क्रूड ऑयल 80 डॉलर पर लुढ़का, क्या अब सस्ते होंगे पेट्रोल-डीजल? जानिए कब और कितनी राहत व्यापार 2 दिन पहले 8
अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल गिरकर करीब 80 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है, जिससे पेट्रोल-डीजल सस्ता होने की उम्मीद जगी है। लेकिन टैक्स ढांचे और सरकारी फैसलों के चलते आम जनता तक इस गिरावट का फायदा पहुंचना उतना आसान नहीं है।

अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चे तेल की कीमतों में अचानक तेज गिरावट आई है और भाव 80 डॉलर प्रति बैरल के करीब पहुंच गया है। ऐसे में हर आम और खास व्यक्ति के मन में एक ही सवाल है कि क्या अब भारत में पेट्रोल और डीजल के दाम घटेंगे? अगर आने वाले दिनों में क्रूड और सस्ता हुआ, तो जनता को राहत कब और कितनी मिलेगी? आइए विस्तार से समझते हैं।

क्यों लुढ़की कच्चे तेल की कीमत

राहत की बात यह है कि अमेरिका और ईरान के बीच एक ऐतिहासिक समझौता हो गया है, और पिछले 3-4 महीनों से उबल रहा क्रूड ऑयल अब ठंडा पड़ने लगा है। डब्ल्यूटीआई क्रूड (WTI Crude) का भाव 5.02% की भारी गिरावट के साथ 80.62 डॉलर प्रति बैरल पर आ गया है। वहीं, ग्लोबल बेंचमार्क माने जाने वाला ब्रेंट क्रूड (Brent Crude) भी 4.57% की कमजोरी के साथ 83.34 डॉलर प्रति बैरल पर कारोबार कर रहा है।

माना जा रहा है कि इस डील के बाद दुनिया का सबसे संवेदनशील तेल सप्लाई रूट होर्मुज स्ट्रेट (Strait of Hormuz) जल्द ही खुल जाएगा। यह मार्ग फरवरी से ईरान पर अमेरिका-इजरायल हमले के बाद से बंद पड़ा है। कच्चे तेल की कीमतें इस साल मई के मध्य में अपने उच्चतम स्तर पर पहुंच गई थीं, लेकिन पिछले कुछ हफ्तों से इस समझौते को लेकर चल रही चर्चाओं के कारण भाव में धीरे-धीरे नरमी आ रही थी।

रविवार रात अमेरिकी राष्ट्रपति डोनाल्ड ट्रंप ने सोशल मीडिया पर आधिकारिक तौर पर ऐलान किया कि ईरान के साथ यह डील पूरी तरह फाइनल हो चुकी है। उन्होंने लिखा कि शुक्रवार को समझौते पर हस्ताक्षर होते ही होर्मुज के रास्ते तेल की आपूर्ति फिर तेजी से शुरू हो जाएगी। ईरान के उप विदेश मंत्री काज़ेम गरीबाबादी ने भी पुष्टि की है कि दोनों देशों के बीच मेमोरेंडम ऑफ अंडरस्टैंडिंग (MoU) के मसौदे को अंतिम रूप दे दिया गया है और शुक्रवार को स्विट्जरलैंड में एक समारोह में इस पर हस्ताक्षर होंगे।

मई में कितना महंगा हुआ था पेट्रोल-डीजल

यह समझने से पहले कि अब दाम घटेंगे या नहीं, यह जान लेना जरूरी है कि मई में भारत में पेट्रोल-डीजल कितना महंगा हुआ था। सरकार ने 15 मई 2026 को बड़ी बढ़ोतरी की और पेट्रोल तथा डीजल दोनों पर 3 रुपये की वृद्धि कर दी। इस दिन दिल्ली में पेट्रोल 94.77 रुपये से बढ़कर 97.77 रुपये प्रति लीटर हो गया, जबकि डीजल 87.67 रुपये से बढ़कर 90.67 रुपये प्रति लीटर पहुंच गया।

इसके बाद 19 मई को फिर बढ़ोतरी हुई, जब पेट्रोल पर 0.87 से 0.90 रुपये प्रति लीटर और डीजल पर 0.91 रुपये प्रति लीटर की वृद्धि हुई। 23 मई को भी पेट्रोल में 0.87 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 0.91 रुपये प्रति लीटर का उछाल आया, जिससे दिल्ली में पेट्रोल 99.51 रुपये और डीजल 92.49 रुपये प्रति लीटर पर बिका। इसके बाद 25 मई 2026 को पेट्रोल में 2.61 रुपये प्रति लीटर और डीजल में 2.71 रुपये प्रति लीटर का इजाफा हुआ, और पेट्रोल पहली बार 100 रुपये के पार पहुंच गया।

