मिट्टी की उर्वरता बढ़ाने के लिए ढैंचा है संजीवनी, किसान सियाराम से जानें इसे उगाने की पूरी तकनीक उत्तर प्रदेश 2 महीने पहले 85
उत्तर प्रदेश के बहराइच जिले के किसान मिट्टी की गुणवत्ता सुधारने के लिए ढैंचा की खेती को वरदान मान रहे हैं। यह हरी खाद रासायनिक उर्वरकों पर निर्भरता कम कर पैदावार बढ़ाने में मदद करती है।

खेती में क्रांति ला रहा ढैंचा

आज के दौर में जब मिट्टी की घटती उर्वरता किसानों के लिए एक बड़ी समस्या बन गई है, तब ढैंचा एक प्रभावी समाधान के रूप में उभरकर सामने आया है। इसे मिट्टी की बैटरी चार्ज करने वाली फसल माना जाता है। बहराइच के प्रगतिशील किसान सियाराम बताते हैं कि खेती की लागत को कम करने और मुनाफे को बढ़ाने में ढैंचा बेहद कारगर है। यह न केवल फसलों की बेहतर ग्रोथ में सहायक है, बल्कि रासायनिक खाद के इस्तेमाल से भी किसानों को मुक्ति दिलाता है।

बंजर जमीन के लिए किसी वरदान से कम नहीं

ढैंचा को खेतों के लिए संजीवनी माना जाता है क्योंकि यह बंजर और कमजोर मिट्टी में भी आसानी से जान फूंकने की क्षमता रखता है। किसान सियाराम के अनुसार, यह फसल बहुत कम पानी की उपलब्धता में भी तेजी से विकसित होती है। ढैंचा की जड़ें मिट्टी की गहराई तक जाकर उसे भुरभुरी और हवादार बनाती हैं, जिससे फसल की जड़ों को मजबूती मिलती है। इसके अलावा, यह मिट्टी में नाइट्रोजन और अन्य जरूरी पोषक तत्वों की मात्रा को प्राकृतिक तरीके से बढ़ाती है।

ढैंचा की बुवाई और उचित समय

ढैंचा की खेती करने के लिए कुछ तकनीकी बातों का ध्यान रखना आवश्यक है। किसान सियाराम ने इसे उगाने की पूरी विधि साझा की है:

  • समय सीमा: ढैंचा की बुवाई के लिए अप्रैल से जुलाई के बीच का समय सबसे उपयुक्त माना जाता है।
  • बीज की मात्रा: एक एकड़ खेत के लिए 20 से 25 किलो बीज पर्याप्त रहता है।
  • खेत की तैयारी: बुवाई से पहले खेत की हल्की जुताई कर लेनी चाहिए। मिट्टी में पर्याप्त नमी होना बहुत जरूरी है।
  • अंकुरण का तरीका: बेहतर परिणाम पाने के लिए बीज को रात भर पानी में भिगोकर रखें और अगले दिन सुबह बुवाई करें।

खेत में ही करें जुताई

ढैंचा की सबसे बड़ी खासियत यह है कि फसल तैयार होने के बाद इसे काटना नहीं पड़ता है, बल्कि खेत में ही इसकी जुताई कर दी जाती है। यह प्रक्रिया मिट्टी को प्राकृतिक खाद प्रदान करती है। बहराइच जिले के मिर्जापुर गांव के रहने वाले किसान सियाराम खुद कई वर्षों से बड़े पैमाने पर ढैंचा की खेती कर रहे हैं और इसके परिणामों से बेहद संतुष्ट हैं। वे हर साल रासायनिक खादों पर होने वाले खर्च में भारी कटौती कर लाखों रुपये बचा रहे हैं।

क्यों जरूरी है ढैंचा का उपयोग?

रासायनिक उर्वरकों के अत्यधिक उपयोग से मिट्टी की संरचना बिगड़ रही है। ऐसे में ढैंचा जैसी हरी खाद अपनाकर किसान न केवल अपनी मिट्टी की सेहत सुधार सकते हैं, बल्कि भविष्य की पीढ़ियों के लिए उपजाऊ जमीन भी सुरक्षित रख सकते हैं। बहराइच के किसान इन दिनों धान की फसल से पहले ढैंचा का बड़े पैमाने पर उपयोग कर रहे हैं, जिससे उनकी फसल की पैदावार और गुणवत्ता में काफी सुधार देखा गया है।

चेतन तिवारी पाबना के उत्तर प्रदेश संवाददाता हैं और राज्य की राजनीति, प्रशासन तथा जमीनी मुद्दों को कवर करते हैं। लखनऊ में रहते हुए वे जिलों से लेकर विधानसभा तक की खबरें संतुलित रिपोर्टिंग के साथ पाठकों तक पहुंचाते हैं। आम लोगों के मुद्दों और स्थानीय घटनाओं पर उनका खास फोकस रहता है।

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