सरायकेला के मशहूर सेव लड्डू: बेसन की बारीकियों से सजी ये अनोखी मिठाई, जिसे लोग तोहफे में भी देते हैं जीवनशैली 2 महीने पहले 84
झारखंड के सरायकेला-खरसावां जिले में एक ऐसी खास मिठाई बनाई जाती है जो मोतीचूर के नहीं, बल्कि बेसन के महीन सेव से तैयार होती है। अपनी बेहतरीन शेल्फ-लाइफ और स्वाद के कारण यह मिठाई स्थानीय लोगों के साथ-साथ बाहर से आने वाले मेहमानों की भी पहली पसंद बनी हुई है।

मिठाइयों की दुनिया में सरायकेला की एक अलग पहचान

भारत विविधताओं का देश है और यहाँ हर क्षेत्र का अपना एक अनूठा खान-पान और मिठाइयों का इतिहास है। झारखंड का सरायकेला-खरसावां जिला भी इस मामले में पीछे नहीं है। यहाँ की गलियों में एक खास किस्म का लड्डू बनाया जाता है, जिसने न केवल स्थानीय लोगों का दिल जीता है, बल्कि यह मिठाई दूर-दराज के इलाकों में भी काफी मशहूर हो गई है। हम बात कर रहे हैं सरायकेला के प्रसिद्ध सेव लड्डू की। यह लड्डू मोतीचूर या बूंदी से तैयार होने वाले सामान्य लड्डुओं से बिल्कुल अलग है, क्योंकि इसकी मुख्य सामग्री बेसन के पतले और कुरकुरे सेव होते हैं।

करीब 10 दिनों तक नहीं होता खराब

इस मिठाई की लोकप्रियता का सबसे बड़ा कारण इसकी लंबी शेल्फ-लाइफ है। सरायकेला के प्रसिद्ध हलवाई मंटू मोदक का कहना है कि यह मिठाई अपनी टिकाऊ गुणवत्ता के लिए जानी जाती है। यह लड्डू सामान्य तापमान पर भी लगभग 10 दिनों तक खराब नहीं होता है। यही खूबी इसे यात्रा के लिए भी उपयुक्त बनाती है। जब भी कोई व्यक्ति सरायकेला आता है, तो वह इस मिठाई को अपने साथ पैक करवाना नहीं भूलता। लोग इसे अपने रिश्तेदारों और दोस्तों के लिए उपहार के रूप में ले जाना पसंद करते हैं, क्योंकि यह मिठाई न सिर्फ स्वाद में लाजवाब है, बल्कि पैकिंग के बाद भी लंबे समय तक सुरक्षित रहती है।

मेहनत और बारीकी से बनती है मिठाई

मंटू मोदक के अनुसार, सेव लड्डू को बनाने की विधि काफी धैर्य और परिश्रम का काम है। इसे तैयार करने के लिए सबसे पहले उत्तम दर्जे के बेसन का चयन किया जाता है। बेसन को पानी में घोलकर उससे बारीक सेव निकाली जाती है। इन सेवों को शुद्ध तेल या घी में धीमी आंच पर सुनहरा होने तक तला जाता है। तलने के बाद इन्हें पूरी तरह से ठंडा होने के लिए छोड़ दिया जाता है, जिससे इनका कुरकुरापन बना रहे और स्वाद में कोई कमी न आए। यह प्रक्रिया ही लड्डू के मुख्य आधार को तैयार करती है।

चीनी की चाशनी और मेवों का जादू

सेव तैयार हो जाने के बाद असली बारी चाशनी के साथ मिश्रण तैयार करने की होती है। एक विशेष प्रक्रिया के जरिए चीनी की चाशनी बनाई जाती है, जिसमें इलायची पाउडर, मगज, काजू, किशमिश और शुद्ध देसी घी का उपयोग किया जाता है। जब चाशनी में ये सभी सामग्रियां घुल-मिल जाती हैं, तब उसमें तैयार किए गए बेसन के सेव मिलाए जाते हैं। मंटू मोदक बताते हैं कि इस मिश्रण को बहुत ही हल्के हाथों से मिलाना पड़ता है ताकि सेव टूटे नहीं। इसके बाद इसे लड्डू का गोल आकार दिया जाता है, जो इसे एक पारंपरिक रूप देता है।

त्योहारों में बढ़ जाती है मांग

इस लड्डू की मांग का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि सरायकेला के आसपास के जिलों से भी लोग इसे खरीदने आते हैं। शादी-ब्याह, पूजा, मेलों और बड़े त्योहारों के दौरान इसकी मांग कई गुना बढ़ जाती है। ऐसे समय में हलवाइयों को इसे निरंतर बनाना पड़ता है। मंटू मोदक कहते हैं कि इस मिठाई की इतनी मांग रहती है कि स्टॉक कब खत्म हो जाए, कहना मुश्किल होता है। वे बताते हैं कि एक बार जो व्यक्ति इसका स्वाद चख लेता है, वह इसे बार-बार खरीदने के लिए जरूर आता है। कुरकुरी सेव, मिठास और ड्राई फ्रूट्स का यह तालमेल इसे आधुनिक दौर में भी एक लोकप्रिय मिठाई बनाए हुए है।

सालों से कायम है स्वाद

आज के समय में जब बाजार में तमाम तरह की आधुनिक मिठाइयां उपलब्ध हैं, सरायकेला का यह पारंपरिक सेव लड्डू आज भी अपनी पुरानी पहचान और स्वाद को पूरी तरह से संजोए हुए है। यह स्थानीय विरासत का एक गौरवशाली उदाहरण है, जिसे लोग आज भी उसी चाहत के साथ खाते हैं जैसे वे वर्षों पहले खाया करते थे। यह न केवल एक मिठाई है, बल्कि सरायकेला की संस्कृति और परंपरा का एक अहम हिस्सा है जो हर साल पर्यटकों और स्थानीय लोगों को अपनी ओर आकर्षित करता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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