बिहार
एक घंटा पहले
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विचारों
कोई रसीला फल खाते समय अक्सर मन में यह ख्याल आता है कि काश इसमें बीज न होता और सिर्फ रसभरा गूदा खाने को मिलता। फल प्रेमियों की यही चाहत अब हकीकत बनने जा रही है। बिहार कृषि विश्वविद्यालय (BAU) सबौर (भागलपुर) के वैज्ञानिकों ने फलों पर एक अनूठा प्रयोग शुरू किया था, जिसमें उन्हें बड़ी कामयाबी हाथ लगी है।
बीज के नाम पर सिर्फ छोटा सा कण
इससे पहले वैज्ञानिकों ने बिना बीज वाला आम तैयार किया था और अब उन्होंने बिना बीज वाली बेदाना लीची भी विकसित कर ली है। इस खास किस्म की लीची में बीज के नाम पर महज काली मिर्च के दाने के बराबर एक छोटा सा कण रह जाता है। यानी इसे खाने पर सिर्फ और सिर्फ गूदे का स्वाद मिलेगा।
लीची उत्पादन में बिहार सबसे आगे
बीएयू सबौर में कृषि और बागवानी को उन्नत बनाने के लिए लगातार नए-नए शोध होते रहते हैं। लीची उत्पादन की बात करें तो पूरे देश में बिहार सबसे आगे है। देश की कुल लीची का करीब 87 प्रतिशत उत्पादन अकेले बिहार में होता है। यही वजह है कि भारत सरकार ने बिहार की मशहूर शाही लीची को जीआई टैग दिया है। अब इसी कड़ी में बेदाना लीची राज्य की नई पहचान बनने की राह पर है।
जीआई टैग के लिए आवेदन
बीएयू के कुलपति डॉ. दुनिया राम सिंह ने बताया कि बेदाना लीची की अद्भुत खूबियों को देखते हुए इसके जीआई टैग के लिए भारत सरकार को आवेदन भेज दिया गया है। उन्होंने बताया कि इस बेदाना लीची का आकार सामान्य शाही लीची से भी बड़ा है, इसमें गूदा बहुत अधिक होता है और बीज ना के बराबर रहता है।
तेजी से बढ़ाए जा रहे पौधे
डॉ. सिंह के अनुसार पहले सबौर विश्वविद्यालय में बेदाना लीची के मदर प्लांट (मुख्य पौधे) की संख्या काफी कम थी, जिसे अब तेजी से बढ़ाया जा रहा है। जहां पहले केवल 50 पेड़ थे, वहीं अब बीएयू का फल अनुसंधान विभाग इसके 250 से 300 नए पौधे तैयार करने में जुटा है। चूंकि अंतरराष्ट्रीय बाजार में शाही लीची की मांग और कीमत पहले से ही बहुत अधिक है, इसलिए बिना बीज वाली यह बेदाना लीची जब बाजार में आएगी तो इसका बड़े पैमाने पर विदेशों में निर्यात किया जाएगा।
किसानों की आमदनी दोगुनी होने की उम्मीद
एक सफल शोध के रूप में फिलहाल भागलपुर के नवगछिया के किसान इस बेदाना लीची का उत्पादन कर रहे हैं। इस किस्म की कई बेहद खास विशेषताएं हैं। यह लीची पूरी तरह गोल आकार की होती है और इसकी मिठास आम लीचियों के मुकाबले बेहद अलग व लाजवाब है। इसके पेड़ के पत्ते फुटबॉल की तरह गोल होते हैं। इस किस्म में फलने की क्षमता आम लीची से कहीं अधिक है, जो बिहार के किसानों की आमदनी दोगुनी करने में मददगार साबित होगी।
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