छतरपुर में 40 सालों से दिव्यांग बच्चों का सहारा बनी यह संस्था, एक दिव्यांग शख्स के बुलंद हौसलों से हुई थी शुरुआत मध्य प्रदेश 3 घंटे पहले 4
मध्य प्रदेश के छतरपुर में 'प्रगतिशील विकलांग संसार' नामक संस्था पिछले चार दशकों से बेसहारा और दिव्यांग बच्चों का भविष्य संवार रही है, जिसकी नींव एक दिव्यांग व्यक्ति ने ही रखी थी।

कहते हैं कि अगर हौसले बुलंद हों, तो शारीरिक कमियां कभी भी आपके सपनों के आड़े नहीं आ सकतीं। मध्य प्रदेश के छतरपुर जिले से एक ऐसा ही प्रेरणादायक मामला सामने आया है, जहां एक दिव्यांग व्यक्ति के सपने ने आज सैकड़ों दिव्यांग बच्चों के जीवन में उजाला भर दिया है। हम बात कर रहे हैं छतरपुर के 'निःशक्त आवासीय विद्यालय प्रगतिशील विकलांग संसार' की, जो पिछले करीब 40 वर्षों से लगातार दिव्यांग बच्चों के सुनहरे भविष्य का निर्माण कर रही है। सबसे खास बात यह है कि इस सेवा की शुरुआत खुद एक दिव्यांग व्यक्ति ने की थी, जिन्होंने अपनी शारीरिक लाचारी को अपनी ताकत बनाया और दूसरों का सहारा बनने का फैसला किया। आज यह संस्थान न केवल इन बच्चों को आसरा दे रहा है, बल्कि उन्हें समाज की मुख्यधारा से जोड़ने के लिए मुफ्त शिक्षा, भोजन और आवास जैसी बुनियादी सुविधाएं भी उपलब्ध करा रहा है।

शून्य से शिखर तक का सफर: एक दिव्यांग का संकल्प

इस अनूठी संस्था की स्थापना की कहानी बेहद भावुक और प्रेरित करने वाली है। बात साल 1986 की है, जब छतरपुर के रहने वाले निहाल अहमद सिद्दिकी ने 26 मई 1986 को इस दिव्यांग संस्था की नींव रखी थी। शुरुआत में उनके पास न तो कोई बड़ी जमापूंजी थी और न ही कोई बड़ी सरकारी मदद। उन्होंने एक बेहद छोटे और कच्चे टपार (झोपड़ी) से इस संस्था का संचालन शुरू किया था। आज भले ही संस्था को सरकार और समाज से मदद मिल रही है, लेकिन शुरुआती दिन बेहद कठिनाइयों से भरे थे।

संस्था के मौजूदा अध्यक्ष और पेशे से वकील संजय खरे बताते हैं कि जब इस विद्यालय की शुरुआत हुई थी, तब समिति के पास न तो पर्याप्त पैसे थे और न ही बच्चों को देने के लिए आवश्यक सुविधाएं। लेकिन निहाल अहमद सिद्दिकी के इरादे फौलादी थे। उन्होंने हार नहीं मानी और इस नेक काम के लिए पूरे शहर का दरवाजा खटखटाया। वे शहर के बड़े-बड़े प्रशासनिक अधिकारियों, कर्मचारियों और राजनेताओं के घर-घर गए और उनसे मदद की गुहार लगाई। उनकी इस लगन को देखकर समाज के हर वर्ग ने उनका सहयोग किया, जिसके बाद यह सपना हकीकत में बदल सका।

दोस्ती और संकल्प का अनूठा उदाहरण

संजय खरे अपने पुराने दिनों को याद करते हुए बताते हैं कि निहाल अहमद सिद्दिकी भले ही उम्र में उनसे काफी बड़े थे, लेकिन दोनों के बीच एक गहरे मित्र जैसा रिश्ता था। कॉलेज की पढ़ाई के दौरान ही संजय भी निहाल साहब के इस नेक काम से प्रभावित होकर उनके इस अभियान से जुड़ गए थे। उस समय यह संस्था एक पहाड़ के नीचे कच्चे टपार में संचालित होती थी। निहाल सिद्दिकी एक बेहद निडर और दबंग व्यक्तित्व वाले इंसान थे, लेकिन उनका दिल बेहद कोमल था। वे गरीबों और बेसहारा लोगों की मदद के लिए हमेशा तत्पर रहते थे।

