व्यापार
एक घंटा पहले
2
विचारों
मजदूरी से आत्मनिर्भरता तक का सफर
रांची जिले के बेड़ों गांव की रहने वाली सावित्री खजूर ने मेहनत और संकल्प के दम पर सफलता की नई कहानी लिखी है। कभी दिहाड़ी मजदूरी करने वाली सावित्री ने आज जैविक खेती और नर्सरी के व्यवसाय के जरिए आत्मनिर्भर बनने का रास्ता चुन लिया है। उन्होंने अपनी आर्थिक स्थिति को बदलने के लिए जोखिम उठाया और कृषि के क्षेत्र में कदम रखा।
जैविक दवाओं का उत्पादन
सावित्री ने कृषि से संबंधित उचित प्रशिक्षण लिया और इसके बाद उन्होंने घर पर ही जैविक दवाओं का निर्माण शुरू किया। उनके द्वारा तैयार किए जाने वाले उत्पादों में ब्रह्मास्त्र, नीमस्त्र और अग्निअस्त्र प्रमुख हैं। इन दवाओं को बनाने के लिए वे मुख्य रूप से गोबर, नीम और किचन से निकले कचरे (किचन वेस्ट) का उपयोग करती हैं। ये उत्पाद फसलों की सुरक्षा और पोषण के लिए बेहद प्रभावी साबित हुए हैं।
नर्सरी और महीने की शानदार कमाई
दवाओं के अलावा सावित्री ने अपनी नर्सरी भी तैयार की है। यहाँ वे महोगनी, आम और जामुन जैसे कई पौधों की किस्मों का पोषण कर रही हैं। वे अपने खुद के ब्रांड के नाम से इन जैविक उत्पादों और पौधों को बाजार में बेचती हैं। उनकी मेहनत का ही परिणाम है कि आज वे हर महीने 50 हजार रुपये से अधिक की कमाई कर रही हैं। सावित्री का मानना है कि छोटे किसान भी यदि सही प्रशिक्षण लें, कठिन मेहनत करें और आधुनिक कृषि तकनीकों का इस्तेमाल करें, तो बहुत कम जमीन से भी काफी अच्छा मुनाफा कमा सकते हैं।
Comments
0 comment