बोकारो के किसान का कमाल: मात्र ₹500 के पुआल से बचाए 400 पौधे, जानिए क्या है यह अनोखा जुगाड़ झारखंड एक घंटा पहले 2
बरसात के मौसम में महंगी पॉलीहाउस तकनीक को पछाड़ते हुए बोकारो के एक किसान ने पुआल का इस्तेमाल कर नर्सरी को सुरक्षित रखने का किफायती तरीका खोज निकाला है।

खेती में तकनीक का सस्ता और देसी विकल्प

बोकारो जिले के जमुनियाटांड़ गांव के रहने वाले प्रगतिशील किसान सावन ने खेती के क्षेत्र में एक ऐसी मिसाल पेश की है जो छोटे किसानों के लिए किसी वरदान से कम नहीं है। आमतौर पर बरसात के दिनों में सब्जियां उगाने वाले किसानों के सामने सबसे बड़ी चुनौती अपनी नर्सरी को तेज बारिश और धूप से बचाने की होती है। इसके लिए अक्सर किसान प्लास्टिक ट्रे या शेड नेट का इस्तेमाल करते हैं, जिसमें हजारों रुपये का खर्च आता है। लेकिन अब सावन ने पुआल यानी पराली का उपयोग करके एक ऐसा देसी जुगाड़ ढूंढ निकाला है, जो बेहद प्रभावी होने के साथ-साथ अत्यंत सस्ता भी है।

इस तकनीक का पूरा गणित

किसान सावन के अनुसार, यह तकनीक न केवल पौधों को सुरक्षित रखती है, बल्कि इसमें खर्च भी न के बराबर आता है। उन्होंने बताया कि इस विधि को अपनाकर कोई भी किसान कम लागत में स्वस्थ नर्सरी तैयार कर सकता है। सबसे पहले खेत को अच्छी तरह से तैयार करके खरपतवार साफ कर लें। इसके बाद मिट्टी की उठी हुई क्यारियां बनाएं और उनमें बीजों की बुवाई करें। बीजों को मिट्टी की एक हल्की परत से ढकने के बाद, ऊपर से पुआल की एक अच्छी परत बिछा दी जाती है। यह पुआल किसी सुरक्षा कवच की तरह काम करता है, जो बीजों को तेज बारिश की मार से बचाता है और मिट्टी की नमी को भी बनाए रखता है।

पौधों के विकास के लिए जरूरी चरण

सावन बताते हैं कि पुआल का उपयोग करने से अंकुरण की प्रक्रिया बहुत ही सुरक्षित तरीके से पूरी होती है। एक बार जब बीज अंकुरित होकर पौधे का रूप लेने लगते हैं, तब ऊपर बिछी पुआल की घनी परत को हटाकर केवल एक हल्की सी परत रहने दी जाती है। यह प्रक्रिया पौधों की जड़ों के बेहतर विकास में मदद करती है। उन्होंने बताया कि इस विधि से करीब 20 से 25 दिनों के भीतर पौधे रोपाई के लिए पूरी तरह से तैयार हो जाते हैं। बैंगन, टमाटर और अन्य मौसमी सब्जियों के लिए यह तकनीक विशेष रूप से सफल साबित हो रही है।

कम लागत और अधिक मुनाफा

आर्थिक दृष्टिकोण से यह तकनीक बेहद फायदेमंद है। पारंपरिक नर्सरी तैयार करने में जहां 5,000 से 10,000 रुपये तक का खर्च आ सकता है, वहीं सावन की इस देसी पद्धति में मात्र 35 किलो पुआल का इस्तेमाल होता है। इस पूरे प्रबंध में खर्च केवल 400 से 500 रुपये के आसपास ही आता है, जिसमें 300 से 400 पौधे सुरक्षित तरीके से तैयार हो जाते हैं। सावन का मानना है कि यह तरीका छोटे और सीमांत किसानों के लिए आय बढ़ाने का एक शानदार जरिया है। पर्यावरण के अनुकूल होने के साथ-साथ यह विधि किसानों को आर्थिक तंगी से बचाकर आत्मनिर्भर बनने में मदद करती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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