सहारनपुर का 52 साल पुराना यह अनोखा आम का पेड़, जिसका फल लाखों लोग चख चुके पर नाम आज तक किसी को नहीं पता उत्तर प्रदेश 10 घंटे पहले 3
सहारनपुर के मोहम्मदपुर गुर्जर गांव में मौजूद इस 52 साल पुराने आम के पेड़ की किस्म का नाम आज तक कोई नहीं जान पाया, इसलिए इसे 'बेनाम' आम कहा जाता है। कच्चे रहते हुए भी मीठा होने के कारण लोग इसे सलाद की तरह खाते हैं।

उत्तर प्रदेश का सहारनपुर जिला अपने 'मैंगो बेल्ट' के लिए दुनिया भर में पहचाना जाता है। यहां के बागवान हर साल आम की कई उन्नत और मशहूर किस्में तैयार करते हैं। लेकिन इसी जिले के एक किसान के बाग में आम की ऐसी अनोखी किस्म मौजूद है, जिसे देखकर पहली नजर में कोई इसे आम का पेड़ मानने तक को तैयार नहीं होता। इस पेड़ के पत्ते इतने बड़े और सुंदर हैं कि देखने वाला हर शख्स हैरान रह जाता है।

सबसे दिलचस्प बात यह है कि दुनिया भर के आमों का कोई न कोई नाम जरूर होता है, मगर इस खास आम का आज तक कोई नाम तय नहीं हो पाया। यही वजह है कि गांव वाले इसे 'बेनाम' आम कहकर बुलाते हैं।

स्वाद में खटास नहीं, इसलिए कहलाता है 'सलादिया आम'

इस अनोखे आम की सबसे बड़ी खूबी इसका स्वाद और इसका आकार है। आम तौर पर मिलने वाले आमों के मुकाबले यह काफी बड़े साइज का होता है। आमतौर पर कच्चे आम खट्टे होते हैं, लेकिन इसमें जरा सी भी खटास या खट्टापन नहीं होता।

कच्चा रहते हुए भी बेहद मीठा और क्रंची होने के कारण स्थानीय लोग इसे पकाकर खाने के बजाय कच्चा ही खाना पसंद करते हैं। इसी खासियत की वजह से गांव वाले इसे 'सलादिया आम' भी कहते हैं और घरों में इसका इस्तेमाल मुख्य रूप से सलाद के रूप में किया जाता है।

1974 में लगा था यह पौधा

मोहम्मदपुर गुर्जर गांव के किसान विक्रम सिंह ने बताया कि यह पेड़ करीब 52 साल पुराना है। साल 1974 में जब उनका परिवार बाग लगाने के लिए नर्सरी से पौधे लेकर आया था, तब उन्हीं पौधों के बीच यह अनोखा पेड़ भी शामिल हो गया था। इसके बड़े और खूबसूरत पत्तों को देखकर परिवार इसे अपने बाग में ले आया।

विक्रम सिंह के मुताबिक, जहां से वे यह पौधा लाए थे, वहां भी किसी को इस किस्म का नाम नहीं पता था और तभी से यह आज तक बेनाम बना हुआ है। अब हाल यह है कि इस पेड़ के बारे में गांव का बच्चा-बच्चा जानता है, और घर आने वाले मेहमानों को भी यह आम सलाद के रूप में काटकर परोसा जाता है।

नाम न होने से मंडी में नहीं बिक पाता फल

इस लाजवाब आम में बस एक ही कमी है कि इसका कोई आधिकारिक नाम नहीं है, जिसके चलते इसे मंडी में बेच पाना बेहद मुश्किल हो जाता है। दरअसल, फल मंडियों में जब भी कोई आम बिकने आता है, तो व्यापारी सबसे पहले उसकी किस्म और नाम पूछते हैं, और उसी आधार पर उसके दाम तय होते हैं।

नाम न होने की वजह से किसान इसे मंडी तक नहीं ले जाते। यही कारण है कि मंडी की रौनक बनने के बजाय यह आम सिर्फ गांव तक ही सीमित रह गया है, जहां लोग इसे पेड़ से तोड़कर बड़े चाव से सलाद के रूप में खाते हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!