बिहार
59 मिनट पहले
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विचारों
धान की खेती और किसानों की चिंता
इस समय देश भर में धान की खेती का मुख्य सीजन चल रहा है और किसान अपने खेतों की तैयारियों में जुटे हुए हैं। धान की नर्सरी तैयार करने से लेकर रोपाई तक का काम जोरों पर है। हालांकि, इस साल मौसम विभाग के पूर्वानुमानों ने किसानों की नींद उड़ा दी है। अनुमान के अनुसार, इस वर्ष सामान्य से काफी कम बारिश होने की संभावना है, जिससे धान की फसल को लेकर किसानों की चिंता बढ़ना स्वाभाविक है। यदि आप भी धान की खेती करने की योजना बना रहे हैं और कम बारिश के कारण फसल बर्बाद होने के डर से चिंतित हैं, तो जमुई जिले के एक किसान का अनुभव आपके लिए संजीवनी साबित हो सकता है।
ध्रुव कुमार का सफल प्रयोग
जमुई जिले के खैरा प्रखंड स्थित मांगोबंदर गांव के निवासी किसान ध्रुव कुमार ने गर्मी के मौसम में भी धान की सफल खेती कर एक उदाहरण पेश किया है। ध्रुव का कहना है कि अगर बारिश का स्तर कम रहता है, तब भी सही तकनीक और सूझबूझ से धान की बंपर पैदावार ली जा सकती है। उन्होंने बिना पर्याप्त बारिश के भी धान की अच्छी फसल उगाई है। ध्रुव के अनुसार, यदि मानसून साथ न दे, तो किसानों को सिंचाई के अन्य विकल्पों पर पूरी तरह निर्भर हो जाना चाहिए। उन्होंने अपने अनुभव से बताया कि सिंचाई की बेहतर व्यवस्था ही कम बारिश में सफलता की कुंजी है।
सिंचाई और मिट्टी की जांच का महत्व
ध्रुव कुमार ने बताया कि धान की रोपाई करने से पहले किसानों को यह सुनिश्चित कर लेना चाहिए कि उनके पास सिंचाई के लिए ट्यूबवेल या अन्य वैकल्पिक साधन मौजूद हैं या नहीं। उन्होंने अपने खेत में हर दो दिन के अंतराल पर सिंचाई की, जिससे उनकी फसल को पानी की कमी नहीं हुई। इसके अलावा, उन्होंने एक और महत्वपूर्ण सलाह दी है कि धान की बुवाई से पहले खेत की मिट्टी की जांच जरूर करवाएं। मिट्टी परीक्षण से यह स्पष्ट हो जाता है कि जमीन में किन पोषक तत्वों की कमी है, जिससे खाद का सही उपयोग किया जा सकता है। उन्होंने सलाह दी है कि जिन किसानों के पास सिंचाई के साधन नहीं हैं, उन्हें जल्दबाजी में धान की बुवाई नहीं करनी चाहिए और मौसम के मिजाज को देखते हुए ही निर्णय लेना चाहिए।
डीएसआर तकनीक का लाभ
खेती को आधुनिक बनाने के क्रम में ध्रुव कुमार ने डीएसआर तकनीक (डायरेक्ट सीडिंग ऑफ राइस) का जिक्र किया। इस पद्धति में धान की नर्सरी तैयार करने की झंझट नहीं होती, बल्कि सीधे खेत में ही बीजों की बुवाई कर दी जाती है। इस तकनीक के कई बड़े फायदे हैं:
- इसमें नर्सरी तैयार करने का खर्च और मेहनत बच जाती है।
- पारंपरिक तरीके की तुलना में इसमें 30 से 40 प्रतिशत तक पानी की बचत होती है।
- मजदूरी पर होने वाला खर्च काफी कम हो जाता है।
- खेतों में लंबे समय तक पानी भरकर रखने की आवश्यकता नहीं पड़ती।
- फसल में कीटों का प्रकोप और बीमारियों की संभावना काफी कम हो जाती है।
कम समय वाली किस्मों का चयन
ध्रुव का मानना है कि कम पानी में अच्छी पैदावार पाने के लिए फसल की किस्म का चुनाव बहुत मायने रखता है। उन्होंने किसानों को सलाह दी कि वे हमेशा उन किस्मों का चयन करें जो कम समय में पककर तैयार हो जाती हैं। कम अवधि वाली किस्में न केवल पानी की खपत को नियंत्रित करती हैं, बल्कि जोखिम को भी कम कर देती हैं। इस प्रकार की वैज्ञानिक सोच और सही समय पर उचित तकनीक का उपयोग करके किसान कम बारिश की चुनौती को पार करते हुए धान की भरपूर उपज ले सकते हैं।
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