बरसात की खास सौगात: क्या आपने चखा है जंगली फल 'अमेरा'? छत्तीसगढ़ में इसके अचार की है जबरदस्त दीवानगी छत्तीसगढ़ एक घंटा पहले 3
छत्तीसगढ़ के जंगलों में केवल बरसात के दौरान मिलने वाला फल 'अमेरा' इन दिनों बिलासपुर के बाजारों में चर्चा का विषय बना हुआ है। लोग इसे आम के स्वाद जैसा मानकर अचार बनाने के लिए बड़े पैमाने पर खरीद रहे हैं।

मानसून के साथ बाजारों में रौनक

छत्तीसगढ़ में मानसून के दस्तक देते ही वनों की उपज और जंगली फलों की बहार आ जाती है। इसी मौसम में जंगलों से निकलकर शहर के बाजारों तक एक ऐसा फल पहुंचता है, जिसे देखकर अक्सर लोग धोखा खा जाते हैं। यह दिखने और स्वाद में बिल्कुल कच्चे आम जैसा लगता है, इसीलिए इसे स्थानीय लोग बड़े प्यार से आम का छोटा भाई कहकर बुलाते हैं। बिलासपुर शहर के देवकीनंदन चौक पर आजकल इन फलों की बिक्री जोरों पर है।

पाली के जंगलों से सीधा पहुंच

यह जंगली फल, जिसे लोग अमेरा के नाम से जानते हैं, मुख्य रूप से छत्तीसगढ़ के पाली क्षेत्र के घने जंगलों में उगता है। बरसात के शुरुआती कुछ दिनों में ही यह बाजार में उपलब्ध होता है। विजय लक्ष्मी ठाकुर, जो बिलासपुर के देवकीनंदन चौक पर इसे बेचने का काम करती हैं, बताती हैं कि यह फल सीधे तौर पर पाली के जंगलों से एकत्र किया जाता है। इसकी बढ़ती मांग और सीमित उपलब्धता के चलते लोग इसे खरीदने के लिए खासे उत्सुक रहते हैं। वर्तमान में, इसकी कीमत ₹50 प्रति किलो तय की गई है।

अचार के लिए पहली पसंद

अमेरा की सबसे बड़ी विशेषता इसका स्वाद है, जो कच्चे आम के तीखेपन और खटास से काफी मिलता-जुलता है। यही कारण है कि ग्रामीण अंचलों में इसका उपयोग मुख्य रूप से स्वादिष्ट अचार तैयार करने के लिए किया जाता है। स्थानीय लोग इस फल को लेकर खासे उत्साहित रहते हैं और एक बार में 10 से 15 किलो तक अमेरा की खरीदारी करते हैं ताकि साल भर के लिए अचार का स्टॉक तैयार किया जा सके। कई परिवारों का मानना है कि अमेरा का अचार कच्चे आम के अचार से भी ज्यादा जायकेदार और लजीज होता है, जिसके चलते यह ग्रामीण रसोई का एक अनिवार्य हिस्सा बन गया है।

औषधीय गुण और पारंपरिक मान्यताएं

स्वाद के अलावा, अमेरा को लेकर कई पारंपरिक स्वास्थ्य दावे भी किए जाते हैं। स्थानीय निवासियों और बुजुर्गों का ऐसा मानना है कि यह मौसमी फल पाचन तंत्र को दुरुस्त रखने में मददगार साबित होता है। इसे गैस या पेट से जुड़ी अन्य छोटी-मोटी समस्याओं के निवारण के रूप में भी देखा जाता है। हालांकि, ये मान्यताएं पारंपरिक अनुभवों पर आधारित हैं और इनकी वैज्ञानिक पुष्टि होना अभी बाकी है, इसलिए इसे केवल एक पारंपरिक नुस्खे के रूप में ही समझा जाना चाहिए।

शहरों तक पहुंची लोकप्रियता

एक समय था जब अमेरा की खपत केवल गांवों तक ही सीमित थी, लेकिन अब धीरे-धीरे इसकी लोकप्रियता शहरी इलाकों में भी बढ़ रही है। बिलासपुर जैसे शहरों के बाजार में अब लोग पारंपरिक और अनोखे जायकों की तलाश में अमेरा खरीदने पहुंच रहे हैं। यदि आप भी आम के स्वाद के शौकीन हैं और बरसात के मौसम का लुत्फ उठाना चाहते हैं, तो अमेरा आपके लिए एक बेहतरीन विकल्प है। यह केवल एक फल नहीं है, बल्कि छत्तीसगढ़ की समृद्ध ग्रामीण संस्कृति और खानपान की परंपराओं की एक झलक है। फिलहाल, आप इसे देवकीनंदन चौक पर ₹50 प्रति किलो की दर से खरीद सकते हैं।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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