बांस की दुनिया है बेहद विविध, पूसा में 9 दुर्लभ प्रजातियों पर हो रहा है खास शोध बिहार 43 मिनट पहले 1
डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय में बांस की नौ दुर्लभ प्रजातियों पर शोध किया जा रहा है। यहां छात्र न केवल इनकी विशेषताओं को समझ रहे हैं, बल्कि इनके निर्माण से लेकर खाद्य सामग्री तक के बहुआयामी उपयोगों को भी सीख रहे हैं।

बांस के बारे में आम धारणाओं को बदलना जरूरी

अक्सर लोग बांस को केवल घर बनाने या बाड़ लगाने जैसी सामान्य चीजों तक सीमित समझते हैं, लेकिन यह सोच पूरी तरह सही नहीं है। बांस की दुनिया काफी विशाल और उपयोगी है। डॉ. राजेंद्र प्रसाद केंद्रीय कृषि विश्वविद्यालय, पूसा के वानिकी विभाग में इस दिशा में बड़ा काम हो रहा है। यहाँ विभाग की ओर से बांस की कई ऐसी दुर्लभ और उपयोगी प्रजातियों का न केवल संरक्षण किया जा रहा है, बल्कि उन पर गहन शोध भी चल रहा है। इस पहल का उद्देश्य वानिकी के विद्यार्थियों को यह समझाना है कि बांस के गुण क्या हैं और इनका व्यावसायिक महत्व कितना अधिक है।

व्यावहारिक ज्ञान पर विश्वविद्यालय का जोर

विश्वविद्यालय का विजन छात्रों को केवल किताबी शिक्षा तक सीमित रखने का नहीं है। यहाँ प्रयास यह है कि विद्यार्थी यह जान सकें कि बांस की अलग-अलग प्रजातियां निर्माण कार्य, शानदार हस्तशिल्प, घर की सजावट, खान-पान और ग्रामीण अर्थव्यवस्था को मजबूत करने में कितनी महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। एमएससी वानिकी के द्वितीय सेमेस्टर की छात्रा सुप्रिया राय ने इस शोध प्रक्रिया के दौरान बांस की 9 प्रमुख और दुर्लभ प्रजातियों के गुणों पर विस्तृत जानकारी दी है।

बांस की 9 दुर्लभ प्रजातियां और उनके अनोखे उपयोग

शोध में शामिल की गई इन 9 प्रजातियों के उपयोग क्षेत्र काफी व्यापक हैं:

  • डेंड्रोकैलामस हैमिल्टोनी (Hamilton Bamboo): इसके तने काफी मजबूत और मोटे होते हैं, जिसके कारण इसे भवन निर्माण और विभिन्न कंस्ट्रक्शन कार्यों के लिए सबसे उपयुक्त माना जाता है।
  • डेंड्रोकैलामस स्ट्रिक्टस: ग्रामीण इलाकों में इसे आमतौर पर लाठी बांस कहा जाता है। अपनी मजबूती की वजह से इससे टिकाऊ लाठियां तैयार की जाती हैं।
  • बम्बूसा वल्गेरिस वैरायटी विटाटा: इसे पीला बांस भी कहते हैं। अपने बेहतरीन और आकर्षक रंग के कारण यह हस्तशिल्प और सजावटी सामान बनाने में बहुत लोकप्रिय है।
  • बम्बूसा न्यूटन: यह प्रजाति भी निर्माण कार्यों के लिए बहुत भरोसेमंद मानी जाती है।
  • बम्बूसा वल्गेरिस वैरायटी वामिन: इस प्रजाति का आकार बहुत अनोखा होता है, जो इसे घरों और बगीचों की सजावट के लिए बेहद खास बनाता है।
  • भाला बांस: हल्का वजन होने की वजह से इसका उपयोग मुख्य रूप से जैवलिन यानी भाला बनाने में किया जाता है।
  • बम्बूसा ट्यूल्डा: इस प्रजाति का उपयोग मुख्य रूप से संगीत के उपकरणों, विशेषकर बांसुरी बनाने में किया जाता है।
  • थाइर्सोस्टैचिस ओलिवरी (Thyrsostachys oliveri): दक्षिण-पूर्व एशिया की यह प्रमुख प्रजाति है। इसके सीधे और लंबे तनों का इस्तेमाल बड़े निर्माण कार्यों में बखूबी किया जाता है।
  • डेंड्रोकैलामस एस्पर (Dendrocalamus asper): इसके कोमल अंकुरों को खाद्य सामग्री के तौर पर इस्तेमाल किया जाता है। इनसे अचार, कई तरह के व्यंजन और मिठाइयां तैयार की जाती हैं।
  • डेंड्रोकैलामस गिगैन्टियस (Dendrocalamus giganteus): इसकी पहचान इसके हाथी के पैर जैसे मोटे आधार से होती है। यह इतना मजबूत होता है कि इसका इस्तेमाल खेतों और पशुपालन केंद्रों में खूंटा गाड़ने के लिए किया जाता है।

ग्रामीण विकास और अर्थव्यवस्था का आधार

वानिकी विभाग के विशेषज्ञों का मानना है कि बांस केवल पर्यावरण को बचाने और उसे हरा-भरा रखने का एक साधन मात्र नहीं है। आज के समय में बांस रोजगार पैदा करने, हस्तशिल्प को बढ़ावा देने, आधुनिक निर्माण कार्यों, खाद्य उद्योग और ग्रामीण विकास की नींव बन चुका है। पूसा में छात्रों को इन प्रजातियों की विशेषताओं और उनके व्यावहारिक इस्तेमाल की बारीकियों के बारे में पढ़ाया जा रहा है ताकि वे भविष्य में इस प्राकृतिक संपदा का आर्थिक लाभ उठा सकें और देश के विकास में अपना योगदान दे सकें।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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