संजय खरे के अनुसार, निहाल साहब के मन में यह विचार तब आया जब वे खुद अपंग हो गए। खुद की शारीरिक अक्षमता ने उन्हें अन्य दिव्यांग बच्चों के दर्द का अहसास कराया। हालांकि, आर्थिक रूप से वे इतने सक्षम नहीं थे कि अकेले के दम पर इतनी बड़ी संस्था खड़ी कर सकें। इसलिए उन्होंने समाज के लोगों को एकजुट किया और अपने विचारों को धरातल पर उतारा। दुर्भाग्यवश, आज निहाल अहमद सिद्दिकी इस दुनिया में नहीं हैं, लेकिन उनके द्वारा शुरू किए गए इस पुनीत कार्य को उनके परम मित्र संजय खरे पूरी निष्ठा के साथ आगे बढ़ा रहे हैं।

संस्थान में 40 बच्चों के रहने का इंतजाम

इस आवासीय विद्यालय में दिव्यांग बच्चों की देखभाल के लिए तमाम आधुनिक और बुनियादी सुविधाएं उपलब्ध कराई गई हैं। संजय खरे ने बताया कि संस्थान में कुल 40 बच्चों के रहने की उत्तम व्यवस्था है। वर्तमान समय में यहां अलग-अलग उम्र के 32 दिव्यांग बच्चे रह रहे हैं। इन बच्चों के लिए रहना, खाना-पीना और पढ़ाई-लिखाई सब कुछ पूरी तरह से निःशुल्क है। बच्चों को आधुनिक शिक्षा देने के लिए संस्थान में 3 प्रोजेक्टर के साथ स्मार्ट क्लासरूम की भी व्यवस्था की गई है।

यहां बच्चों की दिनचर्या बेहद अनुशासित और रोचक होती है। सुबह 8 बजे से लेकर शाम 6 बजे तक बच्चों की पढ़ाई चलती है। वे सामान्य स्कूलों में भी पढ़ने जाते हैं। इसके साथ ही, संस्थान के भीतर ही उनके लिए स्टडी क्लास, मनोरंजन क्लास और म्यूजिक क्लास का भी आयोजन किया जाता है। शाम 6 बजे के बाद बच्चों को खेलने और आराम करने के लिए खाली समय दिया जाता है, जिससे उनका मानसिक और शारीरिक विकास भी बेहतर ढंग से हो सके।

सरकार और DDRC का मिल रहा सहयोग

इस संस्थान को सुचारू रूप से चलाने में अब सरकार का भी महत्वपूर्ण योगदान मिल रहा है। मध्य प्रदेश सरकार की ओर से प्रति बच्चा 1000 रुपये की आर्थिक सहायता प्रदान की जाती है। इसके अलावा, संस्थान में काम करने वाले कर्मचारियों का खर्च और वेतन भी सरकार द्वारा ही वहन किया जाता है। इसके साथ ही, जिला अस्पताल में संचालित DDRC संस्था भी इसी से संबद्ध है, जो अस्पताल आने वाले दिव्यांग बच्चों के परिवारों को इस संस्थान के बारे में जानकारी देती है और उन्हें यहां प्रवेश दिलाने में मदद करती है।

दूर-दराज के क्षेत्रों से आते हैं बच्चे

इस संस्थान की लोकप्रियता और विश्वसनीयता इतनी अधिक है कि केवल छतरपुर शहर ही नहीं, बल्कि जिले के सुदूर ग्रामीण अंचलों से भी बच्चे यहां आते हैं। संजय खरे बताते हैं कि सटई, बड़ा मलहरा, राजनगर और यहां से करीब 100 किलोमीटर दूर स्थित गौरिहार जैसे सीमावर्ती क्षेत्रों के बच्चे भी यहां रहकर पढ़ाई कर रहे हैं। इस संस्थान के दरवाजे सभी जाति और धर्म के दिव्यांग बच्चों के लिए हमेशा खुले रहते हैं। विशेष रूप से ऐसे गरीब परिवार जो अपने दिव्यांग बच्चों के पालन-पोषण और शिक्षा का खर्च उठाने में असमर्थ हैं, उन्हें यहां प्राथमिकता दी जाती है।

इसके लिए संस्था द्वारा समय-समय पर प्रचार-प्रसार भी किया जाता है। आज इस संस्थान के आंगन में मासूम दिव्यांग बच्चे गाते हैं, झूमते-नाचते हैं, खूबसूरत पेंटिंग बनाते हैं और खुद स्मार्ट प्रोजेक्टर का संचालन भी करते हैं। यह देखना अपने आप में एक सुखद अहसास है कि कैसे एक व्यक्ति के छोटे से प्रयास ने आज कई परिवारों के अंधेरे जीवन को रौशन कर दिया है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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