बरसात में जंगलों से चुनकर लाते हैं ये खास पत्ता, चावल के माड़ के साथ बनती है लाजवाब सब्जी जीवनशैली एक घंटा पहले 6
छत्तीसगढ़ के सरगुजा में ग्रामीण बरसात के दौरान जंगलों से कोचई पत्ते लाते हैं और उसे सुखाकर चावल के माड़ के साथ एक खास पारंपरिक डिश तैयार करते हैं। यह तरीका उन्हें बाजार पर निर्भर रहने से बचाता है और स्वाद में भी लाजवाब है।

कोचई पत्ते की अनोखी रेसिपी

छत्तीसगढ़ के सरगुजा जिले के ग्रामीण इलाकों में आजकल एक खास देसी सब्जी की चर्चा काफी तेज है। बरसात के मौसम में जंगलों में प्राकृतिक रूप से उगने वाले कोचई पत्ते ग्रामीणों के लिए किसी खजाने से कम नहीं हैं। यह सब्जी न केवल स्वाद में बेहतरीन है, बल्कि इसे बनाने का तरीका भी पूरी तरह से पारंपरिक है। ग्रामीण बाजार की महंगी सब्जियों के भरोसे रहने के बजाय अपने आसपास के जंगलों से इन पत्तों को चुनकर लाते हैं और इनका भरपूर आनंद लेते हैं।

धूप में सुखाकर लंबे समय तक सुरक्षित

स्थानीय निवासी सनी माझी ने बताया कि बरसात के दिनों में जब जंगलों में ये पत्ते पर्याप्त मात्रा में उग आते हैं, तब ग्रामीण इन्हें एकत्रित करते हैं। इन्हें सीधे इस्तेमाल करने के अलावा धूप में अच्छी तरह सुखाकर संरक्षित भी किया जाता है। सूखने के बाद इन कोचई पत्तों को लंबे समय तक खराब होने का डर नहीं रहता है, जिससे ग्रामीण इसे साल के बाकी मौसमों में भी अपनी सुविधानुसार इस्तेमाल कर सकते हैं। यह प्रक्रिया ग्रामीण जीवन की आत्मनिर्भरता का एक बेहतरीन उदाहरण पेश करती है।

चावल के माड़ यानी पसिया का कमाल

इस सब्जी की सबसे बड़ी खासियत इसके बनाने के तरीके में छिपी है। कोचई पत्ते की सब्जी को चावल के बचे हुए पानी यानी माड़, जिसे स्थानीय भाषा में पसिया कहा जाता है, उसके साथ तैयार किया जाता है। सब्जी बनाने की प्रक्रिया में सबसे पहले सूखे हुए पत्तों को तैयार किया जाता है। इसके बाद इसमें पसिया के साथ स्वादानुसार नमक, तीखी मिर्च, तेल और ताजे टमाटर मिलाए जाते हैं। ग्रामीणों का मानना है कि पसिया के साथ जब ये पत्ते पकते हैं, तो इनका स्वाद बेहद खास और लाजवाब हो जाता है, जिसे बाजार में मिलने वाली सब्जियां मात नहीं दे सकतीं।

पीढ़ियों से चला आ रहा पारंपरिक स्वाद

सनी राम माझी आगे बताते हैं कि यह कोई नई खोज नहीं है, बल्कि यह स्वाद उनकी जीवनशैली और परंपरा का हिस्सा है। गांव के लोगों की बचपन की कई यादें इस पारंपरिक व्यंजन से जुड़ी हुई हैं। पीढ़ी-दर-पीढ़ी चली आ रही यह परंपरा आज भी ग्रामीण इलाकों में जीवंत है। यह न केवल उनके खानपान का हिस्सा है, बल्कि यह उनके पूर्वजों से मिले ज्ञान को भी दर्शाता है कि कैसे प्रकृति में उपलब्ध चीजों का उपयोग सही तरीके से किया जा सकता है।

बाजार पर निर्भरता में कमी

कोचई पत्ते की उपलब्धता ने ग्रामीणों को बाजार से सब्जियां खरीदने के बोझ से काफी हद तक मुक्त कर दिया है। जंगल से मुफ्त में मिलने वाली इस सब्जी को संरक्षित करके रखना न केवल आर्थिक बचत का जरिया है, बल्कि यह उन्हें ताजी और प्राकृतिक चीजों का सेवन करने का मौका भी देता है। इस प्रकार, सरगुजा के ग्रामीण आधुनिक दौर में भी अपनी जड़ों से जुड़े हुए हैं और पारंपरिक भोजन का आनंद ले रहे हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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