अमेरिका की दोहरी नीति का खेल: भारत पर 100% टैरिफ की तैयारी, लेकिन अपने परमाणु हितों के लिए रास्ता साफ विश्व एक घंटा पहले 4
रूस से ऊर्जा खरीदने वाले देशों पर अमेरिका ने 100% टैरिफ लगाने का कानून पारित कर दिया है, लेकिन परमाणु ईंधन के आयात के मामले में खुद को छूट देकर उसने अपने दोहरे रवैये को उजागर कर दिया है।

रूस-विरोधी कानून में छिपा अमेरिका का दोहरा रवैया

अमेरिका एक बार फिर अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अपनी दोहरी नीतियों के लिए चर्चा में है। ताजा मामला रूसी ऊर्जा आयात से जुड़ा है। अमेरिका ने एक ऐसा कानून तैयार किया है, जिसके तहत रूस से कच्चा तेल या प्राकृतिक गैस खरीदने वाले देशों पर 100% तक टैरिफ लगाने की तैयारी है। अमेरिकी कांग्रेस ने इस विधेयक को मंजूरी दे दी है और अब यह अंतिम हस्ताक्षर के लिए राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप के पास है। हालांकि, इस कानून की सबसे हैरान करने वाली बात यह है कि जहां अमेरिका अन्य देशों के लिए सख्त नियम बना रहा है, वहीं उसने अपनी परमाणु ऊर्जा जरूरतों को सुरक्षित रखने के लिए रूसी यूरेनियम के आयात को पूरी तरह छूट दे दी है।

भारत और चीन पर संकट के बादल

अमेरिकी प्रतिनिधि सभा में लिंड्से ओ ग्राम सैंक्शनिंग रशिया एंड ईरान एक्ट ऑफ 2026 को 262-159 के बहुमत से पारित किया गया। इससे पहले सीनेट ने इसे 86-11 के भारी अंतर से मंजूरी दी थी। यदि यह कानून पूरी तरह लागू होता है, तो राष्ट्रपति को उन देशों के उत्पादों पर 100% तक आयात शुल्क लगाने का पूर्ण अधिकार मिल जाएगा, जो रूसी ऊर्जा का उपयोग कर रहे हैं या रूस को अंतरराष्ट्रीय प्रतिबंधों से बचने में मदद कर रहे हैं। इस कानून का सीधा असर भारत और चीन जैसे उन बड़े देशों पर पड़ सकता है, जो अपनी ऊर्जा सुरक्षा के लिए रूसी कच्चे तेल पर निर्भर हैं।

परमाणु जरूरतों के लिए अलग मापदंड

दिलचस्प बात यह है कि अमेरिका ने दूसरे देशों के लिए जो सख्ती दिखाई है, वह अपने मामले में ढीली कर ली है। विधेयक में स्पष्ट रूप से रूस की सरकारी परमाणु कंपनी रोसाटोम और उसकी सहयोगी इकाइयों का उल्लेख है, लेकिन साथ ही इसमें अमेरिकी-रूसी असैन्य परमाणु सहयोग समझौतों के तहत कई गतिविधियों को प्रतिबंधों के दायरे से बाहर रखा गया है। कम एनरिच्ड यूरेनियम के आयात के लिए भी विशेष अपवाद जोड़े गए हैं। इसका सीधा अर्थ यह है कि अमेरिका ने अपनी परमाणु भट्टियों को चलाने के लिए रूस के साथ व्यावसायिक संबंध पूरी तरह खत्म नहीं किए हैं, जबकि वह अन्य देशों को ऐसा करने से रोकने के लिए दंड का प्रावधान कर रहा है।

अमेरिका का तर्क और जमीनी हकीकत

अमेरिकी प्रशासन का आधिकारिक तर्क यह है कि रूस ऊर्जा बिक्री से प्राप्त धन का उपयोग युद्ध में अपनी क्षमताओं को बढ़ाने के लिए कर रहा है, इसलिए खरीददारों पर दबाव डालना अनिवार्य है। हालांकि, इस दावे और हकीकत में बड़ा अंतर है। एक तरफ अमेरिका भारत जैसे देशों को रूसी तेल के कारण टैरिफ की धमकी दे रहा है, वहीं दूसरी तरफ उसकी अपनी परमाणु ऊर्जा इंडस्ट्री की निर्भरता इतनी अधिक है कि वह रूस से यूरेनियम लेना बंद करने की स्थिति में नहीं है। यह दोहरापन वैश्विक कूटनीति में अमेरिका की विश्वसनीयता पर बड़े सवाल खड़े करता है, जहां नियमों का पालन केवल दूसरों के लिए अनिवार्य माना गया है और खुद के लिए रास्ते पहले ही खुले रखे गए हैं।

करण मल्होत्रा पाबना के अंतरराष्ट्रीय संवाददाता हैं, जो अमेरिका, यूरोप और एशिया की खबरें रिपोर्ट करते हैं। वैश्विक राजनीति, अर्थव्यवस्था और बड़े अंतरराष्ट्रीय घटनाक्रमों पर वे नजर रखते हैं। उनकी रिपोर्ट्स दुनिया की हलचल को पाठकों तक तेजी से पहुंचाती हैं।

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