राष्ट्रीय राजनीति
एक घंटा पहले
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विचारों
नेपाल की सत्ताधारी राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी के नेता रबी लामिछाने की हालिया दिल्ली यात्रा से जो सबसे अहम बात उभरकर आई है, वह यह कि प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी अब नेपाल के साथ संबंधों को एक नए नजरिए से गढ़ना चाहते हैं। पीएम मोदी ने नेपाली नेतृत्व को यह स्पष्ट संकेत दिया है कि अगर काठमांडू अपनी आगे की राजनीति को विकास की दिशा में मोड़ना चाहता है, तो भारत उसका सबसे भरोसेमंद साथी बनने को तैयार है।
पिछले कुछ वर्षों में दोनों देशों के संबंधों पर सीमा विवाद, राजनीतिक उठापटक और चीन की लगातार बढ़ती मौजूदगी जैसे मसले हावी रहे हैं। लेकिन लामिछाने की इस यात्रा ने यह संदेश दिया है कि भारत अब रिश्तों का एक ऐसा नया खाका तैयार करना चाहता है, जिसकी नींव टकराव के बजाय विकास, निवेश और स्थिरता पर टिकी हो।
हर बड़े नेता से संवाद, नई ताकतों तक पहुंच
नेपाल के किसी विपक्षी या गैर-पारंपरिक नेता को भारत में शायद ही कभी इतनी तवज्जो मिली हो। रबी लामिछाने की बातचीत सिर्फ प्रधानमंत्री मोदी तक सीमित नहीं रही। उन्होंने गृह मंत्री अमित शाह, विदेश मंत्री एस. जयशंकर, राष्ट्रीय सुरक्षा सलाहकार अजीत डोभाल और भाजपा नेतृत्व से भी मुलाकात की।
यह दिखाता है कि भारत नेपाल की उभरती राजनीतिक शक्तियों को समझने और उनसे सीधा संवाद बनाने की रणनीति पर आगे बढ़ रहा है। दरअसल भारत ने यह जता दिया है कि वह केवल पुराने जाने-पहचाने चेहरों के भरोसे नहीं रहेगा, बल्कि नेपाल में पनप रही नई राजनीतिक ताकतों के साथ भी अपने रिश्ते मजबूत करेगा।
मोदी का संदेश- प्राथमिकताएं तय करो, भारत साथ है
प्रधानमंत्री मोदी ने लामिछाने से कहा कि नेपाल अपनी प्राथमिकताएं साफ करे, भारत हरसंभव मदद देने को तैयार है। यह महज एक रूटीन कूटनीतिक टिप्पणी नहीं है, बल्कि इसके पीछे एक तय रणनीति दिखती है। भारत नेपाल को यह बताना चाहता है कि यदि काठमांडू विकास, आर्थिक प्रगति, ऊर्जा और पर्यटन को आगे रखता है, तो दिल्ली उसका सबसे बड़ा साझेदार बनने को तैयार है।
यानी अब रिश्तों का आधार सिर्फ ऐतिहासिक और सांस्कृतिक जुड़ाव नहीं रहेगा, बल्कि आर्थिक भागीदारी भी इसका अहम हिस्सा बनेगी।
सीमा विवाद पर भारत का रुख जस का तस
दिलचस्प बात यह रही कि जिस वक्त यह मुलाकात हो रही थी, ठीक उसी दौरान भारत ने सीमा विवाद को लेकर अपना पुराना और दो-टूक रुख भी दोहरा दिया। नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह द्वारा ब्रिटेन जैसी तीसरी पार्टी की मध्यस्थता की बात उठाए जाने के बाद विदेश मंत्रालय के प्रवक्ता रणधीर जायसवाल ने साफ कहा कि भारत-नेपाल सीमा विवाद का हल केवल द्विपक्षीय तंत्र के जरिए ही निकलेगा।
