मध्य प्रदेश
2 घंटे पहले
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भारत में धान की खेती करने वाले किसान भाइयों के लिए फसल की हर अवस्था बहुत महत्वपूर्ण होती है, लेकिन रोपाई के बाद एक ऐसा समय आता है जो सीधे तौर पर पैदावार को प्रभावित करता है। धान की रोपाई के लगभग 30 से 40 दिन बाद फसल में 'गोभ' यानी बालियां बनने की शुरुआती अवस्था आ जाती है। यह वह नाजुक समय होता है जब पौधे के भीतर बालियों का विकास शुरू होता है। इस दौरान की गई एक छोटी सी लापरवाही भी फसल के दानों के भराव और पूरी पैदावार को नुकसान पहुंचा सकती है। इसलिए, किसानों को इस समय पोषक तत्वों के प्रबंधन पर विशेष ध्यान देना चाहिए ताकि दाने मजबूत और चमकदार बन सकें।
गोभ की अवस्था क्यों है इतनी महत्वपूर्ण?
कृषि क्षेत्र के जानकार और विशेषज्ञ चंद्रभूषण पांडे के मुताबिक, जिन किसान भाइयों ने समय पर धान की रोपाई पूरी कर ली थी, उनकी फसल अब गोभ की अवस्था में प्रवेश कर चुकी है। इस चरण में पौधों को मुख्य रूप से पोटाश और फास्फोरस की बहुत ज्यादा जरूरत होती है। यदि इस समय पौधों को सही मात्रा में ये तत्व मिल जाएं, तो बालियां एक समान रूप से और स्वस्थ बाहर निकलती हैं। इसके परिणाम स्वरूप दानों का आकार बेहतर होता है और उनमें चमक आती है।
घुलनशील एनपीके का करें सही इस्तेमाल
इस अवस्था में पौधों को तुरंत पोषण देने के लिए पानी में पूरी तरह घुलनशील खादों का छिड़काव करने की सलाह दी जाती है। विशेषज्ञ चंद्रभूषण पांडे ने बताया कि किसानों को अपनी 30 से 40 दिन की फसल में निम्नलिखित तरीकों से पोषण देना चाहिए:
- फसल में NPK 18:18:18 या फिर NPK 19:19:19 का छिड़काव करना चाहिए।
- इसकी मात्रा के लिए लगभग डेढ़ किलोग्राम एनपीके को लेकर उसे 150 लीटर पानी में अच्छी तरह घोल लें।
- यह घोल प्रति एकड़ की दर से खेत में छिड़काव करने के लिए पर्याप्त होता है।
हालांकि, छिड़काव करने से पहले किसानों को अपने स्थानीय क्षेत्र के कृषि विशेषज्ञों से मिट्टी और खेत की तात्कालिक स्थिति के आधार पर सलाह अवश्य ले लेनी चाहिए।
यूरिया के अंधाधुंध प्रयोग से बचें
अक्सर देखा जाता है कि किसान फसल को हरा-भरा रखने के चक्कर में इस समय भी भारी मात्रा में यूरिया का इस्तेमाल करते हैं। इस पर कृषि विज्ञान केंद्र के वैज्ञानिक शैलेंद्र गौतम ने अपनी राय साझा की है। उन्होंने चेतावनी देते हुए कहा है कि गोभ की अवस्था के दौरान यूरिया के अनावश्यक प्रयोग से पूरी तरह बचना चाहिए।
वैज्ञानिक के अनुसार, अधिक मात्रा में नाइट्रोजन या यूरिया मिलने से पौधे बहुत ज्यादा कोमल और संवेदनशील हो जाते हैं। पौधों में कोमलता बढ़ने के कारण उन पर कीटों और विभिन्न रोगों के आक्रमण का खतरा काफी ज्यादा बढ़ जाता है। इसलिए यूरिया के बजाय पौधों को मजबूती प्रदान करने वाले तत्वों जैसे कैल्शियम, पोटाश और फास्फोरस पर ध्यान केंद्रित करना चाहिए।
सूक्ष्म पोषक तत्व भी निभाते हैं बड़ी भूमिका
फसल की गुणवत्ता को बढ़ाने और चमकदार दानों के लिए केवल मुख्य पोषक तत्व ही काफी नहीं होते, बल्कि सूक्ष्म पोषक तत्वों का भी अपना विशेष महत्व होता है। धान की पैदावार बढ़ाने के लिए जिंक, सल्फर, मैग्नीशियम, आयरन और कैल्शियम जैसे सूक्ष्म पोषक तत्वों का एक संतुलित मिश्रण इस्तेमाल करना चाहिए।
विशेषज्ञों के सुझाव के अनुसार, लगभग डेढ़ किलोग्राम सूक्ष्म पोषक तत्वों के मिश्रण को 150 से 200 लीटर पानी में अच्छी तरह मिलाकर घोल तैयार कर लें। इस घोल का छिड़काव फसल में बालियां निकलने के ठीक बाद या फिर दुग्धावस्था के दौरान करना सबसे अधिक फायदेमंद साबित होता है।
रोग और कीटों की निगरानी है आवश्यक
गोभ की अवस्था से लेकर फसल के पकने तक का समय कीटों के अनुकूल भी होता है। इसलिए इस दौरान किसानों को लगातार अपने खेतों की निगरानी करनी चाहिए। पत्तियों का रंग बदलना, तनों में सड़न या किसी कीट का प्रकोप दिखने पर तुरंत सतर्क हो जाएं। विशेषज्ञों का कहना है कि किसी भी रोग के लक्षण दिखने पर बिना सोचे-समझे या बिना पहचान किए बाजार से लाकर किसी भी कीटनाशक या दवा का छिड़काव न करें। सबसे पहले कृषि विभाग के अधिकारियों या किसी विशेषज्ञ से सलाह लें और सही दवा का ही छिड़काव करें।
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