बिहार
एक घंटा पहले
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बिहार के मिथिलांचल की शान और वहां के किसानों की जीविका का मुख्य आधार, मखाना अब सात समंदर पार अपनी धाक जमा रहा है। मिथिला के इस खास उत्पाद को अब अंतरराष्ट्रीय बाजार में एक नया और बेहद मजबूत मुकाम हासिल हुआ है। भौगोलिक संकेतक यानी GI टैग प्राप्त मिथिला मखाना की 18 मीट्रिक टन की पहली बड़ी समुद्री खेप सफलतापूर्वक ऑस्ट्रेलिया पहुंच चुकी है। बिहार के कृषि निर्यात के इतिहास में इसे एक बेहद ऐतिहासिक और मील का पत्थर माना जा रहा है। इस खास उपलब्धि पर बिहार के मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी और JDU के कार्यकारी अध्यक्ष संजय झा ने सोशल मीडिया पर खुशी जाहिर की है और इसे राज्य के किसानों के लिए एक नए सुनहरे युग की शुरुआत बताया है।
दरभंगा के किसानों को मिला बंपर मुनाफा
इस पूरे मामले में सबसे ज्यादा राहत और खुशी की बात किसानों के लिए सामने आई है। इस निर्यात प्रक्रिया की सबसे बड़ी विशेषता यह रही कि मखाने की इस बड़ी खेप की आपूर्ति के लिए बिचौलियों की मदद लेने के बजाय सीधे दरभंगा के स्थानीय किसानों से खरीदारी की गई। इसका सीधा असर यह हुआ कि किसानों को उनके मखाने के लिए बाजार में चल रहे सामान्य मूल्य की तुलना में लगभग 18 प्रतिशत अधिक कीमत मिली है।
मुख्यमंत्री सम्राट चौधरी ने सोशल मीडिया मंच एक्स पर इस संबंध में जानकारी साझा करते हुए इसे बिहार के कृषि क्षेत्र के लिए एक क्रांतिकारी कदम बताया। उन्होंने स्पष्ट किया कि जब किसानों को सीधे बड़े खरीदारों और अंतरराष्ट्रीय निर्यातकों से जोड़ा जाता है, तो बिचौलियों की भूमिका पूरी तरह समाप्त हो जाती है और किसानों की वास्तविक आमदनी में सीधे तौर पर बड़ी बढ़ोतरी दर्ज की जाती है।
वैश्विक बाजार में लगातार बढ़ रही है मिथिला मखाने की मांग
ऐसा नहीं है कि मखाने का निर्यात पहली बार हो रहा है। भारत से मखाने का निर्यात लंबे समय से दुनिया के विभिन्न हिस्सों में होता रहा है। कृषि और प्रसंस्कृत खाद्य उत्पाद निर्यात विकास प्राधिकरण यानी APEDA के आंकड़ों के अनुसार, भारतीय मखाना लगातार अमेरिका, कनाडा, संयुक्त अरब अमीरात (UAE) और ऑस्ट्रेलिया जैसे बड़े देशों के बाजारों में अपनी जगह बना रहा है।
बिहार पूरे देश में मखाना उत्पादन का सबसे प्रमुख केंद्र है और इसमें भी दरभंगा और उसके आसपास के जिलों का योगदान सबसे महत्वपूर्ण है। दरभंगा को देश के सबसे बड़े मखाना उत्पादक क्षेत्रों में गिना जाता है और अब यहां का मखाना ऑस्ट्रेलिया के सुपरमार्केटों और घरों की रसोई तक पहुंच चुका है।
समुद्री मार्ग से मखाने का भेजा जाना अपने आप में एक बड़ा बदलाव है। आमतौर पर मखाने जैसी नाजुक चीजों को हवाई मार्ग से भेजा जाता रहा है, जिससे इसकी लागत काफी बढ़ जाती थी। लेकिन समुद्री मार्ग से 18 टन जैसी भारी मात्रा में मखाना भेजना इस बात का संकेत है कि अब इसकी पैकेजिंग और संरक्षण की तकनीक इतनी बेहतर हो चुकी है कि यह लंबी समुद्री यात्रा के दौरान भी सुरक्षित रह सकता है। इससे निर्यात लागत में भारी कमी आएगी, जिसका सीधा मुनाफा किसानों और स्थानीय उद्यमियों को मिल सकेगा।
GI टैग ने बदली मिथिला मखाने की तकदीर
