मौलाना बरकतउल्ला भोपाली कौन थे? जिनके नाम वाली भोपाल यूनिवर्सिटी अब बनेगी वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय मध्य प्रदेश 3 महीने पहले 72
भोपाल की बरकतउल्ला विश्वविद्यालय का नाम बदलकर मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय करने का प्रस्ताव कार्यपरिषद ने सर्वसम्मति से पारित कर दिया है। प्रस्ताव अब उच्च शिक्षा विभाग और राजभवन के पास भेजा गया है।

भोपाल की प्रतिष्ठित बरकतउल्ला विश्वविद्यालय (BU) को लेकर एक बड़ा फैसला सामने आया है। विश्वविद्यालय की कार्यपरिषद ने सर्वसम्मति से यह प्रस्ताव पास कर दिया है कि अब इस संस्था को मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय के नाम से जाना जाएगा। साल 1988 से मौलाना बरकतउल्ला भोपाली के नाम पर चली आ रही इस संस्था के नाम परिवर्तन का प्रस्ताव अब उच्च शिक्षा विभाग और राजभवन को भेज दिया गया है।

यह फैसला राज्य की सांस्कृतिक विरासत और ऐतिहासिक पहचान को लेकर एक नई बहस को जन्म दे रहा है। विश्वविद्यालय प्रशासन का तर्क है कि यह बदलाव राजा भोज की विरासत को आगे बढ़ाने के मकसद से किया जा रहा है।

नाम बदलने के पीछे क्या तर्क दिए गए

विश्वविद्यालय प्रशासन का कहना है कि मौलाना बरकतउल्ला भोपाली का अधिकतर जीवन विदेशों में बीता, जबकि राजा भोज ने भोपाल क्षेत्र की सांस्कृतिक और शैक्षिक नींव रखी थी। प्रशासन के अनुसार राजा भोज की विरासत भोपाल के इतिहास से सीधे तौर पर जुड़ी हुई है।

‘वाग्देवी’ ज्ञान की देवी सरस्वती का ही एक स्वरूप मानी जाती हैं, जिनकी स्थापना राजा भोज ने भोजशाला में की थी। प्रशासन इस बदलाव को भारतीय ज्ञान परंपरा को सुदृढ़ करने की दिशा में उठाया गया कदम बता रहा है।

कौन थे मौलाना बरकतउल्ला भोपाली

मौलाना अब्दुल हाफिज मोहम्मद बरकतउल्ला भोपाली भारत के स्वतंत्रता संग्राम के उन गुमनाम नायकों में गिने जाते हैं, जिन्होंने विदेश में रहते हुए भी देश की आजादी की मशाल जलाए रखी। उनका जन्म 1854 में भोपाल में हुआ था।

उन्होंने पारंपरिक शिक्षा के साथ-साथ अंग्रेजी भी सीखी और जल्द ही ब्रिटिश विरोधी गतिविधियों से जुड़ गए। वे गदर पार्टी के प्रमुख सदस्यों में से एक थे और उन्होंने जापान, अमेरिका, जर्मनी तथा अफगानिस्तान जैसे देशों में भारत की आजादी की आवाज बुलंद की।

1915 में बनी भारत की निर्वासित सरकार

दिसंबर 1915 में काबुल में भारत की अस्थायी सरकार (Provisional Government of India) का गठन हुआ, जिसमें महेंद्र प्रताप को राष्ट्रपति और बरकतउल्ला भोपाली को प्रधानमंत्री बनाया गया। यह सरकार विश्व युद्ध के दौर में ब्रिटिश साम्राज्य के खिलाफ अंतरराष्ट्रीय समर्थन जुटाने की एक अहम कोशिश थी।

अपने संघर्ष के दौरान बरकतउल्ला ने लेनिन से भी मुलाकात की और बोल्शेविक क्रांति से प्रेरणा हासिल की।

1988 में रखा गया था नाम

भोपाल विश्वविद्यालय का नाम 1988 में बरकतउल्ला भोपाली के सम्मान में रखा गया था। अब कार्यपरिषद ने इसे मां वाग्देवी भोजपाल विश्वविद्यालय करने का प्रस्ताव सर्वसम्मति से पारित कर दिया है। प्रस्ताव में यह दलील दी गई है कि राजा भोज की विरासत भोपाल के इतिहास से सीधे जुड़ी है, जबकि बरकतउल्ला का योगदान मुख्यतः विदेशी धरती पर रहा।

अंजलि सिंह पाबना की राज्य संवाददाता हैं, जो विभिन्न राज्यों की क्षेत्रीय खबरें और खानपान कवर करती हैं। स्थानीय घटनाओं, संस्कृति और जायके की कहानियों को वे करीब से रिपोर्ट करती हैं। अलग-अलग राज्यों की विविधता उनकी रिपोर्टिंग में नजर आती है।

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