मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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विचारों
दृष्टिबाधित होने के बावजूद शिक्षा की नई राह
अक्सर लोग छोटी-छोटी परेशानियों से हार मान लेते हैं, लेकिन मध्य प्रदेश के खंडवा में रहने वाले एक शिक्षक दंपती की कहानी उन सभी के लिए प्रेरणा है। नंदराम आवचे और उनकी पत्नी शकुंतला आवचे ने यह साबित कर दिया है कि यदि व्यक्ति का हौसला बुलंद हो और इरादे मजबूत हों, तो कोई भी शारीरिक बाधा शिक्षा की राह में रोड़ा नहीं बन सकती। दोनों पति-पत्नी जन्म से ही दुनिया को अपनी आंखों से देखने में अक्षम हैं, लेकिन इसके बावजूद वे पिछले कई वर्षों से न केवल अपना परिवार संभाल रहे हैं, बल्कि सैंकड़ों बच्चों के भविष्य को संवारने का नेक काम भी कर रहे हैं।
नंदराम की 33 साल लंबी सेवा
नंदराम आवचे के शिक्षण करियर को 33 साल पूरे हो चुके हैं। उन्होंने अपनी परिस्थितियों को कभी अपनी कमजोरी नहीं बनने दिया। नंदराम ने इतिहास विषय में एमए किया है। उनकी सरकारी सेवा की शुरुआत 2 सितंबर 1993 को हुई थी। उन्होंने अपनी पहली नियुक्ति शासकीय मोतीलाल नेहरू उच्चतर माध्यमिक विद्यालय, खंडवा से प्राप्त की थी। इसके बाद 10 अक्टूबर 1994 से वे लगातार शासकीय हाई स्कूल पदम नगर में अपनी सेवाएं दे रहे हैं। नंदराम वर्तमान में कक्षा छठवीं और सातवीं के विद्यार्थियों को हिंदी और सामाजिक विज्ञान जैसे विषय पढ़ाते हैं। उनका पढ़ाने का तरीका इतना प्रभावी है कि वे छात्रों से लगातार संवाद करते हैं, उनसे प्रश्न पूछते हैं और पूरी तन्मयता के साथ पाठ को समझाते हैं।
पत्नी शकुंतला का संघर्ष और समर्पण
नंदराम की पत्नी शकुंतला आवचे ने भी अपने जीवन में किसी भी चुनौती के आगे हार नहीं मानी। उन्होंने अपनी पढ़ाई पूरी की और खुद को शिक्षिका के रूप में स्थापित किया। वे पिछले 17 वर्षों से प्राथमिक विद्यालय के नन्हे-मुन्नों को शिक्षा की राह दिखा रही हैं। शकुंतला खंडवा के रजूर प्राथमिक स्कूल में बच्चों को पढ़ाती हैं। वे और उनके पति अलग-अलग विद्यालयों में अपनी जिम्मेदारियों का निर्वहन करते हैं, लेकिन घर लौटने पर वे एक-दूसरे का संबल बनते हैं। उनका भरा-पूरा परिवार है जिसमें दो बेटे, बहुएं और नाती-पोते शामिल हैं। वे अपनी नौकरी और घर के हर उत्तरदायित्व को बखूबी निभा रहे हैं।
ब्रेल लिपि का सहारा और अनूठा शिक्षण
नंदराम के पढ़ाने की पद्धति में जो सबसे प्रमुख बात है, वह है उनकी सीखने और सिखाने की तकनीक। जहां सामान्य शिक्षक और छात्र देवनागरी लिपि का उपयोग करते हैं, वहीं नंदराम ब्रेल लिपि के माध्यम से अपनी पूरी तैयारी करते हैं। वे ब्रेल में छपी किताबों से पाठ्यक्रम को समझते हैं और अपनी ज्ञान की गहराई से उसे छात्रों तक पहुंचाते हैं। छात्र भी उन्हें केवल एक शिक्षक के रूप में नहीं, बल्कि जीवन की चुनौतियों से लड़कर आगे बढ़ने वाले एक आदर्श के रूप में देखते हैं। वे विद्यार्थियों के लिए प्रेरणा के प्रतीक हैं।
सकारात्मकता का संदेश
अपनी कार्यशैली और संघर्ष के बारे में बात करते हुए नंदराम कहते हैं कि जीवन में कभी भी हार नहीं माननी चाहिए। उनका मानना है कि संघर्ष के बाद ही सफलता का मार्ग प्रशस्त होता है। यही सीख वे अपने विद्यार्थियों को भी देते हैं। उन्होंने खुद अपनी जिंदगी के माध्यम से यह संदेश दिया है कि शिक्षक बनने के लिए आंखों का होना उतना जरूरी नहीं है, जितना कि बच्चों के भविष्य के प्रति संवेदनशीलता और उन्हें सही दिशा देने का जज्बा।
शिक्षा की रोशनी का कारवां
नंदराम और शकुंतला की कहानी केवल एक नौकरी करने वाले दंपती की नहीं है, बल्कि यह उस साहस की कहानी है जिसने मुश्किलों को अपने कदमों के नीचे दबा दिया। 33 वर्षों का सफर आसान नहीं रहा होगा, लेकिन उन्होंने अपने काम के प्रति ईमानदारी बनाए रखी। उन्होंने न जाने कितने ही बच्चों को शिक्षा की रोशनी से जोड़कर उन्हें समाज की मुख्यधारा का हिस्सा बनाया है। उनका यह सफर निरंतर जारी है, जो आने वाली पीढ़ियों के लिए एक मिसाल बना रहेगा।
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