थ्योरी कहती है कि सस्ता होना चाहिए

अब सबसे बड़ा सवाल यह है कि क्रूड में आई इस गिरावट का आपके पेट्रोल-डीजल के बिल पर क्या असर पड़ेगा। दरअसल, भारत अपनी जरूरत का करीब 85% से अधिक कच्चा तेल विदेशों से आयात करता है। देश में रोज सुबह 6 बजे पेट्रोल और डीजल की नई कीमतें तय की जाती हैं और इसके पीछे एक पूरा गणित होता है।

इन कीमतों को तय करने के मुख्य आधार ये हैं:

  • अंतरराष्ट्रीय क्रूड (इंडियन बास्केट) का पिछले कुछ दिनों का ट्रेलिंग एवरेज भाव
  • डॉलर के मुकाबले रुपये का एक्सचेंज रेट
  • तेल कंपनियों का रिफाइनिंग मार्जिन यानी कच्चे तेल को साफ करने का खर्च
  • केंद्र सरकार की एक्साइज ड्यूटी
  • राज्यों का वैट (VAT), जो हर राज्य में अलग होता है
  • आखिर में पेट्रोल पंप डीलर का कमीशन

पुराने आंकड़ों और विशेषज्ञों की थ्योरी के मुताबिक, कच्चे तेल में हर 1 डॉलर प्रति बैरल की गिरावट होने पर भारत में पेट्रोल और डीजल के दामों में करीब 50 से 55 पैसे प्रति लीटर की कटौती की गुंजाइश बनती है। इस हिसाब से क्रूड के 80 डॉलर तक आने पर कीमतों में अच्छी-खासी कटौती की पूरी संभावना दिखती है।

व्यवहार में इतना आसान नहीं

गणित भले ही कटौती की ओर इशारा करता हो, लेकिन हकीकत में ऐसा होना सीधा-सरल नहीं है। इसकी पहली वजह यह है कि भारत की सरकारी तेल कंपनियां, जैसे इंडियन ऑयल, बीपीसीएल और एचपीसीएल, कभी भी कीमतों को रियल-टाइम क्रूड के उतार-चढ़ाव से नहीं जोड़तीं। ऐसा कभी नहीं होता कि आज वैश्विक बाजार में क्रूड गिरे और कल सुबह आपको सस्ता पेट्रोल मिल जाए।

कंपनियों का पुराना ट्रैक रिकॉर्ड बताता है कि जब भी क्रूड गिरता है, तो वे पहले अपना नुकसान (अंडर-रिकवरी) और मार्जिन सुधारती हैं। इस बार भी वे कुछ हफ्तों या महीनों तक यह देखना चाहेंगी कि क्रूड लगातार 75-80 डॉलर के नीचे टिका रहता है या नहीं। अगर भाव लंबे समय तक नीचे बना रहे, तभी कंपनियों पर इसका फायदा उपभोक्ताओं तक पहुंचाने का दबाव बनेगा।

एक्साइज ड्यूटी और वैट करते हैं असली खेल

इस पूरे खेल में सबसे बड़ा और निर्णायक फैक्टर एक्साइज ड्यूटी और वैट के रूप में लगने वाला भारी-भरकम टैक्स है। सरकार चाहे तो अपनी एक्साइज ड्यूटी घटाकर तुरंत जनता को राहत दे सकती है, जैसा हाल ही में कुछ एक्सपोर्ट ड्यूटीज में बदलाव करके देखा गया था। लेकिन सरकारें अपनी राजकोषीय जरूरतों और बजट बैलेंस को बनाए रखने के लिए अक्सर ऐसा करने से बचती हैं।

कई बार देखा गया है कि जब क्रूड के दाम गिरते हैं, तो उसका फायदा ग्राहकों को देने के बजाय सरकार या कंपनियां खुद रख लेती हैं, या सरकार टैक्स बढ़ाकर उस मुनाफे को सीधे खजाने में ट्रांसफर कर देती है। नतीजा यह होता है कि आम आदमी को पंप पर वही पुरानी कीमत चुकानी पड़ती है और उसे पता ही नहीं चलता कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में कच्चा तेल कितना सस्ता हो चुका है।

