प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के दौर में भी जीवंत है करौली के हटवारा बाजार की लकड़ी कारीगरी राजस्थान एक महीने पहले 19
करौली का हटवारा बाजार आज भी पारंपरिक लकड़ी के खिलौनों और घरेलू वस्तुओं की पहचान बनाए हुए है, जो 10 से 20 परिवारों की आजीविका का सहारा हैं। महंगाई के बावजूद यहां 20 से 100 रुपये तक के हस्तनिर्मित खिलौने उपलब्ध हैं।

प्लास्टिक और इलेक्ट्रॉनिक खिलौनों के बढ़ते प्रचलन के बीच भी करौली का हटवारा बाजार अपनी पुरानी पहचान को संजोकर रखे हुए है। यहां लकड़ी से तैयार खिलौने और रोजमर्रा के काम आने वाली घरेलू वस्तुएं आज भी लोगों को अपनी ओर खींचती हैं। खास बात यह है कि इसी हुनर के सहारे आज भी करीब 10 से 20 परिवारों का जीवनयापन हो रहा है।

बाजार की गलियों में पैर रखते ही लकड़ी की भीनी खुशबू और हाथों की महीन कारीगरी राहगीरों का ध्यान अपनी ओर आकर्षित कर लेती है। यहां बनने वाले खिलौने केवल बच्चों के मनोरंजन तक सीमित नहीं हैं, बल्कि करौली की सांस्कृतिक धरोहर का अहम हिस्सा माने जाते हैं। बाहर से आने वाले पर्यटक और विदेशी सैलानी भी इन हस्तनिर्मित वस्तुओं को निशानी के तौर पर अपने साथ ले जाते हैं।

लकड़ी का वह कमल, जिसे बनाने की कला अब लुप्त

कारीगर अमीरुद्दीन खान बताते हैं कि उनके पिता और दादा लकड़ी से खास तरह के कमल और गुलाब के फूल बनाया करते थे। उनका दावा है कि ऐसा कमल देश में और कहीं तैयार नहीं होता था। समय बीतने के साथ यह कला धीरे-धीरे खत्म होती चली गई और नई पीढ़ी इस बारीक काम को पूरी तरह नहीं सीख पाई।

उन्होंने बताया कि उनके परिवार ने लकड़ी के खिलौने और दूसरा सामान बनाना तो सीख लिया, लेकिन उस विशेष कमल को गढ़ने की तकनीक इतनी पेचीदा थी कि अब वह केवल यादों तक सिमटकर रह गई है।

बच्चों को चलना सिखाती तीन पहियों वाली गाड़ी

हटवारा बाजार में आज भी लकड़ी की तीन पहियों वाली पारंपरिक गाड़ी बनाई जाती है, जिसे स्थानीय लोग बच्चों की हाथ गाड़ी के नाम से जानते हैं। वर्षों से यह गाड़ी छोटे बच्चों को चलना सिखाने का जरिया रही है। करौली के कई घरों में बच्चे आज भी इसी गाड़ी का सहारा लेकर अपने पहले कदम बढ़ाते हैं।

शादी और देवउठनी ग्यारस से जुड़ा कारोबार

कारीगर घनश्याम शर्मा कहते हैं कि उनके परिवार में यह काम चार पीढ़ियों से चलता आ रहा है। बदलते समय, बढ़ती महंगाई और आधुनिक सजावटी सामान के चलते इस व्यवसाय की रौनक अब पहले जैसी नहीं रही। इसके बावजूद शादी-विवाह के मौसम में लकड़ी के तोरण, सूप और अन्य पारंपरिक वस्तुओं की अच्छी मांग बनी रहती है।

देवउठनी ग्यारस पर अंजनी माता मेले के लिए बच्चों की एक पहिए वाली गाड़ियों का बड़े स्तर पर निर्माण होता है। मेले के दौरान करीब 20 हजार गाड़ियों की बिक्री से कारीगरों को अच्छा रोजगार मिल जाता है।

20 से 100 रुपये तक में मिलते हैं खिलौने

हटवारा बाजार में लकड़ी के सामान की करीब सात से आठ दुकानें चल रही हैं। यहां बेलन, चकला, हुक्के का नेचा, शतरंज के मोहरे, चौपड़ की गोटियां, फिरकिनी, सिंगारदानी, तोरण, बच्चों की गाड़ियां और पशुओं के काम आने वाली कई पारंपरिक वस्तुएं तैयार की जाती हैं।

सबसे अहम बात यह है कि महंगाई के इस दौर में भी यहां लकड़ी के कई खिलौने महज 20 रुपये से 100 रुपये तक की कीमत में मिल जाते हैं। यही वजह है कि करौली का यह बाजार आज भी अपनी पारंपरिक कारीगरी और सादगी के लिए पहचाना जाता है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

आपकी प्रतिक्रिया?

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!

फेसबुक वार्तालाप