छत्तीसगढ़: सरगुजा में आज भी कायम है पारंपरिक तरीके से माठा बनाने की अनूठी परंपरा छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 2
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में आधुनिक युग में भी लोग 10 से 20 साल पुरानी पद्धति से लकड़ी की मथनी का उपयोग करके शुद्ध देसी माठा और घी तैयार कर रहे हैं।

सरगुजा की पारंपरिक धरोहर

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में आज भी जीवन की सादगी और परंपराएं पूरी तरह जीवित हैं। बदलते दौर और मशीनीकरण के इस युग में, जहां लोग सुविधाओं के पीछे भाग रहे हैं, वहीं इस इलाके के कुछ लोग अपनी पुरानी संस्कृति को संजोए हुए हैं। यहाँ माठा और घी तैयार करने के लिए आज भी 10 से 20 साल पुरानी पारंपरिक विधि का उपयोग किया जाता है। इस प्रक्रिया में किसी भी आधुनिक मशीन या लोहे के उपकरण के बजाय पूरी तरह से प्राकृतिक संसाधनों का इस्तेमाल होता है, जो इसे आज के समय में भी बेहद खास और स्वास्थ्यवर्धक बनाता है।

लकड़ी की मथनी का महत्व

इस अनूठी परंपरा के बारे में विस्तार से जानकारी देते हुए रतन माझी बताते हैं कि माठा तैयार करने के लिए इस्तेमाल की जाने वाली मथनी को विशेष रूप से लकड़ी के डंडे को काटकर बनाया जाता है। इस मथनी के दोनों तरफ पैर जैसे आकार दिए जाते हैं, जो दही को मथने में मदद करते हैं। रतन के अनुसार, इस प्रकार की मथनी आजकल बाजार में बहुत मुश्किल से ही देखने को मिलती है। उन्हें यह कला विरासत में मिली है और उनके पूर्वजों ने ही उन्हें यह विधि सिखाई है। रतन का मानना है कि लोहे या अन्य धातु के उपकरणों का इस्तेमाल करके हाथ से बनाया गया माठा न तो स्वास्थ्य के लिए अच्छा होता है और न ही उसका स्वाद पारंपरिक मथनी से बने माठे जैसा मिल पाता है।

स्वास्थ्य और स्वाद का अनूठा मेल

पारंपरिक तरीके से बने इस माठे की मांग गांव में काफी अधिक रहती है। लोग इसे स्वास्थ्य के लिहाज से भी बेहतर मानते हैं। रतन माझी पिछले 10 से 20 सालों से लगातार इसी पुरानी पद्धति का पालन कर रहे हैं। उनके इस काम की न केवल तारीफ होती है, बल्कि गांव के लोग भी शुद्धता के कारण इसे काफी पसंद करते हैं। इस प्रक्रिया में रस्सी और लकड़ी का उपयोग करके दही को मथा जाता है।

माठा तैयार करने की प्रक्रिया

रतन माझी बताते हैं कि माठा बनाने का काम लगभग साल भर चलता है, लेकिन बरसात के मौसम में दूध की उपलब्धता अधिक होती है। जब लकड़ी की मथनी को रस्सी की मदद से घुमाया जाता है, तो दही से मक्खन यानी घी अलग होकर ऊपर आ जाता है और शुद्ध माठा नीचे रह जाता है। यह पूरी प्रक्रिया पूर्णतः प्राकृतिक होती है, जिससे दूध के पोषक तत्व बरकरार रहते हैं और इसका स्वाद भी अतुलनीय होता है। सरगुजा के लोग अपनी जड़ों से जुड़ी इस परंपरा को आज भी गर्व के साथ आगे बढ़ा रहे हैं, जो आधुनिक मशीनों के दौर में एक मिसाल है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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