आयुर्वेद का अद्भुत खजाना: प्रसव के बाद महिलाओं के लिए संजीवनी है खैर का पेड़ जीवनशैली 2 महीने पहले 70
सागर के जंगलों में पाया जाने वाला खैर का पेड़ अपने औषधीय गुणों के कारण किसी वरदान से कम नहीं है। प्रसव के बाद महिलाओं की रिकवरी और शरीर के संक्रमण को दूर करने में इसका इस्तेमाल रामबाण माना जाता है।

प्रकृति की गोद में छिपा स्वास्थ्य का रहस्य

भारत के ग्रामीण और आदिवासी क्षेत्रों में आज भी आयुर्वेद का गहरा प्रभाव है। सागर के जंगलों के बीच बसी बस्तियों में रहने वाले लोग सदियों से औषधीय पेड़ों का उपयोग बीमारियों को दूर करने के लिए करते आ रहे हैं। इनमें से एक अत्यंत महत्वपूर्ण पेड़ खैर है। आधुनिक चिकित्सा प्रणाली आने के बावजूद, ये जनजातीय समुदाय आज भी इस पेड़ के फल, छाल और तने को अपनी सेहत का रक्षक मानते हैं।

प्रसव के बाद महिलाओं के लिए अचूक औषधि

ग्रामीण अंचलों में प्रसव के बाद महिलाओं के स्वास्थ्य को पुनर्जीवित करने के लिए खैर की लकड़ी का उपयोग एक परंपरा की तरह है। जब किसी महिला की डिलीवरी होती है, तो खैर की लकड़ी के मध्य भाग से निकलने वाले सार को पानी में अच्छी तरह उबाला जाता है। यह काढ़ा प्रसव के बाद महिलाओं की रिकवरी में बेहद प्रभावी माना जाता है।

  • शरीर की सफाई: इस पानी का सेवन करने से प्रसूता के शरीर में मौजूद अशुद्धियां पूरी तरह साफ हो जाती हैं।
  • दर्द और ऐंठन से राहत: यह पेट दर्द और ऐंठन को कम करने में बड़ी भूमिका निभाता है।
  • इम्यूनिटी बूस्टर: इस पानी के सेवन से महिलाओं की रोग प्रतिरोधक क्षमता में जबरदस्त वृद्धि होती है।
  • संक्रमण से सुरक्षा: इस उबाले हुए पानी से महिला को नहलाने से शरीर की बाहरी त्वचा पर मौजूद हानिकारक रोगाणु मर जाते हैं, जो प्रसव के बाद संक्रमण से बचाने में मदद करते हैं।

विशेषज्ञों और ग्रामीणों की राय

शासकीय कन्या महाविद्यालय के माइक्रो बायोलॉजी के असिस्टेंट प्रोफेसर भूपेंद्र अहिरवार का कहना है कि प्रसव के दौरान अत्यधिक रक्तस्राव से महिला का शरीर कमजोर हो जाता है। ऐसे में खैर की छाल का काढ़ा उनके लिए सुरक्षा कवच का काम करता है। यह शरीर को बाहरी संक्रमणों से सुरक्षित रखने के साथ-साथ आंतरिक रोगों से लड़ने की शक्ति भी प्रदान करता है।

स्थानीय निवासी गोविंद सिंह ठाकुर के अनुसार, खैर की लकड़ी का उपयोग कत्था बनाने में भी किया जाता है। चोट लगने या घाव होने पर इसके पाउडर का लेप लगाने से रक्तस्राव तुरंत बंद हो जाता है और घाव जल्दी भर जाते हैं। इसका कोई दुष्प्रभाव भी देखने को नहीं मिलता है।

उपयोग की विधि

विशेषज्ञों के अनुसार, पूरी तरह से सूख चुके खैर के पेड़ के तने को छीलकर उसके बीच से सार निकाला जाता है। इस लकड़ी के टुकड़ों को पानी में उबाला जाता है। यह विधि प्रसव के बाद रिकवरी के लिए ग्रामीण क्षेत्रों में अपनाई जाने वाली एक सदियों पुरानी और भरोसेमंद प्रक्रिया है, जिसे आज भी लोग पूरी निष्ठा से निभाते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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