व्यापार
6 घंटे पहले
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एक ओर अमेरिका के विदेश मंत्री दावा कर रहे हैं कि भारत के साथ व्यापार समझौता 99 फीसदी पूरा हो चुका है, वहीं दूसरी ओर वॉशिंगटन ने सेक्शन 301 जैसे कानून की आड़ में भारत पर नया शुल्क लगाने की तैयारी कर ली है। अमेरिका ने बंधुआ मजदूरी समेत कई आरोपों की जांच का बहाना बनाकर भारत पर एक बार फिर 12.5 फीसदी टैरिफ लगाने का प्रस्ताव दिया है। ऐसे समय में जब दोनों देशों के बीच ट्रेड डील पर बातचीत जारी है, यह कदम भारत के सामने नई चुनौती खड़ी कर रहा है।
सरकार के थिंक टैंक ग्लोबल ट्रेड रिसर्च इनिशिएटिव (जीटीआरआई) ने दो टूक कहा है कि अमेरिका का यह फैसला नियमों के विरुद्ध है और भारत को इसका डटकर विरोध करना चाहिए। संस्थान के मुताबिक भारत के पास इस शुल्क को चुनौती देने के लिए पर्याप्त ठोस तर्क मौजूद हैं।
क्या कहता है जीटीआरआई
आर्थिक शोध संस्थान जीटीआरआई के अनुसार, धारा-301 जांच के तहत भारत पर प्रस्तावित 12.5 फीसदी शुल्क इस प्रावधान के दायरे से पूरी तरह बाहर है, इसलिए भारत को इसे चुनौती देनी चाहिए। संस्थान का कहना है कि 12.5 फीसदी का यह शुल्क अमेरिका की विश्व व्यापार संगठन से जुड़ी प्रतिबद्धताओं से भी अधिक है।
इससे पहले अमेरिकी व्यापार प्रतिनिधि (यूएसटीआर) ने बंधुआ मजदूरी से बनी वस्तुओं के आयात पर रोक लगाने में विफल रहने का आरोप लगाते हुए भारत समेत 54 देशों पर 12.5 फीसदी अतिरिक्त शुल्क लगाने का प्रस्ताव रखा था।
60 देशों के खिलाफ चल रही है कार्रवाई
अमेरिका की यह कार्रवाई कुल 60 देशों के खिलाफ शुरू की गई जांच के बाद की जा रही है। इस जांच में यूएसटीआर का आरोप है कि ये देश बंधुआ मजदूरी से तैयार उत्पादों के आयात पर असरदार प्रतिबंध लागू करने में नाकाम रहे हैं। जीटीआरआई का कहना है कि मौजूदा जांच धारा-301 के दायरे से बाहर है, क्योंकि यह प्रावधान जांच के घेरे में आ रहे देश के आयात और उसके स्रोत से नहीं, बल्कि अमेरिकी कंपनियों के सामने आने वाली बाजार पहुंच की बाधाओं से जुड़ा है।
अमेरिका के दावे में कहां है खामी
आर्थिक शोध संस्थान के मुताबिक यह जांच इस आरोप पर आधारित नहीं है कि निर्यात किए जाने वाले भारतीय उत्पाद बंधुआ मजदूरी से तैयार होते हैं। इसके बजाय यूएसटीआर की कार्रवाई इस सवाल पर केंद्रित है कि क्या भारत जैसे देश तीसरे देशों में बंधुआ मजदूरी से बने उत्पादों के आयात पर रोक लगाते हैं।
जीटीआरआई के संस्थापक अजय श्रीवास्तव का कहना है कि भारत को यह तर्क रखना चाहिए कि अमेरिका एकतरफा व्यापार उपायों के जरिये अपने मनपसंद आयात-नियंत्रण ढांचे को दूसरे देशों पर थोपने की कोशिश कर रहा है, जो धारा-301 के दायरे में आता ही नहीं। उन्होंने कहा कि भारत यह भी कह सकता है कि बंधुआ मजदूरी से जुड़े मामले, खासकर चीन जैसे देशों में, प्रायः उत्पाद-विशिष्ट होते हैं और खुद अमेरिका इन उत्पादों का बड़ा आयातक है। ऐसे में जब समस्या कुछ ही उत्पादों तक सीमित हो सकती है, तब पूरे देश पर शुल्क लगाना उचित नहीं ठहराया जा सकता।
दबाव की राजनीति खेल रहा अमेरिका
जीटीआरआई ने इन शुल्कों को वॉशिंगटन द्वारा भारत पर दबाव बढ़ाने की बड़ी रणनीति का हिस्सा भी बताया है, खासकर ऐसे वक्त में जब दोनों देश द्विपक्षीय व्यापार समझौते पर बातचीत कर रहे हैं। संस्थान ने आगाह किया कि भारत को अतिरिक्त उत्पादन क्षमता जैसे क्षेत्रों में और भी धारा-301 शुल्कों के लिए तैयार रहना चाहिए।
थिंक टैंक का मानना है कि अमेरिका इस तरह के दबाव के जरिये व्यापार समझौते में अपनी मनमर्जी की शर्तें शामिल करवाना चाहता है। अब देखना यह है कि भारत इस दोहरी मुश्किल से किस तरह निपटता है।
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