झारखंड
8 घंटे पहले
3
विचारों
झारखंड के गांवों में लोकदेवताओं और उनसे जुड़ी मान्यताओं की एक अलग ही दुनिया बसती है। आधुनिकता के इस दौर में भी कई ऐसी परंपराएं हैं जो पीढ़ी-दर-पीढ़ी लोगों की आस्था का केंद्र बनी हुई हैं। ऐसा ही एक अनूठा उदाहरण बोकारो जिले के चंदनक्यारी प्रखंड के सिमुलिया और आसपास के गांवों में देखने को मिलता है, जहां ग्रामीण देवता दाहय रंगाहाड़ी बाबा के वाहन माने जाने वाले घोड़ों की प्रतिमा की पूजा की जाती है।
गांव के प्रवेश द्वार पर खड़ी आस्था की प्रतिमा
सिमुलिया गांव में प्रवेश करते ही दो घोड़ों की बनी बड़ी प्रतिमा हर किसी का ध्यान अपनी ओर खींच लेती है। ये केवल साधारण मूर्तियां नहीं, बल्कि ग्रामीणों के विश्वास, मनोकामनाओं और लोकआस्था का प्रतीक हैं। यहां के लोग अपनी मन्नत पूरी होने पर दाहय रंगाहाड़ी बाबा को दो जोड़ी मिट्टी के घोड़े अर्पित करते हैं।
रात में निकलते बाबा और घुंघरुओं की आवाज
गांव के निवासी संदीप महतो बताते हैं कि उनके बुजुर्गों से सुनी कहानियों के अनुसार दाहय रंगाहाड़ी बाबा घोड़े पर सवार होकर पूरे गांव की रक्षा करते हैं। मान्यता है कि जब भी गांव पर कोई संकट आता है, बाबा अपने भक्तों की रक्षा के लिए सामने आते हैं।
संदीप महतो आगे कहते हैं कि बुजुर्गों के अनुसार रात के समय जब बाबा गांव की निगरानी के लिए निकलते हैं, तब कई लोगों को घोड़ों के घुंघरुओं जैसी आवाजें सुनाई देती हैं। ग्रामीण इसे बाबा की उपस्थिति और गांव की सुरक्षा का संकेत मानते हैं। इसके अलावा जब भी किसी की मन्नत पूरी होती है, तो वह इस ग्रामीण देवता को मिट्टी के घोड़े की जोड़ी चढ़ाता है।
साल में दो बार होती है विशेष पूजा
गांव के एक अन्य निवासी ईश्वरचंद महतो बताते हैं कि दाहय रंगाहाड़ी बाबा गांव के सुख-दुख में साथ रहने वाले देवता हैं। ग्रामीण उनकी रोजाना पूजा-अर्चना करते हैं, लेकिन साल में दो बार विशेष पूजा का आयोजन किया जाता है। इन विशेष अवसरों पर बड़ी संख्या में ग्रामीण एक साथ मिलकर पारंपरिक रीति-रिवाजों के साथ बाबा की पूजा करते हैं। इसके साथ ही विशेष मौके पर बकरे की बलि देने की परंपरा भी निभाई जाती है।
Comments
0 comment