बोकारो के 80 वर्षीय बुजुर्ग की मेहनत, हाथों से रस्सियां बनाकर बचा रहे हैं पुश्तैनी कला झारखंड 2 महीने पहले 73
झारखंड के बोकारो में 80 साल के दिगम जी अपनी पुरानी कला को आज भी जिंदा रखे हुए हैं। वे प्लास्टिक के बोरों से मजबूत रस्सियां बनाकर अपना जीवन यापन कर रहे हैं।

आधुनिक युग में परंपरा की मिसाल

आज के दौर में जब हर तरफ मशीनों का बोलबाला है और हाथों से की जाने वाली कारीगरी धीरे-धीरे खत्म होती जा रही है, तब झारखंड के बोकारो जिले के 80 वर्षीय दिगम जी एक अलग पहचान बनाए हुए हैं। वे न केवल अपने बुजुर्गों से मिले हुनर को सहेज रहे हैं, बल्कि उसे अपनी आजीविका का जरिया भी बनाया हुआ है।

काशी झरिया गांव में हुनर की पहचान

दिगम जी बोकारो के चास प्रखंड स्थित काशी झरिया गांव के निवासी हैं। उम्र के इस पड़ाव पर भी उनका जज्बा कम नहीं हुआ है। वे पुराने प्लास्टिक के बोरों का इस्तेमाल करके अपने हाथों से बेहद मजबूत और टिकाऊ रस्सियां तैयार करते हैं। यह काम दिखने में सरल लग सकता है, लेकिन इसमें काफी मेहनत और हुनर की आवश्यकता होती है।

संघर्ष के बावजूद अडिग

बाजार में मशीनों से बनी रस्सियों की भरमार है और हाथों से बनी चीजों की मांग लगातार कम हो रही है। बावजूद इसके, दिगम जी ने अपने पुश्तैनी काम को छोड़ने के बजाय उसे पूरी शिद्दत से जारी रखा है। वे अपनी बनाई रस्सियों को आसपास के स्थानीय हाट और बाजारों में ले जाकर बेचते हैं। इससे मिलने वाली आय ही उनके गुजारे का मुख्य आधार है।

प्रेरणादायक कहानी

दिगम जी का जीवन उन लोगों के लिए एक बड़ी मिसाल है, जो विपरीत परिस्थितियों में भी अपने आत्मसम्मान और संस्कृति को बचाए रखना चाहते हैं। लुप्त होती ग्रामीण कलाओं को संजोने का उनका यह प्रयास न केवल सराहनीय है, बल्कि नई पीढ़ी के लिए भी एक प्रेरणादायक उदाहरण है कि कैसे अपनी जड़ों से जुड़कर कठिन मेहनत की जा सकती है।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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