नौ साल नक्सलियों के साये में बीते, परिवार से रहे दूर... अब खाकी वर्दी में गढ़ रहे नई पहचान छत्तीसगढ़ 6 घंटे पहले 4
छत्तीसगढ़ के सुरेश मिंज नौ साल तक नक्सली संगठन से जुड़े रहने के बाद मुख्यधारा में लौटे और अब पुलिस आरक्षक बनकर सम्मानजनक जीवन जी रहे हैं।

छत्तीसगढ़ के सुरेश मिंज की कहानी अंधेरे से रोशनी की ओर लौटने की मिसाल है। कभी नक्सली संगठन का हिस्सा रहे सुरेश आज छत्तीसगढ़ पुलिस में आरक्षक के रूप में शपथ ले चुके हैं और वर्दी पहनकर खुद को गौरवान्वित महसूस कर रहे हैं। पूरे नौ साल नक्सल संगठन में बिताने के बाद वे मुख्यधारा से जुड़े और अब अपने नए जीवन से बेहद खुश हैं।

बाल संगठन से नक्सली संगठन तक का सफर

लोकल 18 से बातचीत में सुरेश मिंज ने बताया कि वर्ष 2006 में वे नक्सलियों के बाल संगठन और चेतना नाट्य मंडली से जुड़े थे। इसके अगले ही वर्ष यानी 2007 में उन्हें नक्सली संगठन में भर्ती कर लिया गया। संगठन में उन्हें प्रशिक्षण दिया गया और बाद में अबूझमाड़ क्षेत्र में तैनात कर दिया गया। शुरुआती दौर में वे एक वरिष्ठ नक्सली नेता के गनमैन के रूप में भी रहे।

अबूझमाड़ में जनताना स्कूलों की जिम्मेदारी

सुरेश ने बताया कि कुछ वर्षों बाद उन्हें अबूझमाड़ क्षेत्र में नक्सलियों द्वारा संचालित जनताना सरकार स्कूलों में भेजा गया। वहां शिक्षकों की कमी होने के कारण पढ़े-लिखे कैडरों को बच्चों को पढ़ाने का काम सौंपा जाता था। सुरेश पांच अलग-अलग स्कूलों के प्रभारी थे और एरिया कमेटी सदस्य (एसीएम) के रूप में जिम्मेदारी निभा रहे थे।

ग्रामीणों का शोषण देखकर बदला नजरिया

सुरेश के मुताबिक, संगठन में रहते हुए उन्होंने ग्रामीणों की दयनीय हालत को बेहद करीब से देखा। जनमिलिशिया और प्लाटून के नाम पर ग्रामीणों को कई-कई दिनों तक साथ रखा जाता था और उनसे सामान ढुलवाने समेत कई तरह के काम कराए जाते थे। अगर कोई व्यक्ति मजदूरी के लिए बाहर जाता तो लौटने पर उसे पुलिस मुखबिर बताकर प्रताड़ित किया जाता था। कई बार तो लोगों की हत्या तक कर दी जाती थी। इन घटनाओं ने उन्हें भीतर तक हिला दिया।

पुनर्वास नीति बनी प्रेरणा

सुरेश ने बताया कि वर्ष 2013-14 के दौरान सुरक्षा बलों ने एक जनताना स्कूल को ध्वस्त कर दिया था। वहीं उन्हें आत्मसमर्पण एवं पुनर्वास नीति से जुड़ी जानकारी और संपर्क नंबर मिले। इसके बाद उनके मन में मुख्यधारा में लौटने की इच्छा जागी। हालांकि नक्सलियों के बीच रहते हुए भागना बेहद जोखिम भरा था, क्योंकि संगठन को जरा भी शक होने पर जान का खतरा बना रहता था।

2016 में किया आत्मसमर्पण

लंबे सोच-विचार और पूरी सावधानी बरतने के बाद वर्ष 2016 में सुरेश मिंज नक्सली संगठन छोड़कर बाहर निकले और राजनांदगांव पुलिस अधीक्षक के समक्ष आत्मसमर्पण कर दिया। इसके बाद वे मुख्यधारा से जुड़ गए और पुलिस विभाग में आरक्षक के रूप में चयनित हुए।

जनताना स्कूल में हुई थी पत्नी से मुलाकात

सुरेश ने बताया कि उनकी पत्नी भी जनताना स्कूल में कार्यरत थीं। दोनों की पहली मुलाकात वहीं हुई और बाद में उन्होंने विवाह कर लिया। आज उनकी एक बेटी है और पूरा परिवार सामान्य जीवन जी रहा है।

मिली नई जिंदगी

दीक्षांत समारोह में सुरेश मिंज ने कहा कि पुलिस विभाग में आने के बाद उन्हें सम्मान, पहचान और परिवार के साथ रहने का अवसर मिला है। उन्होंने बताया कि नक्सली जीवन में तीन साल में सिर्फ एक बार घरवालों से मिलने का मौका मिलता था, जबकि अब वे परिवार और समाज के बीच रहकर सामान्य जीवन बिता रहे हैं। उन्होंने भावुक होते हुए कहा कि ऐसा महसूस होता है मानो अंधेरे से निकलकर एक नई रोशनी में आ गए हों।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!