अरहर बोने से पहले अपनाएं ये जैविक तरीके, नेमाटोड समेत हर दुश्मन कीट का होगा खात्मा भारत एक घंटा पहले 3
फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. हादी हुसैन खान के अनुसार अरहर की बुआई से पहले भूमि का जैविक शोधन करने से मिट्टी में छिपे हानिकारक फफूंद, कीट और नेमाटोड नष्ट हो जाते हैं और फसल शुरू से ही स्वस्थ रहती है।

खरीफ सीजन शुरू होते ही किसान अरहर की बुआई की तैयारियों में जुट गए हैं। दलहनी फसलों में अरहर का अहम स्थान है, लेकिन कीटों और बीमारियों का हमला इसकी पैदावार को भारी नुकसान पहुंचा देता है। कृषि विशेषज्ञों का मानना है कि बेहतर और सुरक्षित फसल के लिए सिर्फ अच्छे बीज चुनना काफी नहीं है, बुआई से पहले भूमि का शोधन करना भी उतना ही जरूरी है। भूमि शोधन से मिट्टी में मौजूद हानिकारक फफूंद, जीवाणु और कीट खत्म हो जाते हैं और फसल शुरुआती अवस्था से ही तंदुरुस्त बनी रहती है।

किसानों के लिए क्यों खास है अरहर

फसल सुरक्षा वैज्ञानिक डॉ. हादी हुसैन खान बताते हैं कि शाहजहांपुर के किसानों के लिए अरहर एक महत्वपूर्ण फसल है। यह दलहनी फसल वायुमंडल की नाइट्रोजन को सोखकर मिट्टी की उर्वरता बढ़ाती है। उनके मुताबिक अरहर को कीटों और रोगों से बचाने का सबसे कारगर तरीका भूमि का जैविक शोधन है। इसके लिए किसान ट्राइकोडर्मा, बवेरिया बेसियाना और सूडोमोनास को गोबर की खाद के साथ मिलाकर कल्चर तैयार करें।

इस कल्चर के इस्तेमाल से मिट्टी में मित्र जीवाणुओं की संख्या बढ़ती है और हानिकारक फफूंद व कीट नष्ट हो जाते हैं। सही ढंग से किया गया भूमि शोधन फसल को रोगमुक्त रखता है, खेती की लागत घटाता है और पैदावार बढ़ने के साथ किसानों की खुशहाली भी बढ़ती है।

बुआई से पहले कैसे तैयार करें जैविक कल्चर

अरहर बोने से पहले मिट्टी की जांच कराना जरूरी है। फसल को रोगों से सुरक्षित रखने के लिए किसानों को जैविक कल्चर बनाना चाहिए। इसके लिए ढाई किलोग्राम ट्राइकोडर्मा, ढाई से तीन किलोग्राम बवेरिया बेसियाना और इतनी ही मात्रा में सूडोमोनास लें। इन तीनों को अलग-अलग 100 किलोग्राम अच्छी तरह सड़ी हुई गोबर की खाद में मिलाएं।

तैयार कल्चर को किसी छायादार जगह पर रखकर रोजाना हल्के पानी का छिड़काव करें, जिससे यह 8-10 दिनों में उपयोग के लिए तैयार हो जाता है। गोबर की खाद के साथ बना यह जैविक कल्चर खेत की अंतिम जुताई के समय इस्तेमाल करना चाहिए।

सबसे पहले मिट्टी में ट्राइकोडर्मा का छिड़काव करें, जो फफूंद जनित रोगों को रोकता है। दूसरे चरण में बवेरिया बेसियाना और अंतिम चरण में सूडोमोनास फ्लोरेसेंस का प्रयोग करें। यह प्रक्रिया मिट्टी की जैविक संरचना को मजबूत बनाती है और पौधों की जड़ों को सुदृढ़ रखकर उन्हें बीमारियों से बचाती है।

नेमाटोड पर काबू पाने के खास उपाय

अरहर की फसल में नेमाटोड नामक बीमारी का प्रकोप अक्सर देखा जाता है। इसके असरदार नियंत्रण के लिए भूमि शोधन के समय पेसिलोमायसिस का एक से दो किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से उपयोग करना चाहिए। इसके अलावा किसान चाहें तो 60 किलोग्राम प्रति हेक्टेयर की दर से नीम की निबोली या नीम की खली खेत में मिला सकते हैं। यह प्राकृतिक उपाय मिट्टी में पनपने वाले हानिकारक कीड़ों और नेमाटोड का पूरी तरह सफाया कर देता है।

जैविक दवा न मिले तो करें गहरी जुताई

अगर किसान जैविक दवाओं का इंतजाम नहीं कर पा रहे हैं, तो उन्हें गर्मी के मौसम में खेत की गहरी जुताई जरूर करनी चाहिए। गहरी जुताई से मिट्टी की निचली सतह में छिपे कीटों के अंडे और नेमाटोड धूप के संपर्क में आकर नष्ट हो जाते हैं। इन वैज्ञानिक और जैविक तरीकों को अपनाकर किसान अपनी अरहर की फसल को पूरी तरह कीट व रोग मुक्त रख सकते हैं और स्वस्थ फसल से अधिक उत्पादन हासिल कर सकते हैं।

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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