इसका मतलब यह है कि भारत रिश्तों में गर्माहट तो बढ़ाना चाहता है, लेकिन अपने मूल रणनीतिक हितों पर किसी तरह का समझौता करने को तैयार नहीं है। दिल्ली का संदेश स्पष्ट है- सहयोग बढ़ सकता है, मगर संवेदनशील मुद्दों पर भारत की स्थापित नीति नहीं बदलेगी।
चीन फैक्टर को नजरअंदाज नहीं किया जा सकता
नेपाल की राजनीति को चीन के असर से अलग करके नहीं देखा जा सकता। बीते एक दशक में चीन ने सड़क, रेल, ऊर्जा और बुनियादी ढांचे की परियोजनाओं के जरिए नेपाल में अपनी पकड़ मजबूत करने की लगातार कोशिश की है। ऐसे में रबी लामिछाने जैसे लोकप्रिय और अपेक्षाकृत नए नेता के साथ भारत की सक्रिय बातचीत केवल द्विपक्षीय संबंधों तक सीमित नहीं है।
यह क्षेत्रीय रणनीति का भी हिस्सा है। भारत यह पक्का करना चाहता है कि नेपाल की नई राजनीतिक पीढ़ी दिल्ली को विकास और अवसर के साझेदार के रूप में देखे, न कि सिर्फ एक बड़े पड़ोसी के तौर पर।
विकास कूटनीति पर जोर
रबी लामिछाने ने पीएम मोदी से मुलाकात से पहले एक लेख लिखा था, जिसमें उन्होंने डेवलपमेंट डिप्लोमेसी यानी विकास आधारित कूटनीति की बात रखी। प्रधानमंत्री मोदी ने खुद उनकी इस सोच की सराहना की। यह वही मॉडल है, जिसे भारत बांग्लादेश, भूटान और श्रीलंका के साथ अलग-अलग स्तर पर पहले ही अपना चुका है।
अब नेपाल में भी भारत निवेश, बिजली, पर्यटन, कनेक्टिविटी और रोजगार सृजन को रिश्तों की नई धुरी बनाना चाहता है। पीएम मोदी द्वारा नेपाल को पर्यटन और जलविद्युत क्षेत्र में निवेश बढ़ाने की सलाह को इसी सोच का हिस्सा माना जा रहा है। नेपाल के पास विशाल जलविद्युत क्षमता है और भारत उसके लिए सबसे बड़ा बाजार साबित हो सकता है।
बालेन्द्र शाह के लिए भी खुला निमंत्रण
एक और अहम संकेत यह रहा कि पीएम मोदी ने नेपाल के प्रधानमंत्री बालेन्द्र शाह के लिए शुभकामनाएं भेजीं और उन्हें दिल्ली आने का निमंत्रण देने की बात दोहराई। इसका मतलब है कि भारत किसी एक दल या नेता पर दांव नहीं लगा रहा।
दिल्ली की कोशिश यह दिखाने की है कि वह नेपाल की पूरी राजनीतिक व्यवस्था के साथ मिलकर काम करने को तैयार है। इससे भारत पर किसी खास राजनीतिक धड़े का साथ देने का आरोप भी कमजोर पड़ता है।
नेपाल की बदलती राजनीति को समझ रहा है भारत
नेपाल की राजनीति अब पहले जैसी नहीं रही। पारंपरिक दलों के प्रति जनता में नाराजगी बढ़ी है और नए राजनीतिक प्रयोग सामने आ रहे हैं। राष्ट्रीय स्वतंत्र पार्टी की चुनावी कामयाबी इसी बदलाव का संकेत है।
भारत भी इस बदलाव को बखूबी समझ रहा है। जहां पहले दिल्ली का ध्यान मुख्य रूप से स्थापित राजनीतिक दलों पर रहता था, वहीं अब वह नई पीढ़ी के नेताओं और उभरते राजनीतिक समूहों के साथ भी संबंध बना रहा है। इसे एक अधिक व्यावहारिक और दीर्घकालिक रणनीति माना जा सकता है।
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