क्या सुभाषचंद्र बोस के जीवित रहने पर भारत का विभाजन टाला जा सकता था? एक गहन विश्लेषण भारत 2 घंटे पहले 3
भारत के इतिहास में आज भी यह प्रश्न चर्चा का विषय है कि यदि नेताजी सुभाषचंद्र बोस आजादी के समय जीवित होते, तो क्या देश का बंटवारा रुक सकता था। एक पत्रकार की दृष्टि में उनकी धर्मनिरपेक्ष विचारधारा और नेतृत्व क्षमता कैसे राजनीतिक समीकरण बदल सकती थी, जानिए इस विस्तृत रिपोर्ट में।

इतिहास का वह बड़ा सवाल

भारत की स्वतंत्रता का इतिहास जब भी लिखा जाता है, तो एक प्रश्न अक्सर इतिहासकारों और आम लोगों के मन में कौंधता है कि क्या नेताजी सुभाषचंद्र बोस यदि 1947 के समय सक्रिय होते, तो भारत का विभाजन टल सकता था। यह सवाल आज भी भारतीय इतिहास के सबसे बड़े 'अगर' के रूप में मौजूद है। नेताजी की व्यापक लोकप्रियता और उनकी हिंदू, मुस्लिम तथा सिख एकता को प्राथमिकता देने वाली राजनीतिक सोच उस दौर की जटिल स्थितियों को पूरी तरह से बदलने की क्षमता रखती थी।

जिन्ना और विभाजन का एजेंडा

जब हम आज दिल्ली के एपीजे अब्दुल कलाम मार्ग से गुजरते हैं और मोहम्मद अली जिन्ना के 10 नंबर वाले बंगले को देखते हैं, तो अनायास ही यह विचार आता है कि नेताजी की अनुपस्थिति ने इतिहास को कितना बदला। हालांकि, यह भी सच है कि उनके जीवनकाल में ही अखिल भारतीय मुस्लिम लीग ने पाकिस्तान के निर्माण का आधिकारिक प्रस्ताव पारित कर दिया था। 23 मार्च 1940 को लाहौर के मिन्टो पार्क, जिसे अब इकबाल पार्क के नाम से जाना जाता है, में जिन्ना ने दो घंटे लंबा आक्रामक भाषण दिया था। उस भाषण में उन्होंने हिंदू और मुसलमान को दो अलग राष्ट्र घोषित करते हुए कहा था कि दोनों के नायक, परंपराएं और धर्म पूर्णतः भिन्न हैं, इसलिए वे साथ नहीं रह सकते। उन्होंने लाला लाजपत राय और चितरंजन दास जैसे महान नेताओं पर भी तीखी टिप्पणियां की थीं।

कांग्रेस की कोशिशें और जिन्ना की जिद

पाकिस्तानी लेखक फारूक अहमद डार अपनी कृति जिन्नाज़ पाकिस्तान: फॉर्मेशन एंड चैलेंजेज़ ऑफ़ अ स्टेट में बताते हैं कि मुस्लिम लीग के प्रस्ताव के बाद कांग्रेस ने हर संभव प्रयास किया कि देश न बंट पाए। जून 1940 में कांग्रेस अध्यक्ष के रूप में सुभाषचंद्र बोस ने जिन्ना को स्वतंत्र भारत का पहला प्रधानमंत्री बनाने का प्रस्ताव दिया था, बशर्ते वे विभाजन की अपनी मांग वापस ले लें। केवल यही नहीं, सी. राजगोपालाचारी ने भी मुस्लिम लीग को अपनी पसंद की कैबिनेट बनाने और प्रधानमंत्री पद सौंपने का विकल्प दिया था। यहां तक कि अप्रैल 1947 में महात्मा गांधी ने भी विभाजन न करने के बदले जिन्ना को सत्ता सौंपने की पेशकश की थी। हालांकि, जिन्ना का लक्ष्य पूरी तरह स्पष्ट था और वह किसी भी समझौते के लिए तैयार नहीं थे क्योंकि उन्हें अलग मुस्लिम राष्ट्र चाहिए था।

आजाद हिंद फौज और साम्प्रदायिक एकता

जब नेताजी को लगा कि जिन्ना अपने रुख से पीछे नहीं हटेंगे, तो उन्होंने देश छोड़कर अंग्रेजों से सीधे लड़ाई लड़ने का निर्णय लिया। जर्मनी से जापान तक की उनकी यात्रा एक लंबी पनडुब्बी यात्रा के समान थी। इसके बाद उन्होंने आजाद हिंद फौज का गठन किया, जो साम्प्रदायिक सद्भाव की सबसे बड़ी मिसाल बनी। उनकी सेना में मुसलमानों की एक बड़ी तादाद थी। उनके सचिव और दुभाषिए आबिद हसन सफरानी थे, जिन्होंने ही प्रसिद्ध 'जय हिंद' का नारा गढ़ा था। कर्नल हबीब उर रहमान, मेजर जनरल शाहनवाज खान, कर्नल शौकत अली मलिक, कर्नल महबूब अहमद, करीम गनी, डीएम खान और एहसान कादिर जैसे सैकड़ों मुस्लिम स्वतंत्रता सेनानियों ने आजाद हिंद फौज में बड़े पदों पर रहकर अपनी सेवाएं दीं। नेताजी ने न केवल फौज का गठन किया, बल्कि एक साम्प्रदायिक सद्भाव परिषद की भी स्थापना की थी।

