धान की फसल में खरपतवार से हैं परेशान? कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह ने बताए ये असरदार वैज्ञानिक उपाय बिहार एक घंटा पहले 2
बिहार के रोहतास सहित कई जिलों में कम बारिश और मजदूरों की किल्लत के बीच धान की फसलों में खरपतवार एक गंभीर चुनौती बन गए हैं, जिससे निपटने के लिए कृषि वैज्ञानिक ने सही दवाओं और उनके उपयोग के वैज्ञानिक तरीके बताए हैं।

बिहार के कई जिलों में इन दिनों धान की रोपाई का काम पूरे जोरों-शोरों से चल रहा है। खासकर रोहतास जिले में, जिसे राज्य में धान का कटोरा भी कहा जाता है, किसान अपनी फसलों को बेहतर बनाने के लिए दिन-रात मेहनत कर रहे हैं। हालांकि, इस साल मौसम के मिजाज ने किसानों की चिंताओं को थोड़ा बढ़ा दिया है। राज्य के कई हिस्सों में इस बार सामान्य से काफी कम बारिश दर्ज की गई है। इस कम वर्षा के कारण खेतों में एक नई और बेहद गंभीर समस्या खड़ी हो गई है, और वह है तेजी से फैलने वाले खरपतवार। खेतों में अनावश्यक रूप से उगने वाले ये पौधे धान की फसल के विकास में बड़ी बाधा बन रहे हैं।

धान की फसलों के बीच उगने वाले खरपतवार न केवल मिट्टी के पोषक तत्वों को सोख लेते हैं, बल्कि वे सूर्य की रोशनी और पानी के लिए भी मुख्य फसल से प्रतिस्पर्धा करते हैं। इससे धान के पौधों की बढ़वार प्रभावित होने लगती है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि यदि समय रहते इन अनचाहे पौधों पर नियंत्रण नहीं पाया गया, तो धान की पैदावार में भारी गिरावट आ सकती है, जिससे किसानों को भारी आर्थिक नुकसान उठाना पड़ेगा।

मजदूरों की कमी और बढ़ती लागत से परेशान किसान

इस समय किसानों के सामने केवल कम बारिश की ही चुनौती नहीं है, बल्कि खेतों से खरपतवार निकालने के लिए मजदूरों का न मिलना भी एक बड़ी मुसीबत बन गया है। कृषि क्षेत्रों में काम करने वाले मजदूरों की भारी कमी महसूस की जा रही है। इसके साथ ही, जो मजदूर मिल भी रहे हैं, उनकी मजदूरी दरें भी लगातार बढ़ रही हैं। बढ़ती हुई मजदूरी लागत के कारण किसानों का बजट पूरी तरह से बिगड़ रहा है। ऐसे में पारंपरिक रूप से हाथों से निराई-गुड़ाई करना अब बहुत महंगा और कठिन होता जा रहा है। यही वजह है कि अब किसान इस समस्या का कोई वैज्ञानिक और किफायती समाधान तलाश रहे हैं ताकि उनका समय और पैसा दोनों बच सके।

कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह की महत्वपूर्ण सलाह

किसानों की इसी बड़ी परेशानी को ध्यान में रखते हुए धान अनुसंधान केंद्र, रोहतास के प्रसिद्ध कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह ने वैज्ञानिक तरीकों से खरपतवार नियंत्रण करने की बेहद असरदार सलाह दी है। उनका कहना है कि यदि किसान भाई धान की रोपाई के शुरुआती चरण में ही सही दवाओं का सही मात्रा में इस्तेमाल कर लें, तो वे इस गंभीर समस्या से काफी हद तक मुक्ति पा सकते हैं। वैज्ञानिक तरीकों को अपनाने से न केवल खरपतवारों का सफाया होगा, बल्कि बाद में होने वाले अतिरिक्त और भारी-भरकम खर्च से भी बचा जा सकेगा।

प्रीटिलाक्लोर दवा का सही समय पर छिड़काव

कृषि वैज्ञानिक डॉ. प्रकाश सिंह ने धान की रोपाई के तुरंत बाद इस्तेमाल की जाने वाली दवाओं के बारे में विस्तार से बताया है। उन्होंने किसानों को सलाह दी है कि रोपाई के तुरंत बाद खेतों में प्रीटिलाक्लोर (Pretilachlor) नाम की दवा का इस्तेमाल करना चाहिए। इस दवा के प्रयोग की विधि इस प्रकार है:

  • दवा की निर्धारित मात्रा: प्रति हेक्टेयर खेत के लिए इस दवा की 1 लीटर मात्रा पर्याप्त होती है।
  • घोल तैयार करने का तरीका: दवा का घोल तैयार करते समय किसान भाई 3 मिलीलीटर दवा को प्रति लीटर पानी की दर से अपनी स्प्रे टंकी में मिलाएं।
  • छिड़काव का सही समय: इसका छिड़काव धान की रोपाई के 24 घंटे के बाद और अधिकतम 72 घंटे के भीतर हर हाल में कर देना चाहिए।
  • जरूरी शर्त: इस बात का विशेष ध्यान रखें कि जब आप छिड़काव कर रहे हों, तब खेत में पर्याप्त मात्रा में पानी जमा होना चाहिए। पानी की उपस्थिति में ही यह दवा पूरी तरह से और प्रभावी ढंग से काम करती है।

