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3 घंटे पहले
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नई दिल्ली के प्रतिष्ठित परिसर भारत मंडपम में 'टूल्स एंड इक्विपमेंट एक्सपो 2026' (TAEE) की शुरुआत हो चुकी है। यह भव्य आयोजन देश के विनिर्माण (मैन्युफैक्चरिंग) परिदृश्य में एक नए युग का सूत्रपात करने जा रहा है। आने वाले समय में भारत के सूक्ष्म, लघु और मध्यम उद्यमों (MSME) की दिशा और दशा में बड़े पैमाने पर बदलाव देखने को मिलेगा। इस तीन दिवसीय प्रदर्शनी में उद्योग जगत के शीर्ष दिग्गज, सरकारी नीति निर्माता और तकनीकी विशेषज्ञ एक साथ आकर देश के औद्योगिक भविष्य की रूपरेखा तैयार कर रहे हैं। वर्तमान समय की सबसे बड़ी जरूरत भारत के विनिर्माण क्षेत्र को डिजिटल एकीकरण की ओर ले जाने और 'इंडस्ट्री 4.0' की आधुनिक तकनीकों को अपनाने की है, जिस पर इस आयोजन में विशेष ध्यान केंद्रित किया जा रहा है।
आधुनिक तकनीक और वैश्विक सहयोग का संगम
'इन्फॉर्मा मार्केट्स इन इंडिया' द्वारा आयोजित इस 'टूल्स एंड इक्विपमेंट एक्सपो 2026' में हैंड टूल्स, पावर टूल्स, अत्याधुनिक कटिंग एवं वेल्डिंग तकनीकों के साथ-साथ स्मार्ट ऑटोमेशन से जुड़े आधुनिक समाधानों का सजीव प्रदर्शन किया जा रहा है। वैश्विक विनिर्माण परिदृश्य में अपनी जगह मजबूत करने के लिए भारत को जिस तकनीकी सहयोग की आवश्यकता है, वह इस एक्सपो के माध्यम से दिखाई दे रही है। इस अंतरराष्ट्रीय प्रदर्शनी में जर्मनी, चीन, ताइवान और हांगकांग जैसे वैश्विक स्तर पर अग्रणी देशों की कंपनियां हिस्सा ले रही हैं। ये देश अपनी उच्च स्तरीय और उन्नत तकनीकों के माध्यम से भारतीय विनिर्माण उद्योगों को वैश्विक मानकों के अनुरूप खुद को ढालने और तकनीकी रूप से अधिक सक्षम बनने में मदद कर रहे हैं।
लीन मैन्युफैक्चरिंग से 'इंडस्ट्री 4.0' की ओर बढ़ता कदम
भारत सरकार के वाणिज्य एवं उद्योग मंत्रालय के अंतर्गत NPC-DPIIT के उप निदेशक यदु कुमार यादव ने इस आयोजन के दौरान भारतीय विनिर्माण के भविष्य को लेकर बेहद महत्वपूर्ण दृष्टिकोण साझा किया। उन्होंने स्पष्ट किया कि भारतीय विनिर्माण विकास का जो अगला चरण होने वाला है, वह देश के MSME सेक्टर को विकास की नई ऊंचाइयों पर लेकर जाएगा। उन्होंने इस बात पर बल दिया कि इस विकास की पूरी रूपरेखा इस बात पर निर्भर करेगी कि हमारे लघु उद्योग लीन मैन्युफैक्चरिंग (मितव्ययी विनिर्माण) से आगे बढ़कर 'इंडस्ट्री 4.0' और IoT आधारित प्रणालियों को कितनी तेजी से अपनाते हैं।
