होर्मुज जलडमरूमध्य का संकट: वैश्विक उथल-पुथल के बीच भारत ने कैसे सुरक्षित रखा अपना तेल भंडार और अर्थव्यवस्था? व्यापार एक महीने पहले 61
पश्चिमी एशिया में उत्पन्न तनाव के कारण होर्मुज जलडमरूमध्य के प्रभावित होने के बाद भी भारत में ईंधन की कोई कमी नहीं हुई, जिसका श्रेय सरकार की सोची-समझी रणनीतियों और विभिन्न स्रोतों से तेल आयात को जाता है।

ऊर्जा सुरक्षा की चुनौती और भारत की तैयारी

पश्चिम एशिया में मचे बवाल और होर्मुज जलडमरूमध्य के मार्ग पर मंडराते संकट ने पूरी दुनिया की ऊर्जा सुरक्षा के सामने एक गंभीर प्रश्न खड़ा कर दिया था। अंतरराष्ट्रीय स्तर पर पेट्रोल, डीजल और गैस की कीमतों में आग लग गई थी, जिसके कारण कई राष्ट्रों को भयावह स्थिति का सामना करना पड़ा। गौरतलब है कि भारत अपनी जरूरत का करीब 85% कच्चा तेल आयात के जरिए हासिल करता है, लेकिन इसके बावजूद भारत इस बड़े वैश्विक संकट के दौरान न केवल ईंधन की भारी किल्लत से बचा रहा, बल्कि घरेलू बाजार में कीमतों को भी नियंत्रित रखा। पेट्रोलियम मंत्रालय में संयुक्त सचिव रहे सुंजय सुधीर ने इस स्थिति को संभालने के पीछे की व्यापक सरकारी कार्ययोजना का खुलासा किया है।

होर्मुज की निर्भरता और रणनीतिक लचीलापन

सुंजय सुधीर द्वारा साझा किए गए आंकड़ों के मुताबिक भारत अपनी कुल एलपीजी मांग का करीब 90%, एलएनजी का 60% और कच्चे तेल का लगभग 40% हिस्सा मध्य पूर्व और होर्मुज जलडमरूमध्य के रास्ते ही आयात करता है। यदि यह मार्ग पूरी तरह बाधित हो जाता, तो भारत की अर्थव्यवस्था के लिए स्थितियां बेहद कठिन हो सकती थीं। हालांकि, सरकार ने समय रहते प्रशासनिक कदम उठाए और पहले से बनाई गई आपूर्ति श्रृंखला का लाभ उठाया। बीते कुछ वर्षों में भारत ने अपनी तेल खरीद की रणनीति में बदलाव किया है और अलग-अलग देशों के साथ व्यापारिक समझौते किए, जिससे किसी एक विशिष्ट क्षेत्र पर निर्भरता कम हो गई है।

बुनियादी ढांचे का विस्तार और नए बाजार

भारत ने पिछले दो दशकों के भीतर तेल और गैस के लिए नए आपूर्तिकर्ताओं की तलाश पर जोर दिया। इसके अलावा, एलपीजी आयात टर्मिनलों की संख्या बढ़ाने, पाइपलाइन नेटवर्क को मजबूत करने और सिटी गैस वितरण प्रणाली का व्यापक विस्तार किया गया। घरेलू स्तर पर गैस के बढ़ते उपयोग ने ऊर्जा आपूर्ति पर पड़ रहे भारी दबाव को कम करने में मदद की। यही मुख्य कारण है कि वैश्विक स्तर पर मची अफरा-तफरी के बीच भारत में ईंधन की आपूर्ति अनवरत बनी रही और किसी भी स्तर पर आपातकालीन राशनिंग की आवश्यकता महसूस नहीं हुई।

वैश्विक महंगाई बनाम भारतीय स्थिति

संकट के दौर में जहां कई अन्य देशों में ईंधन की कीमतें 25% से 30% तक उछाल मार रही थीं, वहीं भारत में यह वृद्धि मात्र 7% तक सीमित रही। सुंजय सुधीर के अनुसार, सरकार ने सप्लाई और डिमांड दोनों मोर्चों पर एक साथ काम करते हुए संतुलन बिठाया। आम जनता को राहत पहुंचाने के लिए घरेलू उपभोक्ताओं को प्राथमिकता दी गई ताकि महंगाई का सीधा असर सामान्य जीवन पर कम पड़े।

आर्थिक बोझ का प्रबंधन

ईंधन के दाम स्थिर रखने की खातिर सरकार ने पेट्रोल और डीजल पर लगने वाले उत्पाद शुल्क यानी एक्साइज ड्यूटी में महत्वपूर्ण कटौती की। सरकारी तेल कंपनियों के स्तर पर स्थिति का अंदाजा इसी बात से लगाया जा सकता है कि उन्हें हर महीने लगभग 30,000 करोड़ रुपये की अंडर-रिकवरी झेलनी पड़ी। उस दौरान, सरकार को प्रति लीटर पेट्रोल पर करीब 24 रुपये और डीजल पर 30 रुपये तक का आर्थिक नुकसान उठाना पड़ा, ताकि अर्थव्यवस्था और महंगाई दर स्थिर बनी रहे।

निर्यात पर विशेष शुल्क का दांव

संकटकाल के दौरान सरकार ने पेट्रोल, डीजल और एविएशन टरबाइन फ्यूल यानी एटीएफ के निर्यात पर विशेष अतिरिक्त उत्पाद शुल्क लागू किया। इसके अंतर्गत पेट्रोल पर 4 रुपये प्रति लीटर, डीजल पर 8.5 रुपये प्रति लीटर और एटीएफ पर 7.5 रुपये प्रति लीटर का अतिरिक्त शुल्क तय किया गया। हालांकि, इस पूरे दौर में आम जनता के लिए घरेलू बाजार में बिकने वाले ईंधन की एक्साइज ड्यूटी में कोई बदलाव नहीं किया गया।

राजीव खन्ना पाबना के व्यापार संवाददाता हैं और कंपनियों, बाजार तथा अर्थव्यवस्था की खबरों को सरल भाषा में समझाते हैं। कारोबार जगत के बड़े फैसलों, नीतिगत बदलावों और उनके आम आदमी पर असर को वे गहराई से कवर करते हैं। उनका मकसद जटिल आर्थिक खबरों को हर पाठक के लिए आसान बनाना है।

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