G7 में भारत को बार-बार न्योता, पर चीन को दूरी पर क्यों रखा जाता है? भारत 4 घंटे पहले 7
वर्ष 2026 का 52वां G7 शिखर सम्मेलन फ्रांस के एवियन-ले-बैंस में 15 से 17 जून तक आयोजित हुआ, जिसमें भारत को 2003 के बाद 11वीं बार अतिथि देश के रूप में बुलाया गया। दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बावजूद चीन को इस मंच से दूर क्यों रखा जाता है, जानिए इसके पीछे की वजहें।

दुनिया के सात सबसे समृद्ध देशों के समूह यानी G7 को लेकर एक सवाल बार-बार उठता है — पिछले कुछ वर्षों से भारत को लगातार आमंत्रित अतिथि के रूप में इसमें शामिल किया जा रहा है, जबकि दुनिया की दूसरी आर्थिक महाशक्ति बन चुके चीन को नहीं। आखिर इसकी वजह क्या है? चीन का मामला G7 के सबसे दिलचस्प और राजनीतिक रूप से संवेदनशील विषयों में से एक माना जाता है।

वर्ष 2026 का 52वां G7 शिखर सम्मेलन फ्रांस के एवियन-ले-बैंस शहर में हुआ। यह आयोजन 15 से 17 जून तक चला। भारत को वर्ष 2003 के बाद से 11वीं बार आमंत्रित देश के तौर पर इसमें बुलाया गया है। बताया जाता है कि फ्रांस चाहता था कि चीन को भी न्योता दिया जाए, पर ऐसा नहीं हो सका।

चीन के साथ क्या स्थिति रही है

चीन G7 का सदस्य नहीं है। उसे अतिथि के रूप में सबसे पहले 2009 में बुलाया गया था। खबरें रही हैं कि इस वर्ष फ्रांस उसे अतिथि देश के रूप में आमंत्रित करना चाहता था, लेकिन जापान के विरोध के कारण ऐसा संभव नहीं हो पाया।

चीन को G7 में न बुलाए जाने को कुछ विश्लेषक “बिना ब्राज़ील के विश्व कप” या “बिना चैंपियन टीम के विश्व कप” जैसा बताते हैं। वहीं चीनी सरकारी मीडिया इसे “नेतृत्व का भ्रम” कहकर आलोचना करता है और यह आरोप लगाता है कि यह समूह अपनी समस्याओं के लिए चीन को जिम्मेदार ठहराने की कोशिश करता है।

इस बार फ्रांस में हुई G7 बैठक में भारत, ब्राजील, दक्षिण कोरिया और केन्या जैसे देशों को आमंत्रित किया गया। भारत 2003 से अब तक 11 बार G7 के आउटरीच सेशंस में हिस्सा ले चुका है और उसे 2019 से हर साल बुलाया जाता रहा है।

अतिथि देशों को बुलाने का अधिकार किसके पास

G7 में अतिथि देशों को आमंत्रित करने की जिम्मेदारी पूरी तरह उस वर्ष के मेज़बान देश के पास होती है। जिस देश के पास उस साल अध्यक्षता होती है, वही एजेंडा तय करता है, बैठक का आयोजन करता है और यह भी निर्धारित करता है कि किन गैर-G7 देशों को न्योता भेजा जाएगा।

G7 की शुरुआत 1975 में हुई थी। उस समय यह समूह दुनिया की प्रमुख औद्योगिक लोकतांत्रिक अर्थव्यवस्थाओं का एक अनौपचारिक मंच था। फ्रांस, पश्चिमी जर्मनी, इटली, जापान, ब्रिटेन, कनाडा और अमेरिका इसके संस्थापक सदस्य थे। उस दौर में चीन न तो कोई बड़ी बाजार अर्थव्यवस्था था और न ही वैश्विक वित्तीय व्यवस्था में उसकी कोई प्रमुख भूमिका थी।

चीन को बाहर रखने की असल वजह

दुनिया की दूसरी सबसे बड़ी अर्थव्यवस्था होने के बाद भी चीन G7 का हिस्सा नहीं है। इसके पीछे मुख्य कारण यह है कि G7 केवल एक आर्थिक समूह नहीं, बल्कि समान राजनीतिक और रणनीतिक मूल्यों वाले विकसित लोकतांत्रिक देशों का संगठन भी है।

इसके अधिकांश सदस्य उदार लोकतंत्र हैं, बहुदलीय राजनीतिक व्यवस्था रखते हैं और मानवाधिकार, कानून के शासन तथा खुली अर्थव्यवस्था जैसे सिद्धांतों पर जोर देते हैं। चीन की राजनीतिक व्यवस्था इससे भिन्न है, इसलिए उसे G7 के स्वाभाविक विस्तार के रूप में नहीं देखा जाता।

