राष्ट्रीय राजनीति
51 मिनट पहले
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पश्चिम बंगाल विधानसभा चुनाव में मिली बड़ी हार के बाद ममता बनर्जी की तृणमूल कांग्रेस (TMC) पर पकड़ कमजोर पड़ती दिख रही है। पार्टी के भीतर असंतोष इतना गहरा गया है कि वह टूट के कगार पर आ खड़ी हुई है। इस आंतरिक उठापटक ने राज्य की सियासत में हलचल मचा दी है। इस घटनाक्रम को भारतीय जनता पार्टी सिर्फ बंगाल तक सीमित नहीं मान रही, बल्कि इसमें राष्ट्रीय स्तर पर बड़ा राजनीतिक फायदा देख रही है।
विधानसभा में अलग गुट बनाने का ऐलान
टीएमसी के 80 में से 60 विधायकों ने ममता बनर्जी की बात मानने से इनकार करते हुए विधानसभा में अलग गुट बनाने की घोषणा कर दी है। अब आशंका जताई जा रही है कि यह दरार पार्टी के सांसदों तक भी पहुंच सकती है। बीजेपी रणनीतिकारों का आकलन है कि अगर टीएमसी में औपचारिक रूप से विभाजन हो जाता है, तो इसका सबसे बड़ा लाभ संसद में मिल सकता है।
रितब्रत बनर्जी के निष्कासन से खुली दरार
टीएमसी के भीतर मतभेद उस वक्त खुलकर सामने आ गए जब पूर्व माकपा नेता और बाद में टीएमसी में शामिल हुए रितब्रत बनर्जी को कथित पार्टी विरोधी गतिविधियों के आरोप में पार्टी से बाहर कर दिया गया। निष्कासन के बावजूद उन्होंने विपक्ष के नेता पद पर दावा ठोका और कहा कि उन्हें 80 में से 58 विधायकों का समर्थन हासिल है। बाद में उन्होंने यह दावा भी किया कि असंतुष्ट खेमे के साथ कम से कम 60 विधायक खड़े हैं। मुख्यमंत्री ममता बनर्जी के लिए इसे एक गंभीर राजनीतिक चुनौती के रूप में देखा जा रहा है।
संसद में संख्या बल पर बीजेपी की नजर
बीजेपी के वरिष्ठ नेताओं का कहना है कि पश्चिम बंगाल में सत्ता पाने के लिए पार्टी को किसी बाहरी समर्थन की जरूरत नहीं है। असली निशाना संसद में संख्या बल को मजबूत करना है। पार्टी का मानना है कि यदि टीएमसी का असंतुष्ट खेमा अलग होकर नया समूह बनाता है तो उसके सांसद संसद में एनडीए सरकार का साथ दे सकते हैं। इससे केंद्र सरकार के लिए लंबे समय से अटके महत्वाकांक्षी एजेंडे को आगे बढ़ाना आसान हो जाएगा। इनमें परिसीमन और एक राष्ट्र-एक चुनाव से जुड़े विधेयक सबसे अहम हैं। दो तिहाई बहुमत न जुट पाने के कारण पिछले सत्र में सरकार परिसीमन विधेयक पास नहीं करा सकी थी।
एक रिपोर्ट के अनुसार, बीजेपी नेताओं का मानना है कि टीएमसी के भीतर नेतृत्व और लोकतांत्रिक कार्यप्रणाली को लेकर चल रही खींचतान आगे चलकर औपचारिक विभाजन में बदल सकती है। ऐसा होने पर संसद में एक नया राजनीतिक समूह उभर सकता है, जो मुद्दों के आधार पर केंद्र का समर्थन कर सकता है।
महाराष्ट्र और आप से तुलना