मिथिला मखाने को वैश्विक स्तर पर पहचान दिलाने में सबसे बड़ी भूमिका GI टैग की रही है। मिथिला मखाने को 16 अगस्त 2022 को भारत सरकार की ओर से आधिकारिक तौर पर GI टैग दिया गया था।
- विशिष्ट पहचान: GI टैग मिलने से किसी भी उत्पाद की भौगोलिक उत्पत्ति और उसकी विशेष गुणवत्ता को अंतरराष्ट्रीय मान्यता मिलती है।
- बेहतर बाजार मूल्य: इस टैग के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजारों में नकली या मिलावटी उत्पादों पर रोक लगती है, जिससे मिथिला के असली मखाने को सही और ऊंचा दाम मिल पाता है।
- निर्यात में आसानी: APEDA के अनुसार, इस टैग के मिलने के बाद से अंतरराष्ट्रीय निर्यातकों की रुचि मिथिला मखाने में तेजी से बढ़ी है, जिसका सीधा लाभ अब जमीन पर किसानों को मिल रहा है।
16 अगस्त 2022 का दिन बिहार के इतिहास में इसलिए दर्ज हो गया क्योंकि इसी दिन मिथिला मखाना को यह विशेष सुरक्षा और सम्मान मिला था। इसके पहले मखाने को साधारण उत्पाद के रूप में देखा जाता था, जिससे किसानों को बहुत ही कम दाम मिलते थे। बिचौलिए अक्सर किसानों का शोषण करते थे और बहुत कम दामों पर उनसे मखाना खरीदकर खुद भारी मुनाफा कमाते थे। लेकिन अब स्थिति पूरी तरह बदल चुकी है और इस वैश्विक खेप ने इस बदलाव को पूरी तरह प्रमाणित कर दिया है।
'लोकल टू ग्लोबल' की सोच को मिली नई उड़ान
JDU के राष्ट्रीय कार्यकारी अध्यक्ष और राज्यसभा सांसद संजय झा ने भी इस निर्यात को मिथिला के लोगों के लिए अत्यंत गौरवशाली क्षण बताया है। उन्होंने अपने सोशल मीडिया संदेश में कहा कि मखाने के वैश्विक बाजार में हो रहे इस विस्तार से न केवल उत्पादन करने वाले किसानों को फायदा होगा, बल्कि मखाना प्रोसेसिंग, पैकेजिंग और लॉजिस्टिक्स से जुड़े हजारों लोगों के लिए रोजगार के नए अवसर भी पैदा होंगे।
उन्होंने इस सफलता को केंद्र और राज्य सरकार की किसान कल्याण नीतियों और 'लोकल टू ग्लोबल' दृष्टिकोण का एक जीवंत उदाहरण बताया। उनके अनुसार, मिथिला के कई अन्य पारंपरिक उत्पादों में भी वैश्विक स्तर पर पहचान बनाने की अपार संभावनाएं हैं और सरकार इस दिशा में लगातार काम कर रही है।
मखाना सिर्फ फसल नहीं, अब है एक बड़ा उद्योग
बिहार में अब मखाना सिर्फ एक पारंपरिक खेती या भोजन की सामग्री मात्र नहीं रह गया है, बल्कि यह अब एक बहुत बड़ा कॉर्पोरेट और निर्यात उद्योग बनता जा रहा है। सरकार मखाना बोर्ड के माध्यम से इसके उत्पादन से लेकर इसकी अत्याधुनिक प्रोसेसिंग, आकर्षक पैकेजिंग और वैश्विक ब्रांडिंग को बढ़ावा दे रही है।
दरभंगा में स्थित राष्ट्रीय मखाना अनुसंधान केंद्र इस दिशा में तकनीकी अनुसंधान और किसानों को आधुनिक प्रशिक्षण देने में बहुत बड़ी भूमिका निभा रहा है। मखाने की इस पहली 18 टन की बड़ी समुद्री खेप ने यह साबित कर दिया है कि यदि सही दिशा में प्रयास किया जाए, तो बिहार का कृषि क्षेत्र न केवल आत्मनिर्भर बन सकता है बल्कि दुनिया के बड़े बाजारों को भी नियंत्रित कर सकता है। अगर आने वाले समय में ऑस्ट्रेलिया और अन्य देशों में इसकी मांग इसी तरह बढ़ती रही, तो वह दिन दूर नहीं जब बिहार के किसानों की तकदीर पूरी तरह बदल जाएगी।
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