झारखंड
3 घंटे पहले
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मानसून की पहली फुहारों के साथ ही गांव-देहात के खेतों में हलचल तेज हो जाती है। किसान धान की नर्सरी तैयार करने में लग जाते हैं और इसी के साथ खरीफ सीजन की खेती की शुरुआत हो जाती है। झारखंड समेत समूचे पूर्वी भारत में धान को किसानों की पहली पसंद माना जाता है। लेकिन अब कृषि वैज्ञानिक किसानों को एक ऐसी फसल उगाने का सुझाव दे रहे हैं, जो कम लागत में धान के मुकाबले बेहतर कमाई करा सकती है। यह फसल है सोयाबीन, जिसकी मांग देशभर के बाजारों में लगातार बढ़ रही है। यही वजह है कि कई किसान अब धान के साथ-साथ सोयाबीन की खेती की ओर भी कदम बढ़ा रहे हैं।
कृषि वैज्ञानिक की राय
देवघर कृषि विज्ञान केंद्र के कृषि वैज्ञानिक डॉ. विवेक कश्यप का कहना है कि जून और जुलाई का महीना खरीफ फसलों की बुवाई के लिहाज से सबसे अहम होता है। इस अवधि में अगर किसान सही फसल का चुनाव कर लें तो कम समय में अच्छी आमदनी हासिल की जा सकती है। उनके मुताबिक सोयाबीन एक ऐसी फसल है जो कम लागत में बढ़िया पैदावार देती है और बाजार में इसका दाम भी किसानों को ठीक-ठाक मिल जाता है। यही कारण है कि बीते कुछ वर्षों में सोयाबीन की खेती का चलन निरंतर बढ़ता जा रहा है।
कौन-सी किस्में हैं बेहतर
डॉ. कश्यप के अनुसार झारखंड के किसानों के लिए बिरसा सोयाबीन-01, बिरसा सफेद सोयाबीन-02 और आरटीएस-18 जैसी उन्नत किस्में काफी उपयुक्त हैं। ये किस्में यहां की जलवायु और मिट्टी के अनुरूप तैयार की गई हैं। इनकी सबसे बड़ी खूबी यह है कि इन पर कीटों और कई आम बीमारियों का असर तुलनात्मक रूप से कम पड़ता है, जिससे किसानों को बार-बार कीटनाशक छिड़कने की जरूरत नहीं पड़ती और खेती की लागत भी घट जाती है। कम खर्च और बेहतर उत्पादन का यही तालमेल किसानों के लिए मुनाफे का सौदा साबित होता है।
100 दिनों में तैयार हो जाती है फसल
डॉ. कश्यप ने बताया कि सोयाबीन की खेती सिर्फ झारखंड तक सीमित नहीं है। पश्चिम बंगाल, छत्तीसगढ़, असम और उत्तर-पूर्व के कई राज्यों में भी इसकी बड़े पैमाने पर खेती की जाती है। इस फसल को बहुत अधिक देखभाल की जरूरत नहीं होती और सामान्य कृषि प्रबंधन के साथ भी अच्छी उपज मिल जाती है। बुवाई के करीब 40 से 45 दिनों बाद पौधों में फूल आने लगते हैं, जिससे किसानों को फसल की स्थिति का अंदाजा हो जाता है। वहीं लगभग 100 दिनों में फसल पूरी तरह पककर कटाई के लिए तैयार हो जाती है।
15 जून के बाद कर सकते हैं बुवाई
कृषि वैज्ञानिक का कहना है कि सोयाबीन की बुवाई जून के दूसरे सप्ताह से लेकर जुलाई के पहले सप्ताह तक कर लेनी चाहिए। यही समय सबसे उपयुक्त माना जाता है, क्योंकि मानसून की शुरुआती बारिश से खेतों में पर्याप्त नमी बनी रहती है और बीजों का अंकुरण बेहतर होता है। हालांकि किसानों को इस बात का खास ध्यान रखना चाहिए कि खेत में पानी न जमा हो, क्योंकि अधिक जलभराव फसल को नुकसान पहुंचा सकता है। अच्छी जल निकासी वाली जमीन में सोयाबीन की उपज ज्यादा बेहतर रहती है।
20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर उपज
उत्पादन की बात करें तो उन्नत किस्मों और वैज्ञानिक तरीके से खेती करने पर किसान 20 से 25 क्विंटल प्रति हेक्टेयर तक उपज प्राप्त कर सकते हैं। बाजार में सोयाबीन का इस्तेमाल तेल, पशु आहार और कई खाद्य उत्पादों के निर्माण में होता है, इसलिए इसकी मांग पूरे साल बनी रहती है। मांग ज्यादा होने के कारण किसानों को अपनी उपज बेचने में भी ज्यादा दिक्कत नहीं होती। यही वजह है कि सोयाबीन को कम लागत में अधिक मुनाफा देने वाली फसलों में गिना जाता है।
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