गया के पत्थरकट्टी गांव में बनती हैं 100 रुपये से 20 लाख तक की मूर्तियां, काले पत्थर ने दिलाई वैश्विक पहचान बिहार 3 दिन पहले 8
बिहार के गया जिले के पत्थरकट्टी गांव में अहिल्याबाई होल्कर के दौर से काले पत्थर की मूर्तिकला फल-फूल रही है। यहां आज भी 3000 से अधिक मूर्तिकार हैं और 100 रुपये से लेकर 20 लाख रुपये तक की मूर्तियां तैयार की जाती हैं।

बिहार के गया जिले में बसे पत्थरकट्टी गांव की मूर्ति कला का इतिहास करीब 300 वर्ष पुराना है। विश्व प्रसिद्ध विष्णुपद मंदिर के निर्माण के लिए इंदौर की महारानी अहिल्याबाई होल्कर ने लगभग 1787 ईस्वी के आसपास राजस्थान से करीब 300 शिल्पकारों को यहां लाकर बसाया था। माना जाता है कि इस गांव की पहाड़ी में मौजूद काला पत्थर दुनिया के सबसे बेहतरीन काले पत्थरों में से एक है, और विष्णुपद मंदिर का निर्माण भी इसी गांव के काले पत्थर से हुआ है।

अब बचे हैं सिर्फ तीन परिवार

विष्णुपद मंदिर का पूरा ढांचा इसी गांव में तैयार किया गया था, जिसे बाद में लाकर मंदिर में स्थापित किया गया। मंदिर बन जाने के बाद राजस्थान से आए करीब 200 शिल्पकार अपने शहर लौट गए, जबकि कुछ शिल्पकार पत्थरकट्टी गांव में ही रुक गए। समय बीतने के साथ इनमें से भी कई लोग गांव छोड़कर शहरों में जा बसे और कुछ परिवार महामारी की वजह से समाप्त हो गए। फिलहाल इस गांव में राजस्थान के गौड़ परिवार से जुड़े तीन लोग बसे हुए हैं, जिनका मुख्य पेशा पत्थर की मूर्तियां बनाना है।

3000 से अधिक मूर्तिकार

इन तीन परिवारों की कारीगरी देखकर आसपास के गांवों के लोगों ने भी यह कला सीख ली। आज गया जिले के पत्थरकट्टी और खुखड़ी समेत आसपास के कई गांवों में 3000 से अधिक मूर्ति कलाकार मौजूद हैं। इन सभी कलाकारों का नाता किसी न किसी रूप में इसी पत्थरकट्टी गांव से जुड़ा है। इन्होंने यहीं से यह हुनर सीखा और आज इस इलाके के सैकड़ों कलाकार देश-विदेश में अपनी अलग पहचान बना रहे हैं। गांव के कई लोगों को मूर्ति कला के लिए राज्य स्तरीय पुरस्कार भी मिल चुका है।

बंटा हुआ है पुरुषों और महिलाओं का काम

गांव के लोग बताते हैं कि जब राजस्थान से शिल्पकार यहां पहुंचे थे, तब आसपास के कुछ लोगों ने यह हुनर सीखा था, हालांकि उस समय आसपास रहने वालों की संख्या काफी कम थी। लेकिन आज यहां 3000 से अधिक लोग मूर्ति कला से जुड़े हुए हैं। पत्थरकट्टी और खुखड़ी जैसे गांवों के लगभग हर घर में यह काम होता है और परिवार का हर सदस्य इससे जुड़ा रहता है। पुरुष पत्थरों को तराशकर मूर्तियां गढ़ते हैं, जबकि महिलाएं तैयार मूर्तियों को घिसकर उन्हें चिकना और आकर्षक बनाती हैं।

ढाका तक जाती थी यहां की बनी खल

गौड़ परिवार के सुरेश लाल गौड़ और रविंद्र नाथ गौड़ बताते हैं कि उनके पूर्वज राजस्थान से यहां आए थे। शुरुआती दौर में सिर्फ मूर्तियां बनती थीं, लेकिन बाद में पत्थर से थाली, गिलास, कटोरा और सुराही जैसी चीजें भी बनने लगीं। इसके साथ ही औषधि कूटने वाली खल भी तैयार की जाती थी। जब बांग्लादेश भारत का हिस्सा हुआ करता था, तब यहां बनी खल ढाका तक भेजी जाती थी, जिसमें दवाइयों की पिसाई होती थी। आज भी बड़े-बड़े औषधालयों में यहां बने पात्रों की मांग बनी हुई है।

100 रुपये से 20 लाख तक की मूर्ति

कारीगरों का कहना है कि काले पत्थर से बनी मूर्तियों को सबसे उम्दा गुणवत्ता का माना जाता है और पूरी दुनिया में सबसे बढ़िया काला पत्थर पत्थरकट्टी गांव में ही पाया जाता है। यही वजह है कि काले पत्थर की मूर्तियों और अन्य सामग्रियों की मांग सबसे अधिक रहती है और इनकी कीमत भी दूसरे पत्थरों के मुकाबले ज्यादा मिलती है। यहां 100 रुपये से लेकर 20 लाख रुपये तक की मूर्तियां तैयार की जाती हैं। ऑर्डर मिलने पर बड़े नेताओं की आदमकद प्रतिमाएं भी यहां बनाई जाती हैं।

चेतन शुक्ला
Official Verified Account

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!