नेताजी बनाम जिन्ना की विचारधारा

1938 में ही नेताजी और जिन्ना के बीच पत्रों के माध्यम से वैचारिक द्वंद हो चुका था। 25 जुलाई 1938 को सुभाषचंद्र बोस ने जिन्ना को पत्र लिखकर स्पष्ट किया था कि अखिल भारतीय मुस्लिम लीग एक अत्यंत साम्प्रदायिक संगठन है, जो केवल मुसलमानों को अपनी सदस्यता देता है। इसके उत्तर में जिन्ना ने बेहद तल्ख लहजे में कहा था कि मुस्लिम लीग भारत के मुसलमानों की इकलौती राजनीतिक संस्था है और उसे कांग्रेस से किसी भी प्रकार के प्रमाण पत्र की आवश्यकता नहीं है। शायद उस समय नेताजी ने यह नहीं भांपा था कि लीग के उस अलगाववादी सपने को साकार होने में केवल सात वर्ष का समय लगेगा।

डायरेक्ट एक्शन डे और नेताजी की शैली

यदि नेताजी 16 अगस्त 1946 के 'डायरेक्ट एक्शन डे' के समय जीवित होते, तो स्थितियां निश्चित रूप से अलग होतीं। उस दिन जिन्ना के आह्वान पर हिंदुओं के खिलाफ भीषण हिंसा की गई थी। बंगाल में मुस्लिम लीग की सरकार का उन दंगाइयों को पूरा समर्थन था। कोलकाता में करीब पाँच हजार बेगुनाह हिंदू मारे गए, जिनमें बड़ी संख्या में उड़िया मजदूर शामिल थे। हिंसा की लपटें नोआखाली, पूर्वी बंगाल और रावलपिंडी तक पहुंच गई थीं। जिन्ना ने न तो कभी इन दंगों की निंदा की और न ही पीड़ित इलाकों का दौरा किया। इसके विपरीत, सुभाषचंद्र बोस, जो 1930 में कोलकाता के मेयर रह चुके थे, एक जुझारू नेता थे। वे कभी भी घर में बैठकर हिंसा का तमाशा नहीं देखते, बल्कि वे सड़कों पर उतरकर लीग के गुंडों का डटकर मुकाबला करते।

विभाजन के समय उनका प्रभाव

नेताजी का व्यक्तित्व जादुई था और वे पूर्णतः धर्मनिरपेक्ष थे। विभाजन की सबसे बड़ी मार बंगाल और पंजाब पर पड़ी, जो दोनों ही उनके प्रभाव क्षेत्र थे। बंगाल उनका अपना प्रदेश था और पंजाब में नामधारी सिख आज भी उन्हें बेहद सम्मान की दृष्टि से देखते हैं। उनके प्रभाव के सामने जिन्ना का यह दावा खोखला साबित होता कि मुस्लिम लीग ही भारत के मुसलमानों की एकमात्र प्रतिनिधि है। नेताजी की उपस्थिति में मुस्लिम जनता का एक बड़ा तबका उनके साथ खड़ा होता।

इतिहास का एक अफसोसनाक मोड़

यह अत्यंत दुखद है कि 18 अगस्त 1945 को हुए कथित विमान हादसे में नेताजी का निधन हो गया (हालांकि आधिकारिक रिकॉर्ड यही बताते हैं)। यदि वे जीवित होते, तो संभव है कि इतिहास का पन्ना कुछ अलग होता और देश का विभाजन न होता। उनकी उपस्थिति निश्चित रूप से राजनीतिक समीकरणों को बदलने में सक्षम थी। यद्यपि इतिहास किसी 'अगर' या 'किंतु' पर नहीं चलता है, फिर भी नेताजी की विरासत हमें आज भी धर्मनिरपेक्ष एकता और जुझारू राष्ट्रवाद की शक्ति का स्मरण कराती है। उनका जीवन इस बात का प्रमाण है कि यदि सही नेतृत्व मिले, तो साम्प्रदायिक ताकतों को उसी समय रोका जा सकता था।

देवेंद्र पांडेय पाबना के राजनीतिक संवाददाता हैं और राष्ट्रीय राजनीति, सरकार तथा नीतियों पर रिपोर्टिंग करते हैं। चुनाव, संसद और बड़े सियासी घटनाक्रमों का वे गहराई से विश्लेषण करते हैं। उनकी रिपोर्टिंग निष्पक्ष और तथ्यों पर आधारित होती है।

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