रोपाई के 15 से 20 दिनों बाद बिसपाइरिबैक सोडियम का प्रयोग

यदि शुरुआती छिड़काव के बाद भी खेत में कुछ खरपतवार बच जाते हैं या फिर से उग आते हैं, तो डॉ. प्रकाश सिंह ने एक और बेहतरीन उपाय बताया है। उन्होंने कहा कि ऐसी स्थिति में किसान भाई धान की रोपाई के 15 से 20 दिनों के भीतर बिसपाइरिबैक सोडियम 10 प्रतिशत का छिड़काव कर सकते हैं। इसके इस्तेमाल के लिए निम्नलिखित वैज्ञानिक चरणों का पालन करना अनिवार्य है:

  • मात्रा का निर्धारण: प्रति एकड़ खेत के लिए इस दवा की 100 से 120 मिलीलीटर मात्रा का प्रयोग करें।
  • पानी निकालना आवश्यक: दवा का छिड़काव करने से ठीक पहले खेत में जमा खड़े पानी को पूरी तरह से बाहर निकाल दें।
  • नमी का महत्व: भले ही खेत से पानी निकाल दिया गया हो, लेकिन मिट्टी में पर्याप्त गीलापन या नमी का होना बेहद जरूरी है।
  • दोबारा पानी भरना: छिड़काव करने के लगभग 24 घंटे बाद खेत में फिर से पानी भर दें और उस पानी को लगातार दो से तीन दिनों तक खेत में जमा रहने दें।

वैज्ञानिक के अनुसार, इस पूरी प्रक्रिया को अपनाने के मात्र सात से आठ दिनों के भीतर खेत में उगे हुए अधिकांश जिद्दी खरपतवार पूरी तरह से नष्ट हो जाएंगे।

चौड़ी पत्ती वाले खरपतवारों से निपटने के विशेष उपाय

धान के खेतों में चौड़ी पत्ती वाले खरपतवार किसानों के लिए सबसे बड़ी सिरदर्दी साबित होते हैं। डॉ. प्रकाश सिंह ने इनके नियंत्रण के लिए भी आसान और सटीक उपाय सुझाए हैं। उन्होंने बताया कि इस तरह के खरपतवारों को नष्ट करने के लिए किसान 2,4-D या फिर मेटसल्फ्यूरॉन (Metsulfuron) जैसी दवाओं का सहारा ले सकते हैं। इन दवाओं के इस्तेमाल के दो मुख्य तरीके हैं:

  • बालू के साथ मिलाकर: किसान इन दवाओं को सूखी बालू में अच्छी तरह मिलाकर पूरे खेत में समान रूप से छिड़क सकते हैं।
  • स्प्रे के माध्यम से: दूसरा तरीका यह है कि 2 से 2.5 मिलीलीटर दवा को प्रति लीटर पानी की दर से मिलाकर एक अच्छा घोल तैयार करें और पूरे खेत में इसका स्प्रे कर दें।

उन्होंने दोबारा इस बात पर जोर दिया कि इन दवाओं के छिड़काव के दौरान भी खेत की मिट्टी में पर्याप्त नमी बनी रहनी चाहिए, तभी दवाएं अपना पूरा असर दिखाएंगी और फसल सुरक्षित रहेगी।

वैज्ञानिक उपायों को अपनाने के बड़े फायदे

कृषि वैज्ञानिक ने किसानों से पुरजोर अपील की है कि वे अपनी फसलों को सुरक्षित रखने और बेहतर पैदावार हासिल करने के लिए इन वैज्ञानिक सलाहों का पूरी निष्ठा से पालन करें। इन आधुनिक उपायों को अपनाने से किसानों को निम्नलिखित प्रत्यक्ष लाभ होंगे:

  • धान की फसल की बढ़वार बिना किसी रुकावट के बेहद शानदार तरीके से होगी।
  • खरपतवारों के समय पर खात्मे से अंतिम उत्पादन और अनाज की गुणवत्ता में उल्लेखनीय वृद्धि होगी।
  • खेतों से घास और खरपतवार निकालने के लिए अब किसानों को महंगे और दुर्लभ मजदूरों पर निर्भर नहीं रहना पड़ेगा।
  • सही समय पर किए गए इस वैज्ञानिक उपाय से किसानों के बहुमूल्य समय और खेती की कुल लागत दोनों में बड़ी बचत होगी।

डॉ. प्रकाश सिंह ने अंत में किसानों से अपील करते हुए कहा कि वे किसी भी खरपतवारनाशी दवा का उपयोग हमेशा निर्धारित मात्रा और सही समय पर ही करें। इससे फसल पूरी तरह सुरक्षित रहेगी और बेहतर उत्पादन प्राप्त होगा।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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