उत्तर प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
आज के दौर में गर्मी के मौसम में अधिकतर लोग अपने परिवार के साथ छुट्टियां बिताने के लिए किसी पर्यटन स्थल या धार्मिक स्थल की ओर निकल जाते हैं। लेकिन आज से करीब 30 साल पहले ग्रामीण संस्कृति में गर्मियों का यह महीना अपने आप में बेहद रचनात्मक हुआ करता था। उस समय गांव की लड़कियां और महिलाएं एक साथ पेड़ की छांव में बैठकर फटी बोरी और गेहूं के डंठल से हाथ का पंखा बनाती थीं, जिसे बेना के नाम से जाना जाता है।
बुजुर्ग महिलाएं तैयार करती थीं बेना
गांव की बुजुर्ग महिला ललिता देवी बताती हैं कि बेना को हाथ का पंखा भी कहा जाता है। यह पहले के समय में ग्रामीण संस्कृति का एक प्रमुख हिस्सा हुआ करता था। दिनभर के काम निपटाने के बाद दोपहर के समय गांव की लड़कियां और महिलाएं फटी बोरी और ऊन को मिलाकर बेना तैयार करती थीं।
उनके मुताबिक यही बेना शादी-विवाह के मौके पर कन्या पक्ष की ओर से वर पक्ष को भेंट के रूप में भी दिया जाता था। इसके साथ ही गर्मी के मौसम में यह हवा देने का काम भी करता था।
कैसे बनता था हाथ का पंखा
हाथ के पंखे यानी बेना बनाने के लिए पुराने और फटे हुए बोरों का इस्तेमाल किया जाता था। बोरियों को काटकर पहले उनका आकार तैयार किया जाता और फिर ऊन या रंगीन धागों की मदद से उसे मजबूत व आकर्षक बनाया जाता था।
कई महिलाएं किनारों पर सुंदर डिजाइन भी उकेरती थीं, जिससे पंखा देखने में और भी खूबसूरत नजर आता था। पंखे का हैंडल लकड़ी, बांस या मजबूत कपड़े से तैयार किया जाता था। बेकार समझी जाने वाली चीजों का यह उपयोग गांव के जीवन की सादगी और संसाधनों के बेहतर इस्तेमाल का बड़ा उदाहरण था।
बिजली कटने पर आज भी है सहारा
आज भले ही बिजली से चलने वाले आधुनिक पंखे हर घर में मौजूद हों, लेकिन हाथ से बने इन देसी पंखों की यादें आज भी गांवों में देखने को मिल जाती हैं। यह महज एक घरेलू वस्तु नहीं थी, बल्कि गांव की महिलाओं की रचनात्मकता, मेहनत और पारंपरिक ज्ञान का बेहतरीन नमूना थी।
गर्मी की छुट्टियों में पंखे बनाते हुए बिताए गए वे पल आज भी महिलाओं और बुजुर्गों को याद आते हैं, और बिजली गुल होने पर यही बेना उनका सहारा बन जाता है।
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