पिछले एक दशक का विश्लेषण करते हुए उन्होंने बताया कि बीते दस वर्षों में सरकार और उद्योगों का मुख्य ध्यान लीन मैन्युफैक्चरिंग के माध्यम से MSME के विभिन्न उत्पादों, उनकी विनिर्माण प्रक्रियाओं और प्रणालियों को आपस में जोड़ने पर केंद्रित था। लेकिन अब समय आ गया है कि इस एकीकरण को अगले डिजिटल स्तर पर ले जाया जाए। सरकार की मंशा इस बदलाव को देश के हर कोने तक पहुंचाने की है। इसी दिशा में काम करते हुए MSME मंत्रालय की 'रैंप' (RAMP) योजना के तहत वर्तमान में गुजरात की 750 से अधिक औद्योगिक इकाइयों को 'इंडस्ट्री 4.0' के अनुकूल पारिस्थितिकी तंत्र (इकोसिस्टम) से जोड़ने का काम किया जा रहा है। भारत सरकार की योजना आने वाले समय में पूरे देश में इसी प्रकार का डिजिटल और आधुनिक इकोसिस्टम तैयार करने की है ताकि छोटे से छोटा उद्यम भी वैश्विक प्रतिस्पर्धी बन सके।
कटिंग टूल उद्योग में विकास के व्यापक अवसर
प्रदर्शनी के दौरान इंडियन कटिंग टूल मैन्युफैक्चरर्स एसोसिएशन के कार्यकारी सचिव पीजी सुब्रमण्यम ने देश में बढ़ते विनिर्माण बाजार की ओर ध्यान आकर्षित किया। उन्होंने बताया कि घरेलू स्तर पर विनिर्माण क्षेत्र में हो रहे बड़े बदलावों के चलते भारतीय कटिंग टूल उद्योग एक बेहद महत्वपूर्ण और परिवर्तनकारी दौर से गुजर रहा है। वैश्विक बाजार के आंकड़ों को साझा करते हुए उन्होंने बताया कि वर्तमान में पूरी दुनिया का कटिंग टूल बाजार लगभग 23 बिलियन USD का है। उद्योग जगत के विश्लेषणों के अनुसार, वर्ष 2030 तक इस वैश्विक बाजार के बढ़कर लगभग 30 billion USD तक पहुंच जाने का अनुमान लगाया गया है।
हालांकि, उन्होंने भारतीय निर्माताओं के लिए एक बड़ी चुनौती और अवसर की ओर इशारा करते हुए कहा कि वर्तमान में इस विशाल वैश्विक बाजार में भारत की कुल हिस्सेदारी केवल 15% के आसपास ही है। यह आंकड़ा इस बात का प्रमाण है कि भारतीय विनिर्माताओं के लिए घरेलू के साथ-साथ अंतरराष्ट्रीय निर्यात बाजारों में अपनी उपस्थिति दर्ज कराने और अपने व्यवसाय का विस्तार करने के लिए बहुत बड़ी संभावना मौजूद है। पीजी सुब्रमण्यम ने इस बात पर भी विशेष बल दिया कि भारत के MSME सेक्टर को उद्योग के लिए चलाई जा रही विभिन्न सरकारी पहलों का लाभ उठाना चाहिए। इस क्षेत्र के विकास और स्टार्टअप्स की मदद के लिए सरकार द्वारा लगभग 40 विभिन्न योजनाएं संचालित की जा रही हैं, लेकिन इसके लिए उद्यमों के बीच अधिक जागरूकता पैदा करने और इन योजनाओं तक उनकी आसान पहुंच सुनिश्चित करने की दिशा में अभी काफी प्रयास करने की आवश्यकता है।
MSME का भारतीय अर्थव्यवस्था में योगदान और सरकारी वित्तीय सहायता
भारतीय अर्थव्यवस्था की रीढ़ माने जाने वाले MSME सेक्टर के आंकड़े इसके महत्व को दर्शाने के लिए काफी हैं। देश में वर्तमान में 9.5 करोड़ से अधिक पंजीकृत और अपंजीकृत MSME काम कर रहे हैं, जो सीधे तौर पर भारत के सकल घरेलू उत्पाद (GDP) में 30% से अधिक का महत्वपूर्ण योगदान देते हैं। यही नहीं, यह क्षेत्र देश के एक बहुत बड़े कार्यबल को सहारा देता है और लगभग 42 करोड़ से अधिक लोगों को रोजगार प्रदान करता है। ऐसे में देश के समग्र आर्थिक विकास और बड़े पैमाने पर रोजगार के नए अवसरों के सृजन के लिए MSME पर आधारित विनिर्माण को तकनीकी रूप से सुदृढ़ बनाना बेहद आवश्यक हो गया है।
