भारत
5 दिन पहले
17
विचारों
पश्चिम बंगाल की राजनीति में इन दिनों एक ऐसी पार्टी सबसे ज्यादा चर्चा बटोर रही है, जिसका नाम दो दिन पहले तक शायद ही किसी ने सुना हो। नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया (NCPI) का कोई उम्मीदवार आज तक विधानसभा चुनाव नहीं जीत पाया है, फिर भी जल्द ही इसके पास 20 सांसद हो सकते हैं। इतने सांसदों के साथ यह दल राष्ट्रीय स्तर पर अपनी अलग पहचान बना लेगा।
कहां-कहां है पार्टी की मौजूदगी
पश्चिम बंगाल, असम और त्रिपुरा जैसे पूर्वोत्तर राज्यों में NCPI का अस्तित्व रहा है। ध्यान देने वाली बात यह है कि बांग्लादेश में भी एनसीपी नाम का एक दल है, मगर उसका NCPI से कोई संबंध नहीं है। बांग्लादेश की एनसीपी 2025 के छात्र आंदोलन से निकली पार्टी है। इसी तरह शरद पवार या अजित पवार की एनसीपी से भी इस पार्टी का कोई वास्ता नहीं है। शरद पवार की एनसीपी वर्षों पहले कांग्रेस से अलग होकर बनी थी।
विलय पर शांतनु डे ने क्या कहा
पार्टी में टीएमसी के 20 सांसदों के विलय को लेकर इसके संस्थापक और राष्ट्रीय संगठन सचिव शांतनु डे ने अपनी प्रतिक्रिया दी। उन्होंने कहा, "आज सुबह हमारी पार्टी के नेताओं की एक ऑनलाइन बैठक हुई, जिसमें हमने इसका स्वागत किया। अब तक पार्टी से जुड़े फैसले मैं ही लेता रहा हूं, लेकिन सदस्यों से सलाह-मशविरा करके। मैंने शेवली कुंडू को कई बार फोन किया, पर उन्होंने व्यस्त होने की बात कही। उनके पति, जो पार्टी के कोषाध्यक्ष थे, उनका नंबर स्विच ऑफ है। हमें यह जानकारी नहीं है कि उन्होंने इस्तीफा दिया है या नहीं। पार्टी 2023 में रजिस्टर हुई थी और 2025 के बाद उन्होंने हमसे बात करना बंद कर दिया। हम पार्टी चलाना चाहते थे, मगर आर्थिक दिक्कतें आड़े आ रही थीं। मैं 2022 से पार्टी के लिए काम कर रहा हूं। हमने त्रिपुरा में एनडीए का समर्थन किया था।"
2022 से दर्ज है अमान्यता प्राप्त दल के रूप में
निर्वाचन आयोग के रिकॉर्ड के मुताबिक नेशनलिस्ट सिटिजन्स पार्टी ऑफ इंडिया 2022 से एक अमान्यता प्राप्त (अनरिकॉग्नाइज्ड) राजनीतिक दल के तौर पर पंजीकृत है। जिन दलों के पास क्षेत्रीय या राष्ट्रीय पार्टी का दर्जा पाने लायक वोट शेयर नहीं होता, या जो चुनाव ही नहीं लड़ते, उन्हें इसी श्रेणी में रखा जाता है। जैसे ही कोई दल चुनाव लड़कर जरूरी वोट प्रतिशत हासिल कर लेता है, उसका दर्जा बदल दिया जाता है।
2023 में लड़ा था विधानसभा चुनाव
त्रिपुरा की राजनीति को करीब से देखने वाले लोग भी इस पार्टी के बारे में ज्यादा कुछ नहीं बता पाते, क्योंकि यह बेहद गुमनाम रही है। चुनाव जीतना और जोरदार प्रचार करना तो दूर, इसका कोई भी प्रत्याशी नोटा से बहुत ज्यादा वोट तक नहीं जुटा सका। 2023 के त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में NCPI के उम्मीदवारों ने 2 सीटों पर ताल ठोकी, पर हर जगह करारी हार मिली। खबरों के अनुसार पार्टी मेघालय में भी खुद को मजबूत करने में लगी है, जबकि पश्चिम बंगाल में यह अचानक तीसरी बड़ी ताकत बनने की ओर बढ़ रही है।