2020 के लॉकडाउन से समझें पूरा सच

इस सच्चाई को समझने के लिए 2020 के कोरोना लॉकडाउन से बेहतर कोई उदाहरण नहीं है। मार्च 2020 में जब पूरी दुनिया थम गई थी, तब कच्चे तेल के बाजार में ऐतिहासिक क्रैश आया। ब्रेंट क्रूड एक ही दिन में करीब 21% टूटकर 35 डॉलर प्रति बैरल के आसपास आ गया, और भारत जो इंडियन बास्केट के तहत क्रूड खरीदता है, उसकी कीमत घटकर 48 डॉलर प्रति बैरल तक पहुंच गई।

अगर उसी पुराने फॉर्मूले यानी 1 डॉलर की गिरावट पर 50-55 पैसे की कटौती को लागू किया जाता, तो उस समय देश में पेट्रोल और डीजल के दामों में 15 से 17 रुपये प्रति लीटर तक की भारी कटौती होनी चाहिए थी। लेकिन ऐसा नहीं हुआ। उल्टे सरकार ने थ्योरी के बिल्कुल विपरीत काम किया। सस्ते क्रूड का लाभ जनता को देने के बजाय केंद्र सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर एक्साइज ड्यूटी में भारी बढ़ोतरी कर दी।

मार्च 2020 में ही सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर 3 रुपये प्रति लीटर टैक्स बढ़ाया, और फिर मई 2020 में रिकॉर्ड तोड़ बढ़ोतरी करते हुए पेट्रोल पर लगभग 10 रुपये और डीजल पर लगभग 13 रुपये प्रति लीटर का अतिरिक्त टैक्स लगा दिया। इसका नतीजा यह रहा कि अंतरराष्ट्रीय बाजार में क्रूड भले ही इतिहास के सबसे निचले स्तर (20 से 30 डॉलर प्रति बैरल) पर था, लेकिन भारत के पेट्रोल पंपों पर कीमतें कम नहीं हुईं।

सरकार ने क्यों नहीं घटने दिए दाम

2020 में लॉकडाउन के कारण देश में आर्थिक गतिविधियां पूरी तरह ठप हो गई थीं, जिससे सरकार के राजस्व का मुख्य स्रोत यानी जीएसटी कलेक्शन और अन्य टैक्स डूब रहे थे। ऐसे आर्थिक संकट के समय पेट्रोल और डीजल पर लगने वाली एक्साइज ड्यूटी सरकार के लिए सबसे आसान, सुरक्षित और तुरंत नकदी देने वाला जरिया साबित होती है, क्योंकि इसे बदलने के लिए संसद जाने की जरूरत नहीं होती। सरकार सिर्फ एक नोटिफिकेशन जारी करके इसे एक रात में बढ़ा सकती है। यही वजह रही कि पेट्रोल पंप पर आम लोगों के लिए कीमतें ज्यों की त्यों बनी रहीं।

समझने वाली बात यह है कि कच्चे तेल की अंतरराष्ट्रीय कीमत सिर्फ पेट्रोल-डीजल के कच्चे माल की कीमत तय करती है। लेकिन जब यह तेल रिफाइन होकर आपके शहर के पंप तक पहुंचता है, तो उसकी रिटेल प्राइस का एक बड़ा हिस्सा, अक्सर 45 से 55 प्रतिशत तक, टैक्स होता है। यह टैक्स ढांचा पूरी तरह सरकार के फैसलों और उसकी राजनीतिक इच्छाशक्ति पर निर्भर करता है, न कि इस पर कि वैश्विक बाजार में क्रूड का भाव क्या चल रहा है।

अब क्या होगा

इसलिए आज भले ही क्रूड ऑयल गिरकर 80 डॉलर पर आ गया है और आगे और सस्ता होने की उम्मीद जताई जा रही है, जिससे कीमतों में कटौती का एक संभावित स्कोप जरूर बन गया है, लेकिन यह स्कोप वास्तव में पंप पर कम कीमत के रूप में दिखेगा या किसी नए टैक्स या ड्यूटी बढ़ोतरी के जरिए सोख लिया जाएगा, यह पूरी तरह एक राजनीतिक और राजकोषीय फैसला होगा।

आम तौर पर तेल बाजार में एक अघोषित नियम चलता है—जब क्रूड महंगा होता है तो सरकार अपनी ड्यूटी थोड़ी घटा देती है, ताकि देश में महंगाई का हाहाकार न मचे, और जब क्रूड सस्ता होता है तो सरकार टैक्स बढ़ाकर अपना खजाना भर लेती है, ताकि राजस्व बना रहे और कीमतें स्थिर दिखें। इसी चक्र के कारण अंतरराष्ट्रीय बाजार में चाहे जितनी उथल-पुथल मचे, भारत के आम आदमी को इसका सीधा असर बहुत कम या बहुत देरी से ही महसूस होता है।

चेतन शुक्ला
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चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

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