'टूल्स एंड इक्विपमेंट एक्सपो 2026' में इस बात पर प्रकाश डाला गया कि यह प्रदर्शनी MSME के लिए आधुनिक तकनीकी प्रगति को अपनाने का एक बेहतरीन माध्यम है। इस क्षेत्र को उन्नत बनाने के लिए सरकारी सहयोग की भी कोई कमी नहीं है। सरकार द्वारा विभिन्न वित्तीय और प्रदर्शनी सहायता योजनाओं के माध्यम से पात्र MSME इकाइयों को ₹100 करोड़ तक का बिना किसी गारंटी (कोलैटरल-फ्री) का ऋण प्रदान किया जा रहा है। यह वित्तीय मदद छोटे उद्यमों के लिए बेहद मददगार साबित हो सकती है, जिससे वे अपने कारखानों में आधुनिक मशीनरी और संयंत्र स्थापित कर सकते हैं, अपनी उत्पादन क्षमता का विस्तार कर सकते हैं और बाजार में अपनी प्रतिस्पर्धात्मकता को बेहतर बना सकते हैं।
स्थानीयकरण और कार्यबल के कौशल विकास की जरूरत
एक्सपो में आए विभिन्न औद्योगिक विशेषज्ञों ने रेखांकित किया कि टूल्स और उपकरण किसी भी विनिर्माण उद्योग की मूल आधारशिला यानी उसकी रीढ़ की हड्डी होते हैं। चाहे वह ऑटोमोटिव क्षेत्र हो या कोई अन्य निर्माण क्षेत्र, कारखानों के उत्पादन और उत्पादकता को बढ़ाने में इन उपकरणों की बहुत बड़ी भूमिका होती है। आज भारत एक उपभोक्ता-आधारित अर्थव्यवस्था से आगे बढ़कर एक विनिर्माण-आधारित आर्थिक शक्ति बनने की दिशा में तेजी से कदम बढ़ा रहा है। इस बदलाव को टिकाऊ और प्रभावी बनाने के लिए हमें तकनीक और देश की युवा प्रतिभा, दोनों के विकास पर समान रूप से ध्यान देना होगा।
विशेषज्ञों का मानना है कि भारत के पास वर्तमान में तकनीक, मशीनों और उनके विभिन्न कलपुर्जों के स्थानीयकरण का एक बेहतरीन और ऐतिहासिक अवसर उपलब्ध है। लेकिन इसके साथ ही यह कड़वी सच्चाई भी जुड़ी है कि जब तक हम एक बेहद कुशल और प्रशिक्षित कार्यबल के माध्यम से अपनी उत्पादन क्षमताओं का पूरी तरह से स्थानीयकरण नहीं कर लेते, तब तक हमारी आपूर्ति श्रृंखला (सप्लाई चेन) सही मायने में आत्मनिर्भर नहीं बन पाएगी। अतः वैश्विक बाजार में अपनी धाक जमाने के लिए नई तकनीकों को अपनाने के साथ-साथ देश के कार्यबल के कौशल और प्रतिभा विकास को मजबूत करना सरकार और उद्योगपतियों दोनों के लिए अनिवार्य होगा।
औद्योगिक सुरक्षा और उत्पादकता का गहरा संबंध
औद्योगिक विकास के इस दौर में श्रमिकों की सुरक्षा भी एक बेहद गंभीर विषय बनकर उभरा है। इस विषय पर दिल्ली सरकार के प्रतिनिधियों ने अपने विचार साझा करते हुए बताया कि औद्योगिक उपकरणों और औजारों का सीधा संबंध व्यावसायिक सुरक्षा से होता है। देश के लगभग हर कारखाने या औद्योगिक इकाई में किसी न किसी स्तर पर मशीनों और उपकरणों का उपयोग किया जाता है। यदि इन उपकरणों का डिजाइन सही हो, उनका नियमित रखरखाव किया जाए और सुरक्षित तरीके से उनका उपयोग हो, तो न केवल हमारे देश के श्रमिक सुरक्षित रहेंगे, बल्कि कारखानों की उत्पादकता में भी उल्लेखनीय सुधार होगा। इसके विपरीत, घटिया दर्जे के असुरक्षित उपकरण या असुरक्षित कार्यप्रणाली देश के औद्योगिक क्षेत्रों में होने वाली विभिन्न दुर्घटनाओं का मुख्य कारण बनते हैं।