बीजेपी के भीतर इस स्थिति की तुलना महाराष्ट्र में शिवसेना और राष्ट्रवादी कांग्रेस पार्टी (एनसीपी) के विभाजन से की जा रही है, जिसने पार्टी को वहां सत्ता समीकरण अपने पक्ष में करने में मदद की थी। इसके साथ ही आम आदमी पार्टी में हाल में हुई फूट का हवाला भी दिया जा रहा है, जिसमें राज्यसभा के 10 में से 7 सांसद अलग होकर बीजेपी के करीब आ गए। पार्टी नेताओं को लगता है कि टीएमसी में भी ऐसा ही घटनाक्रम बन सकता है।
परिसीमन विधेयक पर लगा था झटका
संसद में संख्या बढ़ाने की यह कवायद इसलिए भी अहम मानी जा रही है क्योंकि केंद्र को हाल ही में परिसीमन विधेयक के मामले में झटका लगा था। संविधान (131वां संशोधन) विधेयक, जिसके तहत लोकसभा सीटों के पुनर्निर्धारण और सदन की अधिकतम सदस्य संख्या 545 से बढ़ाकर 850 करने का प्रस्ताव है, अप्रैल में लोकसभा में जरूरी दो-तिहाई बहुमत हासिल नहीं कर सका था। बदले हालात को देखते हुए केंद्र इसे संशोधित रूप में दोबारा लाने पर विचार कर रहा है। इसके साथ ही लोकसभा और विधानसभा चुनाव एक साथ कराने से जुड़े 'वन नेशन, वन इलेक्शन' विधेयक को 2029 के आम चुनावों से पहले आगे बढ़ाने की तैयारी भी की जा रही है।
डीएमके को साधने की कोशिश
इसी रणनीति के तहत बीजेपी ने दक्षिण भारत की राजनीति में भी सक्रियता बढ़ा दी है। हाल के विधानसभा चुनावों में झटका झेलने वाली द्रविड़ मुनेत्र कषगम (डीएमके) के साथ भी संपर्क बढ़ाने के प्रयास किए जा रहे हैं। सूत्रों के मुताबिक, डीएमके कुछ मुद्दों पर केंद्र को समर्थन देने की संभावना पर विचार कर सकती है। माना जा रहा है कि गृह मंत्रालय परिसीमन विधेयक का नया मसौदा तैयार कर रहा है, जिसमें दक्षिणी राज्यों की चिंताओं को दूर करने की कोशिश की जाएगी।
अप्रैल में जब परिसीमन विधेयक लोकसभा में पेश हुआ था, तब कांग्रेस, टीएमसी और डीएमके समेत पूरे इंडिया गठबंधन ने एकजुट होकर इसका विरोध किया था। उस समय विपक्ष के 230 सांसदों ने विधेयक के खिलाफ मतदान किया, जबकि एनडीए के पास 298 सांसदों का समर्थन था। मौजूदा लोकसभा में टीएमसी के 28 और डीएमके के 22 सांसद हैं।
आपत्तियां दूर करने की कवायद
विपक्षी दलों की मुख्य आपत्तियां लोकसभा के विस्तार को महिला आरक्षण कानून के क्रियान्वयन से जोड़ने और परिसीमन के चलते दक्षिणी राज्यों के राजनीतिक प्रभाव में संभावित कमी को लेकर रही हैं। हालांकि बीजेपी का मानना है कि अगर डीएमके जैसे दल मुद्दों के आधार पर समर्थन देने को तैयार होते हैं और टीएमसी का कोई अलग गुट भी एनडीए के पाले में आता है, तो संवैधानिक संशोधनों के लिए जरूरी दो तिहाई बहुमत का लक्ष्य हासिल किया जा सकता है।
पश्चिम बंगाल में टीएमसी के भीतर मची खींचतान सिर्फ राज्य की सत्ता तक सीमित नहीं है। इसके दूरगामी असर राष्ट्रीय राजनीति और संसद के शक्ति संतुलन पर भी पड़ सकते हैं। ऐसे में टीएमसी की आंतरिक राजनीति, बीजेपी की संसदीय रणनीति और विपक्षी एकता की परीक्षा आने वाले महीनों में राष्ट्रीय सियासत का प्रमुख विषय बन सकती है।
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