मध्य प्रदेश
एक घंटा पहले
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मध्य प्रदेश के बालाघाट जिले में स्थित कान्हा नेशनल पार्क इन दिनों बाघों की लगातार हो रही मौतों को लेकर सुर्खियों में है। बीते एक महीने के भीतर यहां 8 से ज्यादा बाघ काल के गाल में समा चुके हैं। कभी भूख तो कभी टेरिटोरियल फाइट को इसकी वजह बताया जा रहा है, लेकिन इन सबके बीच एक वायरस का नाम सबसे ज्यादा गूंज रहा है — कैनाइन डिस्टेंपर वायरस। आशंका है कि इसी वायरस ने बाघिन अमाही और उसके पूरे परिवार को निगल लिया।
टाइगर स्टेट में ही सबसे ज्यादा बाघों की मौत
पर्यावरण प्रेमियों के लिए साल 2026 बेहद निराशाजनक साबित हुआ है। इस साल अब तक देशभर में 70 से ज्यादा बाघों की मौत हो चुकी है, जिनमें से करीब 42 प्रतिशत मामले अकेले टाइगर स्टेट मध्य प्रदेश से सामने आए हैं। एमपी में इस साल लगभग 30 से ज्यादा बाघों की मौत दर्ज की गई है, जिसने पूरी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर दिए हैं।
दिलचस्प बात यह है कि भारतीय वन्यजीव संस्थान, देहरादून की रिपोर्ट कान्हा नेशनल पार्क को बाघों के लिए सबसे बेहतर आवास घोषित कर चुकी है। बावजूद इसके, बीते एक महीने में जो हालात सामने आए हैं, उन्होंने कान्हा प्रबंधन की कार्यप्रणाली पर ही प्रश्नचिह्न लगा दिए हैं।
कब-कब हुई बाघों की मौत
कान्हा नेशनल पार्क में मौतों का सिलसिला 21 अप्रैल से शुरू हुआ, जब 18 महीने से कम उम्र के एक शावक की जान गई। इसके बाद घटनाक्रम इस तरह रहा:
- दूसरे शावक की मौत 24 अप्रैल को हुई।
- तीसरे शावक की मौत 25 अप्रैल को दर्ज की गई।
- 29 अप्रैल को एक साथ दो शावकों ने दम तोड़ दिया।
- यह वही घटना है जिसमें बाघिन अमाही और उसके चार शावकों की मौत हुई थी।
- हाल ही में 19 मई को 6 साल के एक वयस्क नर बाघ की मौत हुई।
इन सभी मौतों के पीछे कैनाइन डिस्टेंपर वायरस को जिम्मेदार माना जा रहा है।
आखिर क्या है कैनाइन डिस्टेंपर वायरस
कैनाइन डिस्टेंपर वायरस "पैरामिक्सोवायरस" परिवार का हिस्सा है। यह वही वायरस है जिसके संक्रमण से इंसानों में खसरा जैसी बीमारी होती है। जंगल में जब यह वायरस फैलता है, तो संक्रमित वन्य प्राणी के बचने की संभावना बेहद कम रह जाती है, क्योंकि यह मस्तिष्क और फेफड़ों को पूरी तरह क्षतिग्रस्त कर देता है।
यह वायरस मूल रूप से श्वान वंश (कैनाइन) से जुड़ा है, लेकिन सिर्फ कुत्तों तक सीमित नहीं है। यह मांसाहारी स्तनधारियों के कई परिवारों को संक्रमित कर सकता है, जिनमें कैनडे यानी श्वान वंश के साथ-साथ फेलिडे परिवार के बाघ, शेर, तेंदुए और चीते भी शामिल हैं। यह हवा, पानी के स्रोत, पालतू जीवों या सीधे संपर्क में आने से फैलता है।
2018 में गिर के 34 शेरों की ले चुका है जान
जो वायरस इस समय कान्हा में बाघों की मौत का कारण बन रहा है, वही वायरस साल 2018 में गुजरात के गिर में 34 एशियाई शेरों की जान ले चुका है। अब यही वायरस कान्हा नेशनल पार्क में कहर बरपा रहा है।
हाई कोर्ट में याचिका, एनटीसीए को नोटिस
इस पूरे मामले को लेकर एक जनहित याचिका दायर की गई है, जिसमें कहा गया है कि कान्हा टाइगर रिजर्व में कैनाइन डिस्टेंपर वायरस (सीडीवी) संक्रमण के कारण अब तक 10 बाघों की मौत हो चुकी है। याचिका में आरोप है कि इसके बावजूद संक्रमण को काबू में लाने के लिए पर्याप्त और प्रभावी कदम नहीं उठाए गए।
याचिका में यह भी सवाल उठाया गया कि इतनी बड़ी संख्या में बाघों की मौत के बाद भी वन विभाग ने सार्वजनिक तौर पर यह नहीं बताया कि वायरस के प्रसार को रोकने के लिए क्या उपाय किए गए हैं। यदि कुत्तों का वैक्सीनेशन हो रहा है, तो फिर यह वायरस फैला कैसे, टाइगर रिजर्व की सीमाओं को कैसे सुरक्षित रखा जा रहा है और जल स्रोतों की स्थिति क्या है — ये सवाल लगातार खड़े हो रहे हैं।
विशेषज्ञ की राय: प्रबंधन की बड़ी चूक
वन्य प्राणी विशेषज्ञ अभय कोचर का कहना है कि कान्हा नेशनल पार्क बाघों के लिए सबसे सुरक्षित और सबसे अलग-थलग स्थान माना जाता है। ऐसे में यहां डिस्टेंपर वायरस का पहुंचना कान्हा प्रबंधन की बड़ी चूक है।
विशेषज्ञ के मुताबिक इसकी रोकथाम के लिए युद्ध स्तर पर वैक्सीनेशन जरूरी है। अब यह मामला नेशनल पार्क प्रबंधन के हाथ से निकल चुका है, इसलिए इसके नियंत्रण के लिए राज्य और केंद्र सरकार को सीधे हस्तक्षेप कर अतिरिक्त प्रयास करने चाहिए।
अब हो रहा कुत्तों का वैक्सीनेशन
कान्हा टाइगर रिजर्व के फील्ड डायरेक्टर रविंद्र मणि त्रिपाठी ने बताया कि एनटीसीए की गाइडलाइन के अनुसार काम किया जा रहा है और ग्रामीणों को जागरूक किया जा रहा है। ग्रामीणों ने भी कुत्तों के वैक्सीनेशन में सहयोग करने तथा कुत्तों को घर से बाहर न निकलने देने की शपथ ली है।
वहीं, बालाघाट कलेक्टर मृणाल मीना ने हाल ही में आयोजित टीएल बैठक में वैक्सीनेशन की रफ्तार तेज करने की अपील की है।
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