2010 के दशक तक G7 और चीन के संबंध अपेक्षाकृत सहयोगात्मक थे। लेकिन अब व्यापारिक प्रतिस्पर्धा, तकनीकी होड़, दक्षिण चीन सागर, ताइवान, सेमीकंडक्टर आपूर्ति श्रृंखला और राष्ट्रीय सुरक्षा जैसे मुद्दों पर तनाव लगातार बढ़ा है।

क्या बैठकों में चीन की चर्चा होती है

दिलचस्प बात यह है कि चीन बैठक में मौजूद नहीं होता, फिर भी कई बार चर्चा का बड़ा हिस्सा उसी पर केंद्रित रहता है। यही वजह है कि कई विश्लेषक मज़ाक में कहते हैं, “G7 की मेज़ पर एक खाली कुर्सी हमेशा चीन की होती है।” यानी मौजूद न होते हुए भी चीन एजेंडे पर छाया रहता है।

भारत को न्योता क्यों मिलता है

भारत को बार-बार बुलाए जाने के पीछे कई कारण हैं:

  • भारत एक लोकतांत्रिक व्यवस्था वाला देश है।
  • इंडो-पैसिफिक रणनीति में वह एक महत्वपूर्ण साझेदार है।
  • पश्चिमी देशों के साथ उसका सहयोग लगातार बढ़ रहा है।
  • एशियाई क्षेत्र में भारत एक मजबूत और विश्वसनीय शक्ति के रूप में उभरा है।

यही वजह है कि चीन के मुकाबले एक मजबूत लोकतांत्रिक विकल्प पेश करने के लिए G7 भारत को मंच पर अग्रिम पंक्ति में रखता है। इसके अलावा भारत खुद को ‘ग्लोबल साउथ’ की एक सशक्त आवाज के रूप में प्रस्तुत करता है, जिससे G7 के लिए उसकी उपयोगिता और बढ़ जाती है।

क्या चीन कभी सदस्य बन सकता है

व्यावहारिक रूप से इसकी संभावना न के बराबर मानी जाती है। चीन G7 का सदस्य इसलिए नहीं बन सकता क्योंकि यह समूह खुद को “दुनिया की सबसे बड़ी अर्थव्यवस्थाओं का क्लब” नहीं, बल्कि “समान राजनीतिक मूल्यों वाले विकसित लोकतांत्रिक देशों का क्लब” मानता है। जब तक यह पहचान कायम रहेगी, चीन की सदस्यता की संभावना बेहद कम बनी रहेगी।

कई विश्लेषकों का मानना है कि बीजिंग खुद भी G7 को अक्सर अमीर पश्चिमी देशों का क्लब मानता है। उसे G20, BRICS या अन्य व्यापक मंच ज्यादा अहम लगते हैं। वहीं यह भी दिलचस्प है कि फ्रांसीसी राष्ट्रपति मैक्रों की सोच बाकी G7 नेताओं से कुछ अलग रही है। वे अक्सर कहते रहे हैं कि चीन जैसी बड़ी शक्ति के साथ संवाद बनाए रखना चाहिए और G7 को केवल “एंटी-चाइना क्लब” नहीं बनना चाहिए।

अतिथि देश क्या कर सकते हैं और क्या नहीं

G7 के पूर्ण सदस्य देश कनाडा, जर्मनी, जापान, फ्रांस, ब्रिटेन, अमेरिका और यूरोपीयन यूनियन हैं। यही देश अंतिम घोषणापत्र तैयार करते हैं, एजेंडा तय करते हैं और सामूहिक निर्णय लेते हैं। अतिथि देश चर्चा में भाग जरूर लेते हैं, लेकिन वे G7 के आधिकारिक निर्णयों का हिस्सा नहीं होते।

G7 शिखर सम्मेलन में आमतौर पर तीन तरह की बैठकें होती हैं। एक बैठक केवल सदस्यों की होती है, जिसमें अतिथि देश शामिल नहीं हो सकते। आउटरीच सेशंस में अतिथि देशों की मुख्य भूमिका होती है। वहीं विशेष विषयगत बैठकों में कई बार सदस्य और अतिथि देश एक साथ बैठते हैं।

सदस्य देशों को सभी ड्राफ्ट दस्तावेज़, वार्ता-पत्र और घोषणापत्र के मसौदे मिलते हैं, जबकि अतिथि देशों को केवल उन्हीं बैठकों से जुड़े दस्तावेज़ दिए जाते हैं जिनमें वे शामिल होते हैं।

चेतन शुक्ला
Official Verified Account

चेतन शुक्ला (Chetan Shukla) Print & Broadcast News Agency (PABNA) में 'मुख्य संपादक' हैं। वह पत्रकारिता में 15 वर्ष से ज्यादा का अनुभव रखते हैं। ये मूल रूप से उत्तर प्रदेश के रहने वाले हैं। इन्हें राजनीति और आम आदमी से जुड़ी खबरें लिखना पसंद है।

आपकी प्रतिक्रिया?


आपको यह भी पसंद आ सकता हैं

Comments

https://pabna.in/assets/images/user-avatar-s.jpg

0 comment

Write the first comment for this!