भारत
एक घंटा पहले
6
विचारों
धान की खेती और पानी का गहरा नाता
बिहार के जहानाबाद जिले समेत पूरे राज्य में धान की खेती का बड़े पैमाने पर चलन है। हमारे समाज में धान की खेती को लेकर एक पुरानी कहावत प्रचलित है कि 'धान, पान नित्य स्नान', जिसका सरल अर्थ यह है कि धान की फसल को लगातार पानी की आवश्यकता होती है। यदि धान के खेत में पर्याप्त पानी न हो, तो पैदावार पर सीधा असर पड़ता है। हालांकि, मौजूदा समय में गिरता हुआ भूजल स्तर और पानी की भारी किल्लत ने किसानों की चिंताएं बढ़ा दी हैं। अब सवाल यह उठता है कि क्या खेती के पारंपरिक तरीकों में बदलाव की जरूरत है, और आखिर धान की फसल के लिए इस्तेमाल होने वाले पानी की आपूर्ति कहां से की जाए?
एक किलो धान के लिए कितना पानी है जरूरी?
इस गंभीर विषय पर अधिक जानकारी के लिए हमने जहानाबाद स्थित कृषि विज्ञान केंद्र, गंधार के कृषि यंत्र विशेषज्ञ इंजीनियर जितेंद्र कुमार से बात की। उन्होंने धान की खेती में पानी की खपत को लेकर एक चौंकाने वाले तथ्य का खुलासा किया है। जितेंद्र कुमार के मुताबिक, एक किलो धान का उत्पादन करने के लिए सामान्यतः 3000 लीटर से 5000 लीटर तक पानी की खपत होती है। यह आंकड़ा यह सोचने पर मजबूर करता है कि हमारे राज्य में धान के कुल उत्पादन के लिए कितना विशाल जल संसाधन खर्च होता होगा। किसानों का मानना है कि यदि खेतों में पानी उपलब्ध नहीं होगा, तो फसल का बढ़ना असंभव है, और यह बात काफी हद तक सही भी है क्योंकि धान की जैविक प्रकृति अधिक नमी मांगती है।
परंपरागत खेती और वर्तमान चुनौतियां
इंजीनियर जितेंद्र कुमार ने आगे बताया कि परंपरागत रूप से किसान यह मानकर चलते हैं कि धान के खेत में हमेशा 3 से 4 सेंटीमीटर, यानी लगभग डेढ़ इंच पानी भरा रहना चाहिए। लेकिन आज परिस्थितियां पूरी तरह बदल चुकी हैं। जलवायु परिवर्तन के कारण अब खेतों में इतनी अधिक मात्रा में पानी जमा रखना न केवल मुश्किल है, बल्कि जल संसाधनों की कमी के चलते यह असंभव होता जा रहा है। हमारे आसपास पानी की उपलब्धता लगातार कम होती जा रही है, जिससे खेती के तौर-तरीकों पर दोबारा गौर करने की आवश्यकता आन पड़ी है।
घटता जलस्तर और आधुनिक तकनीक का महत्व
पानी के स्तर में आ रही गिरावट पर बात करते हुए विशेषज्ञ ने आगाह किया कि प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता वर्तमान में 1600 क्यूबिक मीटर है, जिसके आगे चलकर 1400 क्यूबिक मीटर प्रति व्यक्ति तक सिमट जाने का अनुमान है। इस घटते जलस्तर के दौर में अब पारंपरिक सिंचाई के बजाय वैज्ञानिक और आधुनिक दृष्टिकोण अपनाने की जरूरत है।
- सिंचाई इंडिकेटर: धान के खेतों में पानी के सटीक स्तर को मापने के लिए अब आधुनिक सिंचाई इंडिकेटर उपलब्ध हैं। इनकी मदद से किसान यह समझ सकते हैं कि खेत में पानी की कितनी जरूरत है और अनावश्यक पानी की बर्बादी को रोका जा सकता है।
- आधुनिक कृषि यंत्र: पानी की बचत के लिए नई मशीनें बाजार में आ चुकी हैं, जो यह सुनिश्चित करती हैं कि फसल को उसकी जरूरत के अनुसार ही पानी मिले।
जहानाबाद जैसे जिलों में, जहां भूजल एक बड़ी समस्या बन चुका है, वहां कृषि विज्ञान केंद्र जैसे संस्थानों द्वारा दी जा रही ये सलाहें और तकनीकी सहायता किसानों के लिए जीवन रक्षक साबित हो सकती हैं। धान की पैदावार बरकरार रखते हुए पानी का विवेकपूर्ण उपयोग ही भविष्य की खेती का एकमात्र आधार है।
Comments
0 comment