली थी साफ चेतावनी
जब इस बगावत की कानूनी पटकथा लिखी जाने लगी, तो देश के बड़े संविधान विशेषज्ञों और वकीलों ने बागी सांसदों को साफ चेतावनी दी कि “ममता बनर्जी की टीएमसी और उद्धव ठाकरे की शिवसेना में जमीन-आसमान का अंतर है।”
चुनाव आयोग में ‘असली पार्टी’ साबित करने के लिए सिर्फ 2-4 सांसदों का होना काफी नहीं होता। इसके लिए लोकसभा, राज्यसभा, बंगाल विधानसभा और सबसे अहम पार्टी की राष्ट्रीय कार्यकारिणी में बहुमत दिखाना पड़ता है। बंगाल विधानसभा में भी टीएमसी विधायकों के बीच भारी टूट हुई, जहां ऋतब्रत बनर्जी की अगुवाई में 80 में से 58 विधायकों ने अलग जाकर नया गुट बना लिया और खुद को असली टीएमसी बताया। वे साफ कह रहे हैं कि उनका इरादा बीजेपी और एनडीए के साथ जाने का नहीं है। दिलचस्प यह है कि लोकसभा के बागी सांसद एक अनजान पार्टी में विलीन हो गए, जबकि विधानसभा के बागियों ने खुद के असली होने का दावा किया। हालांकि विधायकों के लिए भी अब यह राह आसान नहीं रहेगी, क्योंकि सांसद उनके साथ नहीं हैं और राष्ट्रीय कार्यकारिणी में भी उनका दबदबा नहीं है।
यह खतरा भी मंडरा रहा था
अगर बागी सांसद “असली टीएमसी” का दावा ठोकते, तो यह मामला चुनाव आयोग में महीनों या सालों खिंचता। इस बीच ममता बनर्जी लोकसभा अध्यक्ष के पास जाकर इन सांसदों को ‘पार्टी विरोधी गतिविधियों’ के आधार पर अयोग्य घोषित करने की अर्जी दे सकती थीं। मामला कोर्ट या आयोग में लंबित रहने तक तकनीकी रूप से इनकी संसद सदस्यता रद्द होने का पूरा खतरा बना हुआ था।
यही वजह रही कि शुरुआत में “असली टीएमसी” के दावे की हवा बनाने के बाद बागी नेताओं ने अचानक अपनी रणनीति बदल दी। उन्हें समझ आ गया कि ममता बनर्जी से नाम और सिंबल छीनना कानूनी रूप से आत्मघाती साबित होगा। अपनी सांसदी पूरी तरह सुरक्षित रखने के लिए उन्होंने आक्रामक दावे की रणनीति छोड़ दी और चुपचाप दलबदल कानून की सुरक्षित गली, यानी नेशनलिस्ट सिटीजेन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) में विलय का रास्ता चुन लिया।
नई पार्टी में विलय की तीन वजहें
1. संगठन पर पूरी पकड़ न होना
चुनाव आयोग के नियमों के मुताबिक “असली पार्टी” होने का दावा करने के लिए केवल सांसदों या विधायकों का बहुमत काफी नहीं होता। आयोग यह देखता है कि पार्टी के संगठनात्मक ढांचे, जैसे राष्ट्रीय कार्यकारिणी, राज्य इकाइयां और जिला अध्यक्षों में किसका दबदबा है। तृणमूल कांग्रेस के पूरे संगठन, वर्किंग कमेटी और जमीनी कार्यकर्ताओं पर ममता बनर्जी की पकड़ पूरी तरह मजबूत है।
2. दलबदल कानून की बाध्यता
भारत का दलबदल विरोधी कानून सांसदों को केवल नया गुट बनाकर अलग होने की इजाजत नहीं देता। पहले नियम था कि अगर एक-तिहाई सांसद अलग गुट बना लें तो उनकी सदस्यता बच जाती थी, जिसे ‘स्प्लिट’ या विभाजन कहा जाता था। साल 2003 में कानून बदलकर इस छूट को पूरी तरह खत्म कर दिया गया।
3. अनजान पार्टी ही क्यों चुनी
चूंकि कानूनन किसी दूसरी पार्टी में विलय ही एकमात्र रास्ता था, तो सवाल उठता है कि उन्होंने नेशनलिस्ट सिटीजेन्स पार्टी ऑफ इंडिया को ही क्यों चुना। इसके पीछे भी सोची-समझी रणनीति है। अगर बागी सांसद बीजेपी, कांग्रेस या किसी अन्य बड़ी पार्टी में शामिल होते, तो उन्हें उस पार्टी के आलाकमान के निर्देशों पर चलना पड़ता। NCPI इतनी छोटी और प्रभावहीन पार्टी थी कि उसमें शामिल होते ही इन बागी सांसदों ने व्यावहारिक रूप से पूरे दल के नियंत्रण पर कब्जा कर लिया।
