मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
खाड़ी देशों में बढ़ते तनाव के कारण इन दिनों गैस की किल्लत बनी हुई है। इस संकट ने एक बार फिर उन पुराने दिनों की याद दिला दी है, जब रसोई का काम बिना किसी झंझट के पूरी तरह प्राकृतिक तरीके से निपट जाता था। आज से करीब 50 से 60 साल पहले भी ऐसी एक अनोखी तकनीक मौजूद थी, जिसमें न रिफिल कराने की चिंता थी और न ही बार-बार पैसे खर्च करने का बोझ। यह कमाल का उपकरण था सूरज की रोशनी से चलने वाला उस दौर का सोलर कुकर, जो कभी अमीर घरानों और बड़े सरकारी अफसरों के घरों की शान माना जाता था।
ऐसा ही एक ऐतिहासिक सोलर कुकर मध्य प्रदेश के पतेरी निवासी डॉ. रवि तिवारी के घर में आज भी सहेजकर रखा गया है। उन्होंने पुरानी यादों को ताजा करते हुए बताया कि यह अनोखा बॉक्स टाइप सोलर कुकर उनके दादा जी ने खरीदा था। उस जमाने में इसकी कीमत करीब 45 से 50 रुपये थी।
आजादी के बाद का दुर्लभ उपकरण
डॉ. रवि के अनुसार आजादी के ठीक बाद के दौर में यह कोई आम घरेलू सामान नहीं था जो बाजार में आसानी से मिल जाए। शुरुआती दौर में तो यह वैज्ञानिकों और शोधकर्ताओं द्वारा प्रयोगों के लिए तैयार किया गया एक प्रोटोटाइप था। बाद में 80 के दशक की शुरुआत में भारत सरकार के नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने वनों की कटाई रोकने और रसोई का ईंधन बचाने के मकसद से इसका व्यापक प्रचार-प्रसार किया। इसके बाद बड़े अधिकारियों के घरों में इसका दिखना आम हो गया।
सोलर कुकर की खासियत
इस बॉक्स टाइप सोलर कुकर की सबसे बड़ी खूबी इसकी क्षमता थी। चौकोर बॉक्स के भीतर काले रंग के चार गोल कुकिंग पॉट्स एक साथ आसानी से फिट हो जाते थे। यानी एक ही समय में धूप में रखकर पूरा भोजन तैयार किया जा सकता था।
डॉ. रवि ने बताया कि आमतौर पर इसके पहले डिब्बे में चावल, दूसरे में दाल, तीसरे में कोई मौसमी सब्जी और चौथे डिब्बे में खीर या उबालने के लिए आलू और अंडे रख दिए जाते थे। तेज धूप में यह पूरा खाना बिना जले और अपने सभी असली पोषक तत्वों को बरकरार रखते हुए लगभग डेढ़ से दो घंटे में पूरी तरह पककर तैयार हो जाता था।
ग्रीनहाउस प्रभाव पर आधारित तकनीक
यह सोलर कुकर पूरी तरह सूरज की रोशनी और ग्रीनहाउस इफेक्ट के सिद्धांत पर काम करता है, और इसका इस्तेमाल भी बेहद आसान है। सबसे पहले इसके ऊपर लगे शीशे को ऐसे कोण पर सेट किया जाता है, जिससे धूप परावर्तित होकर सीधे बॉक्स के अंदर पहुंचे। बॉक्स के भीतर की काली कोटिंग और काले डिब्बे उस पूरी गर्मी को सोख लेते हैं, जबकि ऊपर लगा पारदर्शी कांच का ढक्कन उस गर्मी को बाहर नहीं जाने देता।
इस प्रक्रिया से बॉक्स के अंदर का तापमान 100°C से 140°C तक पहुंच जाता है और इसी बंद भाप तथा गर्मी से खाना धीरे-धीरे पक जाता है।
ऊर्जा संकट का बेहतरीन समाधान
आज पूरी दुनिया पेट्रोल, डीजल और गैस की किल्लत तथा इनकी बढ़ती कीमतों से जूझ रही है। डॉ. रवि का कहना है कि हमारे बुजुर्ग प्रकृति से मिलने वाली इस मुफ्त ऊर्जा को सही तकनीक और सही उपकरण के जरिए इस्तेमाल करना बखूबी जानते थे। उन्होंने कहा कि भले ही उस दौर में लकड़ी एक बड़ा ईंधन थी, लेकिन यह सोलर कुकर उस समय की एक आधुनिक और क्रांतिकारी खोज था।
डॉ. रवि के मुताबिक आज के समय में भी इस पुरानी मगर कारगर तकनीक को अपनाकर हम एलपीजी के संकट से बच सकते हैं और साथ ही पर्यावरण को भी सुरक्षित रख सकते हैं।
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