सक्सेस स्टोरी: 'कभी नमक-रोटी के पड़ते थे लाले, अब थाली में सजता है पनीर', रांची की ललिता देवी का संघर्ष से सफलता तक का सफर व्यापार एक घंटा पहले 2
रांची की ललिता देवी जूट के बैग और सोहराई पेंटिंग के दम पर आत्मनिर्भर बनीं। ट्राइब्स इंडिया और झारक्राफ्ट के सहयोग से वह देशभर में स्टॉल लगाकर अच्छी कमाई कर रही हैं।

झारखंड की राजधानी रांची में रहने वाली ललिता देवी आज आत्मनिर्भरता की मिसाल बन चुकी हैं। वह ट्राइब्स इंडिया से जुड़ी हुई हैं और झारक्राफ्ट से भी उन्हें मदद मिलती है। ललिता बताती हैं कि एक दौर ऐसा भी था, जब घर में नमक-रोटी का इंतजाम करना तक मुश्किल हो जाता था। लेकिन आज हालात पूरी तरह बदल चुके हैं।

ललिता अब जूट के बैग बनाती हैं। बैग के साथ-साथ वह पर्स, घड़ी और घर सजाने के सामान जैसी कई चीजें तैयार करती हैं। इसके अलावा वह हाथ से सोहराई पेंटिंग भी करती हैं। उनके यहां हर चीज हाथ से ही बनाई जाती है और किसी भी काम में मशीन का इस्तेमाल नहीं होता।

मुंबई से चेन्नई तक फैले ग्राहक

ललिता के ग्राहक अब मुंबई से लेकर चेन्नई तक मौजूद हैं। वह बताती हैं कि सरकार उन्हें इन शहरों में मुफ्त स्टॉल लगाने के लिए भेजती है, जिससे उनके उत्पाद देशभर में पहुंच रहे हैं। उनके मुताबिक, आज महीने की कमाई इतनी हो जाती है कि वह अमेरिका तक घूम आई हैं। वह कहती हैं कि महीने के लाख रुपए तो आराम से बचे रहते हैं और अब कोई टेंशन नहीं है।

ललिता बताती हैं कि इतना सब कुछ मिल जाएगा, यह उन्होंने कभी सोचा भी नहीं था। लेकिन उनके भीतर हिम्मत और हौसला था कि अपने दम पर कुछ करके दिखाना है, और यही जज्बा उन्हें यहां तक लेकर आया।

जूट और लकड़ी के उत्पादों पर काम

ललिता के अनुसार, वह जूट से बनी हर तरह की चीजें तैयार करती हैं। इनमें ऑफिस में इस्तेमाल होने वाली फाइलें भी शामिल हैं, जिन पर खूबसूरत सोहराई पेंटिंग बनी होती है। इन पेंटिंग्स में महिलाएं सिर पर टोकरी लेकर जंगल की ओर जाती दिखती हैं, कहीं महिलाएं घर में खाना पकाती नजर आती हैं तो कहीं सब लोग एक साथ आदिवासी नृत्य करते दिखाई देते हैं। इस तरह वह झारखंड की संस्कृति को अपनी पेंटिंग के जरिए सामने लाने की कोशिश करती हैं।

इसके साथ ही वह लकड़ी की घड़ी, लकड़ी का पेन स्टैंड और घर की सजावट का तमाम सामान भी बनाती हैं। यह सब वह अपने हाथों से काटकर तैयार करती हैं। इन कामों के लिए उन्हें समय-समय पर प्रशिक्षण दिया जाता है, ताकि उत्पादों को और खूबसूरत व बेहतर फिनिश दिया जा सके। आज वह हर दूसरे-तीसरे महीने दिल्ली, मुंबई और कोलकाता जाती हैं, जहां सरकार की ओर से उन्हें स्टॉल लगाने का मौका मिलता है।

अब नमक-रोटी नहीं, थाली में पनीर भी

ललिता बताती हैं कि आज उनके परिवार में पनीर खाया जाता है और अच्छा भोजन मिलता है। दोपहर के खाने में अब थाली में दो तरह की सब्जियां जरूर होती हैं। वह याद करती हैं कि एक समय था, जब नमक-रोटी तक के लाले पड़े रहते थे और यह तक समझ नहीं आता था कि आज क्या खाएं और कल कहां से लाएं। लेकिन अब वह सब कुछ खा सकती हैं।

ललिता कहती हैं कि महिला होकर आत्मनिर्भर बनने की वजह से उन्हें घर में काफी इज्जत भी मिलती है। अब लोग उनकी बात सुनते हैं और कोई भी कुछ कहने से पहले चार बार सोचता है।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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