इस समस्या से निपटने के लिए केंद्र सरकार द्वारा लाए गए 'ऑक्यूपेशनल सेफ्टी, हेल्थ एंड वर्किंग कंडीशंस कोड, 2020' के तहत दुर्घटनाओं को रोकने, कार्यस्थल पर मौजूद खतरों की समय पर पहचान करने, उनके जोखिमों का आकलन करने और श्रमिकों के लिए एक सुरक्षित कार्यस्थल सुनिश्चित करने पर बहुत अधिक जोर दिया जा रहा है। विशेषज्ञों का स्पष्ट कहना है कि सुरक्षा के मानकों को मशीनों के डिजाइन में बाद में जोड़ने के बजाय विनिर्माण के प्रारंभिक चरण में ही शामिल किया जाना चाहिए। इससे भारतीय उद्योग दुर्घटना होने के बाद केवल उस पर प्रतिक्रिया देने के रवैये को छोड़कर, जोखिम पैदा होने से पहले ही उसकी पहचान करने और उसे नियंत्रित करने की एक स्वस्थ प्रणाली विकसित करने की दिशा में आगे बढ़ सकेगा।
वैश्विक स्तर पर प्रतिस्पर्धात्मकता और निर्यात की क्षमता
इस साल आयोजित हुए 'टूल्स एंड इक्विपमेंट एक्सपो 2026' में 300 से अधिक प्रदर्शकों ने अपने अत्याधुनिक उत्पादों का प्रदर्शन किया है। विशेषज्ञों का मानना है कि भारत को यदि वैश्विक स्तर पर एक बेहद प्रतिस्पर्धी और मजबूत विनिर्माण केंद्र के रूप में स्थापित होना है, तो हमारा पूरा ध्यान निर्यात बढ़ाने, बड़े पैमाने पर उत्पादन (मास प्रोडक्शन), लीन मैन्युफैक्चरिंग और क्लस्टर-आधारित औद्योगिक विकास पर केंद्रित करना होगा। वैश्विक विनिर्माण परिदृश्य में चीन के अनुभवों से काफी कुछ सीखा जा सकता है, जिसने बड़े पैमाने पर उत्पादन और एक सुदृढ़ औद्योगिक इकोसिस्टम के बल पर ही वैश्विक बाजार में अपनी बड़ी हिस्सेदारी बनाई है।
भारतीय उद्योगों को वैश्विक बाजारों की बढ़ती मांग और कड़े मानकों को पूरा करने के लिए अपनी सोच में बदलाव लाना होगा। इसके लिए लगातार सरकारी सहयोग, देश के बुनियादी ढांचे (इन्फ्रास्ट्रक्चर) की मजबूती और बड़े पैमाने पर क्लस्टर-आधारित विनिर्माण की दिशा में काम करना बेहद जरूरी है। भारत में वर्तमान में सभी श्रेणियों के उत्पादों के विनिर्माण के लिए एक मजबूत वैश्विक केंद्र बनने की पूरी क्षमता मौजूद है। वर्तमान समय में देश का हैंड और पावर टूल्स क्षेत्र एक बेहद रोमांचक और विकासशील दौर से गुजर रहा है। ऐसे में इस एक्सपो में उद्योगपतियों, निवेशकों और आम दर्शकों की भारी भागीदारी ने इस क्षेत्र के उत्साह को और बढ़ा दिया है। वर्तमान में भारत का हैंड और पावर टूल्स का निर्यात लगभग 1 बिलियन USD का है। लेकिन जिस गति से इस क्षेत्र में विकास हो रहा है, उसे देखते हुए वर्ष 2035 तक इसे बढ़ाकर 25 बिलियन USD से अधिक तक ले जाने की अपार संभावनाएं हैं। भारत के लिए अपनी विनिर्माण और निर्यात क्षमताओं को साबित करने का इससे बेहतर अवसर दूसरा नहीं हो सकता।
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