विधायकों ने अलग रास्ता क्यों चुना
टीएमसी के कुल 80 विधायकों में से 58 ने अलग गुट बनाकर विधानसभा में फिलहाल स्पीकर से मुख्य विपक्षी दल की मान्यता हासिल कर ली है। यह संख्या कुल विधायकों के दो-तिहाई से कहीं ज्यादा है। चूंकि इनके पास विधायकों का भारी बहुमत है, इसलिए ये खुद को किसी दूसरी पार्टी में विलीन करने के बजाय विधानसभा के रिकॉर्ड में खुद को ही ‘मूल टीएमसी’ स्थापित करने की कानूनी लड़ाई लड़ रहे हैं।
राजनीतिक विश्लेषकों का मानना है कि विधायकों का अगला कदम पूरी तरह कानूनी और अदालती फैसलों पर निर्भर करेगा। यदि विधानसभा अध्यक्ष या सुप्रीम कोर्ट इनके “असली टीएमसी” होने के दावे को खारिज कर देता है, तो दलबदल विरोधी कानून के तहत सदस्यता बचाने के लिए इनके पास भी वही एकमात्र रास्ता बचेगा जो सांसदों ने अपनाया है, यानी NCPI या किसी अन्य पंजीकृत दल में औपचारिक विलय।
लोकसभा और विधानसभा में अलग रणनीति की वजह
यह भारतीय राजनीति की बेहद दिलचस्प और उलझी हुई कानूनी लड़ाई है। तकनीकी रूप से ऋतब्रत बनर्जी पश्चिम बंगाल विधानसभा में संख्या बल के दम पर खुद के “असली टीएमसी” होने का दावा कर पा रहे हैं। दलबदल विरोधी कानून (10वीं अनुसूची) के तहत अगर दो-तिहाई (2/3) से कम सदस्य अलग होते हैं, तो उन्हें किसी दूसरी पार्टी में विलीन होना ही पड़ता है, वरना सदस्यता चली जाती है।
लोकसभा में कुल 28 सांसदों में से 20 बागी हुए, हालांकि यह संख्या अब भी घट-बढ़ सकती है। शुरुआत में बागियों को लगा कि सिर्फ 20 सांसदों के दम पर पूरी टीएमसी पर दावा ठोकना कमजोर पड़ सकता है, इसलिए सदस्यता तुरंत बचाने के लिए उन्होंने सुरक्षित रास्ता अपनाते हुए पहले ही दिन NCPI में विलय कर लिया। हालांकि वरिष्ठ सांसद सुदीप बंदोपाध्याय ने कहा है कि वे भी जुलाई में संसद सत्र के दौरान ‘मूल टीएमसी’ होने का दावा करेंगे।
बंगाल विधानसभा में टीएमसी के कुल 80 विधायक जीते हैं। ऋतब्रत बनर्जी के पास 64 विधायकों का समर्थन है, जो दो-तिहाई (53 विधायक) के आंकड़े से कहीं अधिक है। प्रचंड बहुमत होने के कारण वे ‘दिखावे की कमजोरी’ या किसी अन्य दल में विलय का ठप्पा नहीं लगवाना चाहते। वे सीधे फ्रंट-फुट पर खेलते हुए कह रहे हैं, “चूंकि 80 में से 64 विधायक हमारे साथ हैं, इसलिए मूल विधायी दल हम ही हैं।”
ऋतब्रत बनर्जी के दावे को सबसे बड़ा बल इस बात से मिला है कि बंगाल विधानसभा के स्पीकर ने उन्हें आधिकारिक रूप से ‘नेता प्रतिपक्ष’ के तौर पर स्वीकार कर लिया है। आखिरकार यह मामला सुप्रीम कोर्ट और चुनाव आयोग के पास पहुंचेगा। वहां दिल्ली के बागी सांसद, जो फिलहाल NCPI में हैं, और बंगाल के बागी विधायकों का ऋतब्रत गुट मिलकर चुनाव आयोग के सामने यह साबित करने की कोशिश करेंगे कि संसद और विधानसभा दोनों में उनके पास दो-तिहाई बहुमत है, इसलिए ममता का गुट अल्पसंख्यक हो चुका है और असली “तृणमूल कांग्रेस” तथा उसका चुनाव चिन्ह उन्हें ही मिलना चाहिए।
Comments
0 comment