जंगल की देन शारू सुकटी: छत्तीसगढ़ के सरगुजा की पुरानी परंपरा, टमाटर और पसिया से खिलता है स्वाद छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 5
छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले में आदिवासी समाज आज भी जंगल से मिलने वाले शारू का सेवन करते हैं, जिसे सुखाकर सुकटी बनाई जाती है और सदियों से इसे पारंपरिक तरीके से पकाकर खाया जा रहा है।

सरगुजा की अनूठी खानपान संस्कृति

छत्तीसगढ़ का सरगुजा जिला अपनी प्राकृतिक सुंदरता और समृद्ध आदिवासी संस्कृति के लिए जाना जाता है। यहाँ के निवासियों के लिए जंगल केवल जीविका का आधार ही नहीं है, बल्कि उनकी खानपान की परंपराओं का एक अटूट हिस्सा भी है। इसी परंपरा में 'शारू सुकटी' का नाम प्रमुखता से लिया जाता है। यह जंगल में प्राकृतिक रूप से मिलने वाला एक विशेष साग है, जिसे स्थानीय ग्रामीण काफी पसंद करते हैं। इसे तोड़कर लाने से लेकर सुखाने और पकाने तक की प्रक्रिया आज भी पारंपरिक ढंग से पूरी की जाती है।

कैसे तैयार की जाती है शारू सुकटी

असकरा गांव के निवासी रामनाथ किंडो बताते हैं कि शारू जंगल में स्वतः उगने वाली एक वनस्पति है। ग्रामीण इसे सावधानीपूर्वक जंगल से इकट्ठा करते हैं और फिर इसे कड़ी धूप में पूरी तरह से सुखा लिया जाता है। सुखाकर सुरक्षित रखने का मुख्य उद्देश्य यह होता है कि इसे जरूरत पड़ने पर किसी भी मौसम में इस्तेमाल किया जा सके। सूख जाने के बाद, इसे पीसकर या गुड़ा बनाकर लंबे समय के लिए संरक्षित (स्टोर) कर लिया जाता है। यह प्राचीन विधि पीढ़ियों से चली आ रही है और स्थानीय लोग इसे आधुनिक युग में भी अपनाए हुए हैं।

स्वाद बढ़ाने का खास तरीका

शारू सुकटी को बनाने की विधि बहुत ही सरल और स्वादिष्ट है। ग्रामीण इसे तैयार करने के लिए तेल, लहसुन, मिर्च और टमाटर का उपयोग करते हैं। इसे पकाने की प्रक्रिया के बारे में सुखमनी नाम की एक ग्रामीण महिला ने बताया कि सबसे पहले तेल में लहसुन और मिर्च का तड़का लगाया जाता है, उसके बाद इसमें शारू को भूनकर टमाटर मिलाए जाते हैं। यदि किसी समय टमाटर उपलब्ध न हो, तो ग्रामीण इसमें 'पसिया' यानी चावल का मांड मिलाते हैं। पसिया सब्जी को एक गाढ़ापन (टेक्सचर) प्रदान करता है और इसके स्वाद को कई गुना बढ़ा देता है।

पर्यटकों के बीच बढ़ती लोकप्रियता

यह पारंपरिक व्यंजन केवल स्थानीय ग्रामीणों तक ही सीमित नहीं है, बल्कि बाहर से आने वाले लोगों के बीच भी काफी चर्चा में रहता है। जो लोग दूसरे शहरों से सरगुजा घूमने आते हैं, वे अक्सर शारू सुकटी के बारे में उत्सुकता दिखाते हैं और इसके अनोखे स्वाद को चखकर इसे काफी पसंद भी करते हैं। ग्रामीणों के लिए यह गर्व की बात है कि जंगल से मिलने वाला उनका यह पारंपरिक भोजन आज भी उनकी थाली का सबसे महत्वपूर्ण हिस्सा बना हुआ है।

सदियों पुरानी विरासत

रामनाथ किंडो के अनुसार, शारू सुकटी कोई आधुनिक खोज नहीं है, बल्कि यह उनके पूर्वजों के समय से चली आ रही एक खानपान की शैली है। गांव के बुजुर्गों से लेकर नई पीढ़ी तक, सभी इस स्वाद से परिचित हैं। अलग-अलग मौसम और उपलब्धता के अनुसार, ग्रामीण इसे अपने दैनिक भोजन में शामिल करते रहते हैं। यह साग न केवल पोषण से भरपूर है बल्कि सरगुजा की मिट्टी से जुड़ी एक सांस्कृतिक पहचान भी है, जिसे यहां के लोग आज भी पूरे उत्साह के साथ संजोए हुए हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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