कौन हैं पार्टी के प्रमुख चेहरे
पार्टी की अध्यक्ष शेवली कुंडू हैं, जो कलकत्ता उच्च न्यायालय में वकील हैं। सल्कट दास इसके महासचिव और सुदाम जेटी कोषाध्यक्ष हैं। शेवली के पति उत्तिया कुंडू पार्टी के उपाध्यक्ष हैं और पेशे से शिक्षक हैं। NCPI ने 2023 में त्रिपुरा के धलाई जिले की चावमानु सीट, उनाकोटी जिले की कैलाशहर सीट के साथ ही अम्बासा और करमचारा सीट पर अपने प्रत्याशी उतारे थे। इनमें से दो उम्मीदवारों की दावेदारी रद्द हो गई थी। चावमानु और कैलाशहर सीटों पर चुनाव लड़ते हुए पार्टी के उम्मीदवारों को कुल मिलाकर 822 वोट (0.03 प्रतिशत) मिले थे।
कभी दलबदल के खिलाफ दिया था नारा
दिलचस्प बात यह है कि इसी पार्टी ने 2023 के विधानसभा चुनाव में दलबदल के विरुद्ध नारा गढ़ा था। इसमें कहा गया था कि "अपने अधिकारों की रक्षा के लिए राजनीतिक दलबदलुओं को अस्वीकार करें।" पार्टी के चुनावी पोस्टर पर भी यही संदेश था कि "अपने अधिकारों की रक्षा के लिए, राजनीतिक दलबदलुओं को नकारें। सामाजिक कार्यकर्ताओं का समर्थन करें, न कि राजनीतिक हस्तियों का।" मगर अब यही पार्टी पश्चिम बंगाल के मौजूदा सबसे बड़े दलबदल की वजह से सुर्खियों में है।
दलबदल से हैरान पार्टी के पुराने प्रत्याशी
चावमानु से पार्टी के उम्मीदवार रहे बरजेदा त्रिपुरा इस पूरे घटनाक्रम से हैरान दिखे। उन्होंने कहा, "मैंने 2023 में चुनाव लड़ा था। अब तीन साल बाद यह सब कैसे हो गया?" लोकसभा के 20 सदस्यों के NCPI में विलय की खबर सुनकर उन्हें यकीन ही नहीं हुआ। उन्हें इस बात पर अचरज था कि जिस पार्टी का नाम अब राष्ट्रीय राजनीतिक हलकों में गूंज रहा है, उसी ने कभी उन्हें त्रिपुरा विधानसभा चुनाव में मैदान में उतारा था। बरजेदा ने बताया कि वह दिहाड़ी मजदूर हैं। उन्होंने कहा, "2023 में कृष्ण देबबर्मा नाम के एक व्यक्ति ने मुझसे संपर्क किया था और उन्हीं के कहने पर मैंने चुनाव लड़ा। कई साल पहले मैं कांग्रेस का समर्थक रहा हूं।" हालांकि कृष्ण देबबर्मा से संपर्क नहीं हो पाया। बरजेदा के चुनावी हलफनामे के अनुसार 2023 में उनकी उम्र 62 वर्ष थी। उन्होंने आठवीं तक पढ़ाई की थी, चार लाख रुपये की संपत्ति घोषित की थी और अपने पेशे में समाजसेवा से जुड़े होने का उल्लेख किया था।
चावमानु में नोटा से सिर्फ 36 वोट आगे
चावमानु सीट पर भारतीय जनता पार्टी के शंभू लाल चकमा विजयी रहे थे। उन्होंने टिपरा मोथा के हांगसा कुमार त्रिपुरा को 2,899 मतों के अंतर से शिकस्त दी थी। बरजेदा 536 वोट के साथ पांचवें स्थान पर रहे और 'नोटा' पर पड़े 500 वोट से बस मामूली अंतर से आगे थे। पार्टी के बाकी उम्मीदवार अम्बासा, करमचारा और कैलाशहर सीटों से मैदान में थे। इनमें करमचारा और अम्बासा सीट टिपरा मोथा के खाते में गईं, जबकि कैलाशहर से कांग्रेस ने जीत हासिल की।
Comments
0 comment